गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

गो चालीसा


दोहा


जय गोमाता, पावनी, धर्मरूप, सुखधाम।

जनजीवन के मूल को, बारंबार प्रणाम॥


चौपाई
जय जय गोमाता सुखसागर। जय देवी अमृत की गागर॥
जीवनरस सरिता तुम दाता। पल-छिन महिमा गाएँ विधाता॥
वेद-पुराणों ने गुण गाया। धर्म सनातन ने अपनाया॥
जग की रक्षक, पालनहारी। गोपालक हैं कृष्णमुरारी॥
कृपा गऊ की बड़ी निराली। धर्म, अर्थ को देनेवाली॥
वास सभी तीर्थों का तुझमें। फल सारे यज्ञों का तुझमें॥
पृष्ठदेश में ब्रह्मा सोहें। गले में स्वयं विष्णु मन मोहें॥