मंगलवार, 21 जनवरी 2014

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती (२३ जनवरी) पर विशेष
















देश ये सुभाषचंद्र बोस जैसे वीर का है, सोच-सोच यही हमें नाज बड़ा होता है।
उनका विचारमात्र ही दिलों की परतों में, राष्ट्रवाद के नवीन बीज कई बोता है।
बोस के चरणचिन्ह राह दिखलाते हमें, मन उनसा होने के सपन सँजोता है।
आज के सुभाष आप-हम चलो बन जाएं, आज फिर भारत गुलाम बना रोता है॥

शेर थे सुभाष जो सियारों से न घबराए, मार के दहाड़ टूट पड़े रिपुदल पे।
तेज, वेग था प्रचंड, रोम-रोम शस्त्र सा था, भारी पड़ता था सारे छलियों के छल पे।
दिल में दहकता था लावा निशिदिन पर, खेलती थी हँसी सदा मुख के पटल पे।
देश के सपूत थे, महान, अनुकरणीय, टकराए आँधियों से बाजुओं के बल पे॥

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

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  2. नेता जी का सच सामने आना चाहिए ...
    राष्ट्र सेवा के अमर सपूत को सलाम है ...

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    1. जी बिल्कुल सही कहा आपने आदरणीय दिगंबर नासवा जी..........

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन नेताजी की ११७ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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