शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

दो हाइकु मुक्तक

(1)
महँगी रोटी/ भूख न छोड़े जिद/ रोता निर्धन।
दवा न दारू/ अकुलाती खटिया/ टूटा है तन।
जूझे इज्जत/ पैबंद बहकते/ गिद्ध निगाहें,
भारी अंबर/ मन झोंपड़पट्टी/ आँखें सावन॥

(2)
प्यासी तितली/ रंग बाग के गुम/ कैसा बसंत।
रूठी बिंदिया/ परदेस बुरा है/ आये न कंत।
फूल चिढ़ाते/ खोई सी विरहन/ बैरी बहार,
एकाकीपन/ दंड बने जीवन/ पीड़ा अनंत॥

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