शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

कामरूप छंद

भोला न बोलें, राज खोलें, "लोक" का भी आप।
शासन थमाते, जो गलत को, मन उन्हीं के पाप॥
"तंत्र" जो बिगड़ा, देश पिछड़ा, सभी भागीदार।
नेता अकेले, दोष झेले, यह नहीं स्वीकार॥

नेता मिले वो, "छूट" दे जो, सोचता ये कौन?
उत्कोच पाकर, वोट बेचें, शातिरों से मौन॥
रखते सदा जो, जाति जिन्दा, हृदय तले सँभाल।
रहते पढ़े पर, अनपढ़ों से, खूब करें बवाल॥

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