सोमवार, 1 सितंबर 2014

गीतिका का तानाबाना - ओम नीरव

प्रस्तावना - ग़ज़ल एक काव्य विधा है जिसका प्रयोग किसी भी भाषा में किया जा सकता है ! इसलिए ग़ज़ल विधा को उर्दू की सीमित परिधि से बाहर निकालकर विस्तार देने के लिए हिंदी में ग़ज़ल लेखन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है l बहती सरिता का जल निर्मल रहता है जबकि ठहरे हुए पोखर का जल सड़ने लगता है इसलिए ग़ज़ल को विस्तार देना अपरिहार्य है , 'ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने देना' उचित नहीं है l
हिंदी भाषा और हिन्ही व्याकरण में लिखी ग़ज़ल को एक अलग नाम 'गीतिका' देने की भी आवशयकता है , इससे जहां एक ओर उर्दू ग़ज़ल का मौलिक स्वरुप अक्षुण्ण रहेगा , वहीँ दूसरी ओर 'गीतिका' को भी एक स्वतंत्र विधा के रूप में सम्मान से देखा जा सकेगा !
गीतिका एक हिंदी छंद का नाम भी है किन्तु यह संयोग मात्र है , उस छंद से इस 'गीतिका' का कोई साम्य  नहीं है ! मेरी जानकारी के अनुसार इस परिप्रेक्ष्य में 'गीतिका' शब्द का प्रयोग सर्व प्रथम राष्ट्रीय कवि पद्म श्री गोपाल दास नीरज जी के द्वारा किया गया था ! अस्तु 'गीतिका' की प्रस्तुत अभिधारणा श्रद्धेय नीरज जी को साभार सप्रेम समर्पित है !

गीतिका की मुख्य अभिधारणाएं निम्नवत हैं --

(1) हिंदी भाषा और व्याकरण में रची गयी ग़ज़ल को 'गीतिका' कहते हैं l इसे 'हिंदी ग़ज़ल' भी कह सकते है l गीतिका का छंदानुशासन वही है जो ग़ज़ल का है किन्तु भाषा , व्याकरण एवं अन्य मान्यताएं हिंदी की हैं l दोनों की समानता अग्र लिखित विन्दु (2) से (6) तक तथा भिन्नता विन्दु (7) से आगे तक स्पष्ट की गयी है l

 गीतिका और ग़ज़ल में समानताएं
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(2) गीतिका की एक निश्चित 'मापनी' (बहर) होती है जो वास्तव में मात्राओं का एक निश्चित क्रम है जैसे -२१२ २१२ २१२ २१२ अथवा गालगा गालगा गालगा गालगा अथवा फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन ! गीतिका के सभी 'पद' (मिसरे) एक ही मापनी में होते हैं !

(3) गीतिका में दो-दो पदों के कम से कम पाँच युग्म (शेर) होते हैं ! प्रत्येक युग्म का अर्थ अपने में पूर्ण होता है अर्थात वह अपने अर्थ के लिये किसी दूसरे युग्म का मुखापेक्षी नहीं होता है ! गीतिका के युग्म की एक 'विशेष कहन' होती है , जिसे विशिष्ट शैली , वक्रोक्ति ,अन्योक्ति ,बाँकपन या व्यंजना के रूप में भी देखा जा सकता है , ऐसा कुछ भी न हो तो सपाट भाषण या अभिधा से गीतिका का युग्म नहीं बनता है !

(4) पहले युग्म के दोनों पद तुकान्त होते है , इस युग्म को 'मुखड़ा' (मतला) कहते हैं ! बाद के प्रत्येक युग्म की पहली पंक्ति अनिवार्यतः अतुकांत होती है जिसे 'पूर्व पद' (मिसरा ऊला) कहते हैं तथा दूसरी पंक्ति तुकांत होती है , जिसे 'पूरक पद' (मिसरा सानी) कहते हैं ! अंतिम युग्म में यदि रचनाकार का उपनाम आता है तो उसे 'मनका' (मक्ता) कहते हैं !

(5) पूरी गीतिका में तुकान्त एक सामान रहता है l तुकान्त में दो खंड होते है -- अंत के जो शब्द सभी पंक्तियों में सामान होते हैं उन्हें 'पदान्त' (रदीफ़) कहते हैं तथा उसके पहले के शब्दों में जो अंतिम अंश सामान रहता है उसे 'समान्त' (काफिया) कहते हैं ! कुछ गीतिकाओं में पदांत नहीं होता है , ऐसी गीतिकाओं को 'अपदान्त गीतिका' (ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल) कहते हैं !

(6) संक्षेप में कोई रचना तभी गीतिका हो सकती है जब उसमे पाँच बातें हों -- १. मापनी (बहर) २. पदान्त-समान्त (रदीफ़-काफिया) ३. मुखड़ा (मतला) ४. कम से कम पांच युग्म (शेर/अश'आर) ५. विशेष कहन l

गीतिका और ग़ज़ल में भिन्नताएं
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(7) 'गीतिका' में हिंदी शब्दों का प्रयोग प्रमुखता से होना चाहिए किन्तु इतर भाषाओँ जैसे उर्दू , अंग्रेजी आदि के लोक प्रचलित शब्दों को भी सप्रेम स्वीकार किया जाना चाहिए l

इतर भाषाओँ जैसे उर्दू , अंग्रेजी आदि के लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग होता है तो उन शब्दों का प्रयोग उसी रूप में होना चाहिए जिस रूप में वे हिंदी में बोले जाते हैं और उन शब्दों पर वर्तनी और व्याकरण हिंदी की ही लागू होनी चाहिए ! किसके स्थान पर क्या अपेक्षित है , इसके कुछ उदहारण केवल बात को स्पष्ट करने के लिए --
शह्र > शहर , नज्र > नज़र , फस्ल > फसल , नस्ल > नसल
काबिले-तारीफ़ > तारीफ़ के क़ाबिल , दर्दे-दिल > दिल का दर्द
दिलो-जान > दिल - जान , सुबहो-शाम > सुबह - शाम ,
आसमां > आसमान , ज़मीं > ज़मीन
अश'आर > शेरों , बहूर > बहरों , सवालात > सवालों , मोबाइल्स > मोबाइलों , चैनेल्स > चैनलों

(8) मात्राभार की गणना , संधि - समास , तुकांतता या समान्तता आदि का निर्धारण हिंदी व्याकरण के अनुसार ही मान्य है l

(9) 'गीतिका' में अकार-योग (अलिफ़-वस्ल) जैसे 'हम अपना' को 'हमपना' पढ़ना , पुच्छ-लोप (पद के अंतिम लघु का लोप) जैसे 'पद के अंत में आने पर 'कबीर' को 12 मात्राभार में 'कबीर्' या 'कबी' जैसा पढना , समान्ताभास (ईता-दोष) जैसे 'चलना' और 'बचना' में समान्त दोषपूर्ण मानना आदि हिंदी व्याकरण के अनुरूप न होने के कारण मान्य नहीं हैं l इनके स्थान पर हिंदी भाषा व्याकरण के अपने नियम ही मान्य हैं l

(10) गीतिका के पदों की मापनी उर्दू मापनी (उर्दू बहर) के साथ-साथ किसी सनातनी छन्द या लोक छंद या किसी स्वैच्छिक लय पर भी आधारित हो सकती है l जो भी आधार हो उसका आदि से अंत तक सुनिश्चित अनुपालन होना चाहिए l

(11) गीतिका की चर्चा में हिंदी पदावली को चलन में लाने का प्रयास किया जाएगा किन्तु पहले से प्रचलित उर्दू पदावली की उपेक्षा नहीं की जाएगी l कुछ उदहारण --

युग्म = शेर /... गीतिका = हिंदी ग़ज़ल /... पद = मिसरा /... पुरो पद = मिसरा ऊला /... पूरक पद = मिसरा सानी /... पदान्त = रदीफ़ /... समान्त = काफिया /... मुखड़ा = मतला /... मनका = मक़ता /... प्रवाह = रवानी /... कहन = बयाँ /... शैली = अंदाज़ /... कहन की शैली = अंदाज़े-बयाँ /... मापनी = बहर /... स्वरक = रुक्न /... स्वरकावली = अरकान /... मात्रा भार = वज़न /... कलन = तख्तीअ /... मौलिक मापनी = सालिम बहर /... मिश्रित मापनी = मुरक्कब बहर /... पदांत समता दोष = एबे-तकाबुले-रदीफ़ /... अपदान्त गीतिका = ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल /... अकार योग = अलिफ़ वस्ल /... पुच्छ लोप = मिसरे के अंतिम लघु का लोप /... समान्ताभास = ईता /... धारावाही गीतिका = मुसल्सल ग़ज़ल

.... इस पदावली में प्रयुक्त पदों के स्थान पर यदि कोई दूसरा अच्छा सुझाव आता है तो उसपर ससम्मान विचार किया जायेगा !

(12) अंततः यह भी स्पष्ट कर देना उपयुक्त होगा कि
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'गीतिका' के रूप में ऐसी प्रत्येक 'ग़ज़ल' मान्य है जिसमे हिंदी व्याकरण की अवहेलना
न हो और उर्दू के दुरूह अप्रचलित शब्दों का प्रयोग न हो l
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उदहारण : -
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हिंदी गजल : 'सच मानिए'
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क्षम्य कुछ भी नहीं, बात सच मानिए !
भोग ही है क्षमा , तात सच मानिए !

भाग्य तो है क्रिया की सहज प्रति-क्रिया ,
हैं नियति-कर्म सहजात सच मानिए !

युद्ध से बच निकलना कला है बड़ी ,
व्यर्थ ही घात-प्रतिघात, सच मानिए !

घूमते हैं समय की परिधि पर सभी ,
कुछ नहीं पूर्व-पश्चात, सच मानिए !

वह अभागा गिरा मूल से , भूल पर -
कर सका जो न दृगपात सच मानिए !

सत्य का बिम्ब ही देखते हैं सभी ,
आजतक सत्य अज्ञात ,सच मानिये !

 .......... ओम नीरव , लखनऊ.

विन्दुवत व्याख्या :-
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(2) मापनी (बहर) -

२१२ २१२ २१२ २१२ ... अथवा
गालगा गालगा गालगा गालगा ... अथवा
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन

इनमे से पहली प्रणाली को सामान्यतः 'मात्राक्रम' , दूसरी प्रणाली को 'लगावली' और तीसरी प्रणाली को 'अरकान' के नाम से जाना जाता है l

(3) इसमें दो-दो पदों (मिसरों) के छः युग्म (शेर/अश'आर) हैं , कम से कम पांच युग्म होने चाहिए !

(4) पहले युग्म अर्थात मुखड़ा (मतला) के पद तुकांत है , जबकि बाद के प्रत्येक युग्म का पूर्व पद (मिसरा ऊला) अतुकांत और पूरक पद (मिसरा सानी) तुकान्त है ! अंतिम युग्म में उपनाम नहीं आया है , इसलिए इसे मनका (मक़ता) नहीं कहा जा सकता है !

(5) पूरी गीतिका का तुकान्त है - 'आत सच मानिए' , जिसके दो खंड हैं :- पहला समान्त (काफिया) - 'आत' और दूसरा पदान्त(रदीफ़) - 'सच मानिए' ! संक्षेप में --
तुकांत = समान्त + पदांत
आत सच मानिए = आत + सच मानिए

(6) विशिष्ट कहन की बात का निर्णय आप स्वयं करके देखें , जिस युग्म में वह विशेष कहन न हो उसे गीतिका का युग्म न मानें या दुर्बल युग्म मानें !

मित्रों ! विवादों से बचने के लिए मैंने अपनी गीतिका को ही उदहारण के रूप में लिया है जो बहुत उत्तम नहीं है ! बाद में कोई उपयुक्त अन्य उदहारण मिलने पर मैं इसे बदल दूंगा !

गीतिका के सृजन - संवर्धन में आपकी सहभागिता सादर प्रार्थित है ! सप्रेम !




गीतिकालोक (गीतिका विधा में रुचि रखनेवाले मित्र इस समूह में सादर आमंत्रित हैं)

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. आपकी लिखी रचना मंगलवार 02 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. उम्दा जानकारी ..बहुत से रचनाकार इस से लाभान्वित होंगे ..कई बाते मैं आज ही समझ पाई .. बहुत बहुत आभार :)

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