शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दुर्मिल सवैया - तुम छंद बनी

तुम छंद बनी, नवगीत बनी, तब तो कवि विश्व हमें कहता।
चित में बस शब्द तले घुमड़ी, दरिया रस का तब ही बहता।
यह चंद्रप्रभा तुमसे सजती, सपनोंपर रंग चढ़ा रहता।
क्षण को जब दूर गयी हमसे, सच जीवन-दुर्ग दिखा ढहता॥

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

दुर्मिल सवैया

यह भोर मुझे अपनी लगती, यदि साजन संग खड़े रहते।
तब शून्य नहीं तकतीं अँखियाँ, दुख-दर्द नहीं उनसे बहते।
खुद में न रही, सुन लूँ किसकी, सब हार गये कहते-कहते।
मन चीख-पुकार मचा तड़पे, वह ऊब चुका सहते-सहते॥

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

सत्ता के तौर-तरीके - लघुकथा

"ये क्या किया सरकार, पिंजरों के दरवाजे खुले रखने का आदेश दे दिया! सब के सब उड़ जाएंगे। क्या बचेगा हमारे पास? माँस की महक को तरसना पड़ेगा"

"मूर्ख हो तुम वजीर जो अभीतक सत्ता के तौर-तरीके नहीं समझ सके। हमारे विरोध में कुछ स्वर पनपने लगे थे। उनको दबाने के लिए अनगिन तालियों की गड़गड़ाहट चाहिए थी सो ऐसा हुक्म देना पड़ा। आदेश-पत्र को ठीक से पढ़ो। ये शर्त अनिवार्य रूप से रखी गई है कि उनके ही पिंजरों के दरवाजे खुले रखे जाएंगे जो अपने पर कतरवाने की लिखित स्वीकृति दें"

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

दो हाइकु मुक्तक

(1)
महँगी रोटी/ भूख न छोड़े जिद/ रोता निर्धन।
दवा न दारू/ अकुलाती खटिया/ टूटा है तन।
जूझे इज्जत/ पैबंद बहकते/ गिद्ध निगाहें,
भारी अंबर/ मन झोंपड़पट्टी/ आँखें सावन॥

(2)
प्यासी तितली/ रंग बाग के गुम/ कैसा बसंत।
रूठी बिंदिया/ परदेस बुरा है/ आये न कंत।
फूल चिढ़ाते/ खोई सी विरहन/ बैरी बहार,
एकाकीपन/ दंड बने जीवन/ पीड़ा अनंत॥