सोमवार, 17 नवंबर 2014

मेरे प्यारे बादल (मुक्तछंद)


आशा न थी
जिस बादल से पानी मिलता था
उससे तेजाब बरस गया
सो फट पड़ा ज्वालामुखी
बह गया
हैरानी और आँसू मिश्रित लावा
अब
अंदर घर कर चुकी है
एक अजीब सी ठंढक
जिसमें भरा है बोध सीमाओं का
गाढ़ापन है अहसानों का
अफसोस है जहरीले धुएँ के
मचाए उत्पात का
देखो
फिर उठने लगी है वही चिरपरिचित
भीनी-भीनी सुगंध मिट्टी से
खिलने लगे हैं नयी किस्म के पौधे
जो हमेशा मुस्कुराकर स्वागत करेंगे
आती हर तरह की बूँदों का

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