मंगलवार, 21 जनवरी 2014

गणतंत्र दिवसपर विशेष

अब कैसा शिकवा-गिला, अब तो सभी स्वतंत्र।
जैसे "गण" इस देश के, वैसा ही "गणतंत्र"॥

कैसे इस गणतंत्र पर, करें बताओ गर्व।
खानापूरी रह गये, सभी राष्ट्रीय पर्व॥

ना "गण" हैं, ना "तंत्र" है, है तो केवल स्वार्थ।
सड़कोंपर कुचला पड़ा, पुरखों का परमार्थ॥

"गण" खुद "तंत्र" बिगाड़ते, खुद होते हलकान।
असल समस्या है यही, इसका करो निदान॥

आजादी के बाद "गण", करते इक ही काम।
इच्छाओं के बन रहे, तिल-तिल रोज गुलाम॥

अभियंता के दोष से, बिगड़ा करते यंत्र।
"गण" के अंदर दोष हो, तो बिगड़े "गणतंत्र"॥

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! बहुत सुन्दर व सामयिक दोहे

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    1. बहुत-बहुत आभार आदरणीया शालिनी जी........

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  2. वाह गणतन्त्र से जुड़े हुए दोहे ........

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    1. सादर आभार आदरणीय मुकेश जी.............

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