गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मुक्तिका - उपवन इक हम भी यदि होते

उपवन इक हम भी यदि होते।
नहीं तरस पुष्पों को रोते।

रंग नित्य करते आलिंगन,
संग-संग ही जगते-सोते।

हर्ष-तितलियाँ करतीं क्रीड़ा,
लगवातीं मस्ती में गोते।

बहा सुगंधों की सलिलाएँ,
उनमें सबके हृदय डुबोते।

प्रीत सखी का हाथ थामकर,
सुखमय, पावन स्वप्न सँजोते।

नटखटपन होता हममें भी,
"गौरव" हँसी नहीं यों खोते।

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