रविवार, 13 अप्रैल 2014

मुक्तिका - यादें तुम्हारी

इल्लियाँ शक की चमन में छा गईं।
प्यार की कलियाँ सभी मुरझा गईं।

कर अँधेरों से लगे ज्यों साँठगाँठ,
आँधियाँ दीपक बुझाने आ गईं।

दोमुँहेपन की मिली उसको सजा,
धड़कनें उसकी उसे ठुकरा गईं।

जानकर अनजान बनने को विवश,
हाय! स्थितियाँ हाल ये करवा गईं।

आज भी यादें तुम्हारी आ सनम,
फिर कदम मेरे बहुत बहका गईं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. waah..ek se badhkar ek khazaana hai yaha par..aapse kavya ki barikiyan seekhna chahunga shriman..bahut bahut badhai sundartam lekhan hetu.!!

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