शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

गप्पू बंदर - बाल कविता (चौपई छंद)














गप्पू बंदर था बदमाश
काम एक था उसका खास
चुरा-चुरा के खाता आम
करता औरों को बदनाम

सब पशुओं ने की तब राय
मिलकर सोचा एक उपाय
गधा कैमरा लाया भाग
उसे लगाया फल के बाग

गप्पू जब आया उस रात
उसको पता न थी ये बात
हुई रिकॉर्डिंग, गप्पू चोर
कह दौड़े सब उसकी ओर

जम के पड़ी, खिंचाये कान
सुधर गया गप्पू शैतान
अगले दिन ही खोली शॉप
लगा बेचने आलू चॉप

कामरूप छंद

भोला न बोलें, राज खोलें, "लोक" का भी आप।
शासन थमाते, जो गलत को, मन उन्हीं के पाप॥
"तंत्र" जो बिगड़ा, देश पिछड़ा, सभी भागीदार।
नेता अकेले, दोष झेले, यह नहीं स्वीकार॥

नेता मिले वो, "छूट" दे जो, सोचता ये कौन?
उत्कोच पाकर, वोट बेचें, शातिरों से मौन॥
रखते सदा जो, जाति जिन्दा, हृदय तले सँभाल।
रहते पढ़े पर, अनपढ़ों से, खूब करें बवाल॥

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

मधुमालती छंद

तुम श्वास हो, सुख-गीत हो
मेरी प्रिया, मनमीत हो
दिल में जगा विश्वास हो
रह दूर भी नित पास हो

मनमोहन छंद

चलो बढ़ाएँ आज कदम
बनें दिवाकर, लें हर तम
मिटे हृदय से द्वेष, भरम
करें राष्ट्रहित सभी करम

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मुक्तिका - यादें तुम्हारी

इल्लियाँ शक की चमन में छा गईं।
प्यार की कलियाँ सभी मुरझा गईं।

कर अँधेरों से लगे ज्यों साँठगाँठ,
आँधियाँ दीपक बुझाने आ गईं।

दोमुँहेपन की मिली उसको सजा,
धड़कनें उसकी उसे ठुकरा गईं।

जानकर अनजान बनने को विवश,
हाय! स्थितियाँ हाल ये करवा गईं।

आज भी यादें तुम्हारी आ सनम,
फिर कदम मेरे बहुत बहका गईं।

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मुक्तिका - उपवन इक हम भी यदि होते

उपवन इक हम भी यदि होते।
नहीं तरस पुष्पों को रोते।

रंग नित्य करते आलिंगन,
संग-संग ही जगते-सोते।

हर्ष-तितलियाँ करतीं क्रीड़ा,
लगवातीं मस्ती में गोते।

बहा सुगंधों की सलिलाएँ,
उनमें सबके हृदय डुबोते।

प्रीत सखी का हाथ थामकर,
सुखमय, पावन स्वप्न सँजोते।

नटखटपन होता हममें भी,
"गौरव" हँसी नहीं यों खोते।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

बरवै मुक्तिका - मचले भाव

मौसम जो दिखता था, बड़ा उदास।
भरा आपने उसमें, नव उल्लास।

स्वप्न-कोयलें चहकीं, देख बसंत,
हृदयतलों में फैला, पुनः उजास।

सुनी आहटें कोमल, मचले भाव,
लगा आ गई मंजिल, दिल की पास।

साँसों का आलसपन, भागा दूर,
लगीं काम में वो सब, लिए हुलास।

जिह्वा को तो थामे, बैठी लाज,
प्रणय निवेदन का दृग, करें प्रयास।

लगा आज फिर लगने, जीवन मित्र,
कंठ लगाया हमको, दे विश्वास।

मुक्तिका - आप आते

आप आते।
जान लाते।

जिंदगी को,
जगमगाते।

धड़कनों में,
मुस्कुराते।

ख्याल बनकर,
मन लगाते।

प्यास दिल की,
झट बुझाते।