शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

हेडलाइन्स (कहानी)

"सारिका तुम बस घबराना मत, जितना कहा है उतना करना बाकी मैं सब सँभाल लूँगा, इतनी जान-पहचान है मेरी"

"नहीं आर्णव, तुम चिंता मत करो, मैंने अब हिम्मत जुटा ली है, कोई गड़बड़ नहीं होगी"

"दैट्स गुड डीयर"

"देखो ये सब मैं तुम्हारे लिए कर रही हूँ, मेरी शादी मेरे मम्मी-पापा ने जबरदस्ती सुशांत से कर दी, मैं इसके लिए न कभी उनलोगों को माफ कर पायी न खुद को"

"ओके-ओके बातें बाद में, अभी जो काम है उसपर ध्यान दो"

"हम्म, चलो बाद में फोन करती हूँ"

सारिका ने फोन कट किया और अपने पति सुशांत को आवाज दी

"सुशांत, बाहर लॉन में क्या कर रहे? अंदर आओ, तुम्हारी कॉफी तैयार है"

"ओके सारा, लो आ गया, दो" सुशांत ने कॉफीमग ले लिया

"अरे हाँ सारा"

"क्या?"

"ये लो, तुम्हारे लिए"

"लिफाफा, इसमें क्या है?" सारिका ने लिफाफे को खोलना चाहा

"अरे अभी नहीं, जब मैं ये कॉफी खत्म कर लूँ तब खोलना, तबतक वेट, सस्पेंस का अलग ही मजा है" सुशांत ने मुस्कुराते हुए कहा और कॉफी पीने लगा। सारिका भी हल्की मुस्कान ओढ़े उसे चुपचाप देखती रही

कॉफी की कुछ सिप ही लेने के बाद सुशांत के मुँह से झाग आने लगी। वो वहीं गिर पड़ा और उसकी मौत हो गयी

सारिका की साँसे तेज चल रही थी लेकिन उसके चेहरेपर एक मजबूती थी। उसने तुरंत आर्णव को फोन लगाया

"आर्णव, तुम जल्दी से यहाँ आ जाओ, काम तो हो गया लेकिन थोड़ी घबराहट सी हो रही मुझे"

"डौंट वरी डीयर, मैं अभी पंद्रह मिनट में पहुँचता हूँ, सारी सेटिंग कर ली है मैंने" कह आर्णव ने फोन कट कर दिया

सारिका दरवाजे की ओर भागी तभी उसका ध्यान अपने हाथ में पकड़े लिफाफेपर गया जो मरने से पहले उसे सुशांत ने दिया था। उसने अनमने ढंग से उसे खोला। अंदर एक चिठ्ठी थी। सारिका उसे पढ़ने लगी

"सारा, मेरी प्यारी सारा, जब से हमारी शादी हुई मुझे लगता रहा कि तुम मुझे दिल से स्वीकार नहीं कर पा रही। मैं सोचता रहा कि शायद मेरा प्यार तुम्हें मेरी ओर खींच लेगा लेकिन कल जब मैंने तुम्हारे और आर्णव के बीच फोनपर हो रही बातें सुनी तो मुझे बहुत दुख हुआ। मैं खुद ही अपनेआप को खत्म कर लेता लेकिन तुमलोगों ने प्लान इतना अच्छा बनाया कि मेरी मनचाही मुराद पूरी हो गयी। तुम्हारे हाथों से ही जहर पीकर मरने का मौका मिल गया। इस बात के लिए तुमदोनों को दिल से थैंक्यू। सदा खुश रहना। अलविदा"

अंत तक चिठ्ठी पढ़ते-पढ़ते सारिका का बदन काँपने लगा। वो पसीने से नहा उठी। उसने बदहवास सा सुशांत की ओर देखा। उसकी आँखें अबतक खुली उसे ही देख रहीं थी। सारिका की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। चिठ्ठी उसके हाथों से छूट गयी और वो खुद भी वहीं गिर पड़ी। तबतक आर्णव भी भागता हुआ वहाँ पहुँचा

"सारिका, सारिका" उसने उसे झिंझोड़ कर उठाना चाहा लेकिन सारिका की भी हृदयगति रुक चुकी थी। आर्णव घबराया हुआ वहाँ से निकल गया। अगले दिन अखबार की हेडलाइंस थी

"पति ने की आत्महत्या, सदमे से पत्नी की भी मौत"

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