शनिवार, 29 मार्च 2014

नवसंवत्सर आ गया - कुंडलिया

नवसंवत्सर आ गया, जागी नयी उमंग।
हर्ष, स्वप्न, विश्वास भी, लाया है वो संग॥
लाया है वो संग, कामनाओं की कलियाँ,
सजा पुनः मन-खेत, उगी उर्जा की फलियाँ।
आशाएं हों पूर्ण, भरे सुख से सबका घर,
बोले जन-जन झूम, नमन हे नवसंवत्सर॥

रविवार, 23 मार्च 2014

मुक्तिका - अन्यायों का दौर चला है

अन्यायों का दौर चला है।
हृदय-हृदय में क्रोध पला है।

मौनव्रती हो जाओ सारे,
अब तो लगता यही भला है।

उस-उसका अस्तित्व मिट गया,
समय संग जो नहीं ढला है।

तुम विश्वास न करते मुझपर,
ये ही मुझको बहुत खला है।

कुरूपता वो क्यों ना चाहे,
सुंदरता ने जिसे छला है।

जुल्फें उसकी नागिन जैसी,
सच कहता हूँ बुरी बला है।

चलो आठवाँ अचरज देखो,
पत्थर कैसे पड़ा गला है।

डटे रहो मोर्चेपर वीरों,
खतरा पूरा नहीं टला है।

किसी मिथ्य को तथ्य बनाना,
बड़ी लोकप्रिय हुई कला है।

धुँआ नहीं बस गंध आ रही,
लगता कोई स्वप्न जला है।

बैर कहाँ बाकी है "गौरव",
जबसे प्रेम-गुलाल मला है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

प्यारी गौरैया - कुंडलिया















गौरैया तेरे असल, दोषी हम इंसान।
पाप हमारे भोगती, तू नन्हीं सी जान॥
तू नन्हीं सी जान, घोंसलों में है रहती,
रसायनों का वार, रेडिएशन क्या सहती।
इक मौका दे और, उठा मत अपने डेरे,
मानेंगे उपकार, सदा गौरैया तेरे॥

गुरुवार, 20 मार्च 2014

दोहा मुक्तिका - हम तो बने पतंग

भाव सभी पाने लगें, शब्दों का यदि संग।
जाने इस संसार का, क्या होगा तब रंग।

तम के कारागार में, अरसे से हैं आप,
हँस लेते कैसे सदा, देख हृदय है दंग।

नयी समस्या आ रही, मुँह बाये क्यों नित्य,
बदल जरा देखो प्रिये, अब जीने के ढंग।

कितने हैं जो पा रहे, प्रेम-नगर में शांति,
अपनी मित्रों बन गई, एक रात ही जंग।

अधरामृत कब के पिया, अबतक चढ़ा खुमार,
जबकि उतर जाती रही, कुछ घंटों में भंग।

उसने भी लगता किया, कभी अंधविश्वास,
घूम रहा है आजकल, मारा, नंग-धड़ंग।

डोर किसी के हाथ में, घाती चारों ओर,
"गौरव" पूछो हाल मत, हम तो बने पतंग।

रविवार, 16 मार्च 2014

होलीमय कुंडलियाँ

(1)
होली की मस्ती चढ़ी, मची धूम चहुँओर।
सभी खुमारी में मगन, रहा न खुदपर जोर॥
रहा न खुदपर जोर, भंग पी ली ही हमने,
उसका तगड़ा असर, कदम न देता थमने।
नाच रहे ले ढोल, संग मित्रों की टोली,
मन में नयी उमंग, जगा देती है होली॥

(2)
अंबर भी दिखता खिला, हँसती दिखे जमीन।
कैसे फिर न हो भला, मन अपना रंगीन॥
मन अपना रंगीन, बहकने को आतुर है,
उसको देता जोश, फागुनी मीठा सुर है।
सारा गाँव-समाज, दीखता मानों इक घर,
बरसाता आशीष, नेह में डूबा अंबर॥

(3)
दोहे पीटें ढोल तो, रोला मस्त मृदंग।
छंदोंपर मस्ती चढ़ी, देख हुआ दिल दंग॥
देख हुआ दिल दंग, भंग पीती कुंडलिया,
छप्पय संग अहीर, बना बरवै है छलिया।
तरह-तरह के वेश, बना सबका मन मोहे,
होली में मदहोश, सवैया, आल्हा, दोहे॥

(4)
सच्चे दिलसे बोलते, नित हम बारंबार।
साथी तेरा साथ ही, होली का त्योहार॥
होली का त्योहार, हमारा तुझपर निर्भर,
तुझसे ही सुख-चैन, तुझी से खिलता है घर।
हमको नहीं पसंद, रंग बाजारू कच्चे,
जिनमें तेरी प्रीत, वही बस लगते सच्चे॥

(5)
होली बंधक न बने, कुछ धनिकों के पास।
निर्धन को भी हो जरा, फगुआ का अहसास॥
फगुआ का अहसास, मस्त कर दे घर-घर को,
फूँके सब संताप, मिटा हर मन से डर को।
व्यापे हर्षोल्लास, हवा में गूँजे बोली,
बुरा न मानो मीत, झूम लो आई होली॥

(6)
होली से क्या चाहना, दिल में हो यदि प्यार।
जीवन में खुशियाँ रहें, क्षण-क्षण है त्योहार॥
क्षण-क्षण है त्योहार, अगर सच हों सब सपने,
लगें समझने अर्थ, सभी रिश्तों का अपने।
साँस-साँस हो तृप्त, लगे धड़कन हमजोली,
दीवाली हर रात, मनेगी नित ही होली॥

(7)
काले-काले केश हैं, नीले, गहरे नैन।
गाल गुलाबी देख के, आता हमको चैन॥
आता हमको चैन, मधुर सी सुनकर बोली,
सच तो ये है मीत, तुम्हीं हो अपनी होली।
पाकर तुमसे प्रीत, हुए हम हैं मतवाले,
भूले बुरा अतीत, मिटे धब्बे सब काले॥

(8)
आओ सारे मिल करें, कुछ ऐसा हुड़दंग।
विश्वजीत भारत बने, रह जाएं रिपु दंग॥
रह जाएं रिपु दंग, मने अबकी वो होली,
भगवा मलें गुलाल, रंग बन छूटे गोली।
अपना जौहर आज, राष्ट्रपुत्रों दिखलाओ,
थाम हाथ में हाथ, अटल प्रण लेकर आओ॥

(9)
मन में हो शालीनता, निर्मल, कोमल भाव।
जगा सकेंगे आप तब, होली के प्रति चाव॥
होली के प्रति चाव, नहीं कीचड़ से होता,
मिट्टी, गोबर, लीद, देख हर सज्जन रोता।
प्यारे रंग, गुलाल, उड़ा रँगिए सबका तन,
जगे स्नेह, विश्वास, पुष्प सा खिल जाए मन॥

(10)
लज्जा को मत भूलिए, चाहे जो हो पर्व।
ऊँचा होगा नाम औ', लोग करेंगे गर्व॥
लोग करेंगे गर्व, आपसे हाथ मिलाकर,
सुख देंगे त्योहार, स्वयं ही घर में आकर।
अच्छा, स्वच्छ चरित्र, मनुज जीवन की सज्जा,
उसका जीना व्यर्थ, त्याग दी जिसने लज्जा॥