मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

बरवै मुक्तिका - मचले भाव

मौसम जो दिखता था, बड़ा उदास।
भरा आपने उसमें, नव उल्लास।

स्वप्न-कोयलें चहकीं, देख बसंत,
हृदयतलों में फैला, पुनः उजास।

सुनी आहटें कोमल, मचले भाव,
लगा आ गई मंजिल, दिल की पास।

साँसों का आलसपन, भागा दूर,
लगीं काम में वो सब, लिए हुलास।

जिह्वा को तो थामे, बैठी लाज,
प्रणय निवेदन का दृग, करें प्रयास।

लगा आज फिर लगने, जीवन मित्र,
कंठ लगाया हमको, दे विश्वास।

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