मंगलवार, 21 जनवरी 2014

गणतंत्र दिवसपर विशेष

अब कैसा शिकवा-गिला, अब तो सभी स्वतंत्र।
जैसे "गण" इस देश के, वैसा ही "गणतंत्र"॥

कैसे इस गणतंत्र पर, करें बताओ गर्व।
खानापूरी रह गये, सभी राष्ट्रीय पर्व॥

ना "गण" हैं, ना "तंत्र" है, है तो केवल स्वार्थ।
सड़कोंपर कुचला पड़ा, पुरखों का परमार्थ॥

"गण" खुद "तंत्र" बिगाड़ते, खुद होते हलकान।
असल समस्या है यही, इसका करो निदान॥

आजादी के बाद "गण", करते इक ही काम।
इच्छाओं के बन रहे, तिल-तिल रोज गुलाम॥

अभियंता के दोष से, बिगड़ा करते यंत्र।
"गण" के अंदर दोष हो, तो बिगड़े "गणतंत्र"॥

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती (२३ जनवरी) पर विशेष
















देश ये सुभाषचंद्र बोस जैसे वीर का है, सोच-सोच यही हमें नाज बड़ा होता है।
उनका विचारमात्र ही दिलों की परतों में, राष्ट्रवाद के नवीन बीज कई बोता है।
बोस के चरणचिन्ह राह दिखलाते हमें, मन उनसा होने के सपन सँजोता है।
आज के सुभाष आप-हम चलो बन जाएं, आज फिर भारत गुलाम बना रोता है॥

शेर थे सुभाष जो सियारों से न घबराए, मार के दहाड़ टूट पड़े रिपुदल पे।
तेज, वेग था प्रचंड, रोम-रोम शस्त्र सा था, भारी पड़ता था सारे छलियों के छल पे।
दिल में दहकता था लावा निशिदिन पर, खेलती थी हँसी सदा मुख के पटल पे।
देश के सपूत थे, महान, अनुकरणीय, टकराए आँधियों से बाजुओं के बल पे॥

रोला छंद

देखूँ आज बहार, हुई इच्छा ये जब-जब।
कैसा ये संयोग, नजर आयी तुम तब-तब।
बनके छटा हसीन, फिजां में छा जाती हो।
ख्वाबों को भी चूम, हकीकत बनवाती हो॥

पाकर तेरी प्रीत, जिंदगी का रस पाया।
लहरा तूने केश, साँस लेना सिखलाया।
बड़ा सुखद संयोग, मिलन ये तेरा-मेरा।
ज्यों फूलों के बाग, तितलियों का हो डेरा॥

दो रोला छंद















सुलगे जीवन आँच, बनी ईंधन ये काया।
तोड़-तोड़ के हाड़, कलेजा मुँह को आया।
हलक मचाता शोर, पिला दूँ उसको पानी।
बाकी पूरी जंग, खून की रहे रवानी॥

पत्थर हैं निष्प्राण, मगर मुझमें जीवन है।
शीतलता का घूँट, माँगता मेरा तन है।
दूर अभी है साँझ, मुझे फिर जुट जाना है।
बुला रहे हैं कर्म, उन्हें भी निपटाना है॥

रविवार, 5 जनवरी 2014

जुगलबंदी (हाइकु की)

(१)
साँसों के संग
भरता हूँ सीने में
तुमको ही मैं
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सीने में जा के
चूमी हैं धड़कनें
मैंने तुम्हारी

(२)
तेरी आहटें
दिल को लगती हैं
प्रणय-धुन
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मेरी आहटें
ढूँढती हैं हमेशा
साथ तुम्हारा