सोमवार, 21 जुलाई 2014

ताँका

(१)
मन से मेघ
पल-पल बदलें
रंग, आकार
कभी मौन धरते
कभी रोते फूट के

(२)
जेठ का वार
आहत पड़ी धरा
सावन वैद्य
करता उपचार
लेपता शीतलता

(३)
सत्यवचन
सावन न बुझाता
आग कोई भी
देखो खड़ी हँसती
क्षुधाग्नि निर्धन की