गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

गीत - साँसों की ये गर्म हवाएं

साँसों की ये गर्म हवाएं
सारा दिन बतियाती हैं

खंडहरों से नोंच-नोंचकर
कभी पुराने किस्से लातीं
कभी समंदर तल में मचती
उथल-पुथल का हाल सुनातीं
नहीं सुनी जिसदिन भी इनकी
रात स्वप्न में आती हैं

राहों से अनजान स्वयं हैं
मददगार लेकिन बन जातीं
महक अनुभवों की लाकर ये
काफी कुछ आसान बनातीं
देख पड़ावों को जाने क्यों
अर्थ भरे मुस्काती हैं

अपनी सी महसूस हुईं तो
कभी परायापन भी छलका
दोनों ही भावों से अक्सर
नयनों से पानी है ढलका
वैसे में इनसे जो बनता
आकर खुद समझाती हैं

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