सोमवार, 15 दिसंबर 2014

लजीज दोहे

हलवा, पूरी, रायता, लड्डू, मटर-पनीर।
सत्तू भरी कचौरियाँ, मेवेवाली खीर॥

आलू-पालक, राजमा, चावल, दही, अचार।
प्याज पकौड़े, पापड़ी, दाल मसालेदार॥

आलूचॉप, दहीबड़ा, लस्सी, सूप, पुलाव।
पानीपूरी चटपटी, बुंदिया, बड़ापाव॥

लिट्टी-चोखा, मिर्च, घी, रोटी, पालक-साग।
बटर पराँठे, गुलगुले, एस्प्रेसो विद झाग॥

गुड़ की गरम जलेबियाँ, चाट, समोसे, नान।
रसगुल्ले, काजू गजक, शाही मीठा पान॥

सोमवार, 17 नवंबर 2014

मेरे प्यारे बादल (मुक्तछंद)


आशा न थी
जिस बादल से पानी मिलता था
उससे तेजाब बरस गया
सो फट पड़ा ज्वालामुखी
बह गया
हैरानी और आँसू मिश्रित लावा
अब
अंदर घर कर चुकी है
एक अजीब सी ठंढक
जिसमें भरा है बोध सीमाओं का
गाढ़ापन है अहसानों का
अफसोस है जहरीले धुएँ के
मचाए उत्पात का
देखो
फिर उठने लगी है वही चिरपरिचित
भीनी-भीनी सुगंध मिट्टी से
खिलने लगे हैं नयी किस्म के पौधे
जो हमेशा मुस्कुराकर स्वागत करेंगे
आती हर तरह की बूँदों का

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

प्यारी-प्यारी चुहिया रानी - बाल कविता

प्यारी-प्यारी चुहिया रानी
नटखट सी पर बड़ी सयानी
पल में निकले, हाथ दिखाए
पलभर में जाकर छिप जाए
सारे-सारे दिन बतियाती
न्यारे-न्यारे बोल सुनाती
रूठूँ मैं तो दौड़ मनाए
कभी-कभी खुद भी खिसियाए
बड़ा जरूरी इसका होना
सजता घर का कोना-कोना
भोली-भाली सच्ची है
हँसती लगती अच्छी है

(चित्र नेट से साभार)

बुधवार, 24 सितंबर 2014

देखो फिर नवरात्रि आये (माता भजन एल्बम)

कुमुद भूषण की भक्तिमय प्रस्तुति


देखो फिर नवरात्रि आये

(भजन डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स को क्लिक करें)

naudin navratron ke.mp3

jagrata sherawali ka.mp3

aaja maiya aaja.mp3

ghabra nahin ab tu khada.mp3

mata tere charnon mein.mp3

dekho fir navratri aaye.mp3

jai durga dukh harnewali.mp3

aarti karun maa jagdamba ki.mp3


स्वर - कुमार सौरभ दिब्येन्दु (08083880819)

गीतकार - कुमार गौरव अजीतेन्दु

संगीतकार - परमान्द मिश्रा (आकाशवाणी एवं दूरदर्शन)

संगीत संयोजक - नवीन चौधरी, रत्नेश के. राय

सहयोग - मंजीत सिंह

रिकॉर्डिंग स्टुडियो - ॐ साँईं पॉलिवुड डिजिटल स्टुडियो (पटना)

सोमवार, 1 सितंबर 2014

गीतिका का तानाबाना - ओम नीरव

प्रस्तावना - ग़ज़ल एक काव्य विधा है जिसका प्रयोग किसी भी भाषा में किया जा सकता है ! इसलिए ग़ज़ल विधा को उर्दू की सीमित परिधि से बाहर निकालकर विस्तार देने के लिए हिंदी में ग़ज़ल लेखन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है l बहती सरिता का जल निर्मल रहता है जबकि ठहरे हुए पोखर का जल सड़ने लगता है इसलिए ग़ज़ल को विस्तार देना अपरिहार्य है , 'ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने देना' उचित नहीं है l
हिंदी भाषा और हिन्ही व्याकरण में लिखी ग़ज़ल को एक अलग नाम 'गीतिका' देने की भी आवशयकता है , इससे जहां एक ओर उर्दू ग़ज़ल का मौलिक स्वरुप अक्षुण्ण रहेगा , वहीँ दूसरी ओर 'गीतिका' को भी एक स्वतंत्र विधा के रूप में सम्मान से देखा जा सकेगा !
गीतिका एक हिंदी छंद का नाम भी है किन्तु यह संयोग मात्र है , उस छंद से इस 'गीतिका' का कोई साम्य  नहीं है ! मेरी जानकारी के अनुसार इस परिप्रेक्ष्य में 'गीतिका' शब्द का प्रयोग सर्व प्रथम राष्ट्रीय कवि पद्म श्री गोपाल दास नीरज जी के द्वारा किया गया था ! अस्तु 'गीतिका' की प्रस्तुत अभिधारणा श्रद्धेय नीरज जी को साभार सप्रेम समर्पित है !

गीतिका की मुख्य अभिधारणाएं निम्नवत हैं --

(1) हिंदी भाषा और व्याकरण में रची गयी ग़ज़ल को 'गीतिका' कहते हैं l इसे 'हिंदी ग़ज़ल' भी कह सकते है l गीतिका का छंदानुशासन वही है जो ग़ज़ल का है किन्तु भाषा , व्याकरण एवं अन्य मान्यताएं हिंदी की हैं l दोनों की समानता अग्र लिखित विन्दु (2) से (6) तक तथा भिन्नता विन्दु (7) से आगे तक स्पष्ट की गयी है l

 गीतिका और ग़ज़ल में समानताएं
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(2) गीतिका की एक निश्चित 'मापनी' (बहर) होती है जो वास्तव में मात्राओं का एक निश्चित क्रम है जैसे -२१२ २१२ २१२ २१२ अथवा गालगा गालगा गालगा गालगा अथवा फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन ! गीतिका के सभी 'पद' (मिसरे) एक ही मापनी में होते हैं !

(3) गीतिका में दो-दो पदों के कम से कम पाँच युग्म (शेर) होते हैं ! प्रत्येक युग्म का अर्थ अपने में पूर्ण होता है अर्थात वह अपने अर्थ के लिये किसी दूसरे युग्म का मुखापेक्षी नहीं होता है ! गीतिका के युग्म की एक 'विशेष कहन' होती है , जिसे विशिष्ट शैली , वक्रोक्ति ,अन्योक्ति ,बाँकपन या व्यंजना के रूप में भी देखा जा सकता है , ऐसा कुछ भी न हो तो सपाट भाषण या अभिधा से गीतिका का युग्म नहीं बनता है !

(4) पहले युग्म के दोनों पद तुकान्त होते है , इस युग्म को 'मुखड़ा' (मतला) कहते हैं ! बाद के प्रत्येक युग्म की पहली पंक्ति अनिवार्यतः अतुकांत होती है जिसे 'पूर्व पद' (मिसरा ऊला) कहते हैं तथा दूसरी पंक्ति तुकांत होती है , जिसे 'पूरक पद' (मिसरा सानी) कहते हैं ! अंतिम युग्म में यदि रचनाकार का उपनाम आता है तो उसे 'मनका' (मक्ता) कहते हैं !

(5) पूरी गीतिका में तुकान्त एक सामान रहता है l तुकान्त में दो खंड होते है -- अंत के जो शब्द सभी पंक्तियों में सामान होते हैं उन्हें 'पदान्त' (रदीफ़) कहते हैं तथा उसके पहले के शब्दों में जो अंतिम अंश सामान रहता है उसे 'समान्त' (काफिया) कहते हैं ! कुछ गीतिकाओं में पदांत नहीं होता है , ऐसी गीतिकाओं को 'अपदान्त गीतिका' (ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल) कहते हैं !

(6) संक्षेप में कोई रचना तभी गीतिका हो सकती है जब उसमे पाँच बातें हों -- १. मापनी (बहर) २. पदान्त-समान्त (रदीफ़-काफिया) ३. मुखड़ा (मतला) ४. कम से कम पांच युग्म (शेर/अश'आर) ५. विशेष कहन l

गीतिका और ग़ज़ल में भिन्नताएं
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(7) 'गीतिका' में हिंदी शब्दों का प्रयोग प्रमुखता से होना चाहिए किन्तु इतर भाषाओँ जैसे उर्दू , अंग्रेजी आदि के लोक प्रचलित शब्दों को भी सप्रेम स्वीकार किया जाना चाहिए l

इतर भाषाओँ जैसे उर्दू , अंग्रेजी आदि के लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग होता है तो उन शब्दों का प्रयोग उसी रूप में होना चाहिए जिस रूप में वे हिंदी में बोले जाते हैं और उन शब्दों पर वर्तनी और व्याकरण हिंदी की ही लागू होनी चाहिए ! किसके स्थान पर क्या अपेक्षित है , इसके कुछ उदहारण केवल बात को स्पष्ट करने के लिए --
शह्र > शहर , नज्र > नज़र , फस्ल > फसल , नस्ल > नसल
काबिले-तारीफ़ > तारीफ़ के क़ाबिल , दर्दे-दिल > दिल का दर्द
दिलो-जान > दिल - जान , सुबहो-शाम > सुबह - शाम ,
आसमां > आसमान , ज़मीं > ज़मीन
अश'आर > शेरों , बहूर > बहरों , सवालात > सवालों , मोबाइल्स > मोबाइलों , चैनेल्स > चैनलों

(8) मात्राभार की गणना , संधि - समास , तुकांतता या समान्तता आदि का निर्धारण हिंदी व्याकरण के अनुसार ही मान्य है l

(9) 'गीतिका' में अकार-योग (अलिफ़-वस्ल) जैसे 'हम अपना' को 'हमपना' पढ़ना , पुच्छ-लोप (पद के अंतिम लघु का लोप) जैसे 'पद के अंत में आने पर 'कबीर' को 12 मात्राभार में 'कबीर्' या 'कबी' जैसा पढना , समान्ताभास (ईता-दोष) जैसे 'चलना' और 'बचना' में समान्त दोषपूर्ण मानना आदि हिंदी व्याकरण के अनुरूप न होने के कारण मान्य नहीं हैं l इनके स्थान पर हिंदी भाषा व्याकरण के अपने नियम ही मान्य हैं l

(10) गीतिका के पदों की मापनी उर्दू मापनी (उर्दू बहर) के साथ-साथ किसी सनातनी छन्द या लोक छंद या किसी स्वैच्छिक लय पर भी आधारित हो सकती है l जो भी आधार हो उसका आदि से अंत तक सुनिश्चित अनुपालन होना चाहिए l

(11) गीतिका की चर्चा में हिंदी पदावली को चलन में लाने का प्रयास किया जाएगा किन्तु पहले से प्रचलित उर्दू पदावली की उपेक्षा नहीं की जाएगी l कुछ उदहारण --

युग्म = शेर /... गीतिका = हिंदी ग़ज़ल /... पद = मिसरा /... पुरो पद = मिसरा ऊला /... पूरक पद = मिसरा सानी /... पदान्त = रदीफ़ /... समान्त = काफिया /... मुखड़ा = मतला /... मनका = मक़ता /... प्रवाह = रवानी /... कहन = बयाँ /... शैली = अंदाज़ /... कहन की शैली = अंदाज़े-बयाँ /... मापनी = बहर /... स्वरक = रुक्न /... स्वरकावली = अरकान /... मात्रा भार = वज़न /... कलन = तख्तीअ /... मौलिक मापनी = सालिम बहर /... मिश्रित मापनी = मुरक्कब बहर /... पदांत समता दोष = एबे-तकाबुले-रदीफ़ /... अपदान्त गीतिका = ग़ैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल /... अकार योग = अलिफ़ वस्ल /... पुच्छ लोप = मिसरे के अंतिम लघु का लोप /... समान्ताभास = ईता /... धारावाही गीतिका = मुसल्सल ग़ज़ल

.... इस पदावली में प्रयुक्त पदों के स्थान पर यदि कोई दूसरा अच्छा सुझाव आता है तो उसपर ससम्मान विचार किया जायेगा !

(12) अंततः यह भी स्पष्ट कर देना उपयुक्त होगा कि
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'गीतिका' के रूप में ऐसी प्रत्येक 'ग़ज़ल' मान्य है जिसमे हिंदी व्याकरण की अवहेलना
न हो और उर्दू के दुरूह अप्रचलित शब्दों का प्रयोग न हो l
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उदहारण : -
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हिंदी गजल : 'सच मानिए'
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क्षम्य कुछ भी नहीं, बात सच मानिए !
भोग ही है क्षमा , तात सच मानिए !

भाग्य तो है क्रिया की सहज प्रति-क्रिया ,
हैं नियति-कर्म सहजात सच मानिए !

युद्ध से बच निकलना कला है बड़ी ,
व्यर्थ ही घात-प्रतिघात, सच मानिए !

घूमते हैं समय की परिधि पर सभी ,
कुछ नहीं पूर्व-पश्चात, सच मानिए !

वह अभागा गिरा मूल से , भूल पर -
कर सका जो न दृगपात सच मानिए !

सत्य का बिम्ब ही देखते हैं सभी ,
आजतक सत्य अज्ञात ,सच मानिये !

 .......... ओम नीरव , लखनऊ.

विन्दुवत व्याख्या :-
-------------------

(2) मापनी (बहर) -

२१२ २१२ २१२ २१२ ... अथवा
गालगा गालगा गालगा गालगा ... अथवा
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन

इनमे से पहली प्रणाली को सामान्यतः 'मात्राक्रम' , दूसरी प्रणाली को 'लगावली' और तीसरी प्रणाली को 'अरकान' के नाम से जाना जाता है l

(3) इसमें दो-दो पदों (मिसरों) के छः युग्म (शेर/अश'आर) हैं , कम से कम पांच युग्म होने चाहिए !

(4) पहले युग्म अर्थात मुखड़ा (मतला) के पद तुकांत है , जबकि बाद के प्रत्येक युग्म का पूर्व पद (मिसरा ऊला) अतुकांत और पूरक पद (मिसरा सानी) तुकान्त है ! अंतिम युग्म में उपनाम नहीं आया है , इसलिए इसे मनका (मक़ता) नहीं कहा जा सकता है !

(5) पूरी गीतिका का तुकान्त है - 'आत सच मानिए' , जिसके दो खंड हैं :- पहला समान्त (काफिया) - 'आत' और दूसरा पदान्त(रदीफ़) - 'सच मानिए' ! संक्षेप में --
तुकांत = समान्त + पदांत
आत सच मानिए = आत + सच मानिए

(6) विशिष्ट कहन की बात का निर्णय आप स्वयं करके देखें , जिस युग्म में वह विशेष कहन न हो उसे गीतिका का युग्म न मानें या दुर्बल युग्म मानें !

मित्रों ! विवादों से बचने के लिए मैंने अपनी गीतिका को ही उदहारण के रूप में लिया है जो बहुत उत्तम नहीं है ! बाद में कोई उपयुक्त अन्य उदहारण मिलने पर मैं इसे बदल दूंगा !

गीतिका के सृजन - संवर्धन में आपकी सहभागिता सादर प्रार्थित है ! सप्रेम !




गीतिकालोक (गीतिका विधा में रुचि रखनेवाले मित्र इस समूह में सादर आमंत्रित हैं)

सोमवार, 21 जुलाई 2014

ताँका

(१)
मन से मेघ
पल-पल बदलें
रंग, आकार
कभी मौन धरते
कभी रोते फूट के

(२)
जेठ का वार
आहत पड़ी धरा
सावन वैद्य
करता उपचार
लेपता शीतलता

(३)
सत्यवचन
सावन न बुझाता
आग कोई भी
देखो खड़ी हँसती
क्षुधाग्नि निर्धन की

मंगलवार, 3 जून 2014

सिंह राजाजी की शादी - बाल कविता

भालू नाचे ढोल बजाता
छब्बू गीदड़ गाना गाता
उधर झूमता मटरू तोता
इधर हिनू घोड़े का पोता

चिड़िया तोरणद्वार सजाती
चुमकी बकरी माला लाती
छुटकू खरहा तले कचौरी
बना रहा चिपु बंदर मौरी

दिवस बड़ा शुभ है जो आया
खुशियों की सौगातें लाया
सिंह राजाजी की शादी है
सबको बनना बाराती है

(चित्र अंतरजाल से साभार)

शनिवार, 31 मई 2014

क्यूट-क्यूट है दोस्त हमारी - बाल कविता

बिल्कुल इस गुड़िया के जैसी 
क्यूट-क्यूट है दोस्त हमारी
जब हम कोई खेल खेलते
देती मुझको अपनी बारी

कभी न लड़ती, सदा किलकती
बस खुशियाँ ही बरसाती है
मीठी-मीठी बोली इसकी
हरदम ही दिल को भाती है

थोड़ी नटखट लेकिन अच्छी
आलू टिक्की मन से खाती
शरारतों का मूड चढ़े तो
लाइट बुझा घर में छिप जाती

कुची-कुची हैं गाल टमाटर
आँखें कितनी भोली-भाली
मन करता है इसे खिलाऊँ
रोज मिठाई भर-भर थाली

शुक्रवार, 30 मई 2014

मुक्त उड़ान-हाइकु के क्षेत्र में एक नया हस्ताक्षर कुमार गौरव अजीतेन्दु - समीक्षा - ऋता शेखर 'मधु'

मेरे प्रथम हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान" की समीक्षा आदरणीया ऋता दी के द्वारा.......



मुक्त उड़ान-हाइकु के क्षेत्र में एक नया हस्ताक्षर कुमार गौरव अजीतेन्दु

शुक्तिका प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित हाइकु संग्रह 'मुक्त उड़ान' पढ़ने को मिली| यह युवा हाइकुकार कुमार गौरव अजीतेन्दु जी का एकल हाइकु संग्रह है| पुस्तक के नाम के अनुसार हाइकु परिंदों ने सचमुच में मुक्त उड़ान लगाई है| हर भाव, हर क्षेत्र, हर परिस्थिति , हर उम्र के हाइकु चुनकर लाए हैं अजीतेन्दु के भाव परिंदों ने| पुस्तक का मूल्य मात्र १००/- है| भूमिका के रूप में अपना आशीष भरा हाथ तरुण हाइकुकार के सिर पर रखा है उत्कृष्ट साहित्यकार आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी ने| पूरे ५०० हाइकु वाली पुस्तक पढ़ते हुए मैं कई स्थानों पर स्तब्ध रह गई अजीतेन्दु की परिपक्व सोच पर| कहते हैं न कि युवा पीढ़ी में असीम संभावनाएँ होती हैं वह नवहाइकुकार की रचनाओं में प्रत्यक्ष प्रतीत होती है| अवलोकन करते हैं उनके हाइकु काव्यों का जो आपको भी अचंभित किए बिना न रहेंगे|

कोई भी अनजानी राह पर पथिक का डरा हुआ मन ऐसे ही बोलेगा|

दुर्गम पथ
अनजान पथिक
मन शंकित

जब किशोरावस्था का आरम्भ होता है तो दुनिया मुट्ठी में कर लेने को जी चाहता है|
मन की बेचैनी इस तरह से प्रकट हुई हाइकु में|

पंख हैं छोटे
विराट आसमान
पंछी बेबस


पानी ही पानी
तिनका तक नहीं
डूब जाऊँगा


धुँध छँटेगी
मौसम बदलेगा
भरोसा रखो


किशोर बालक जब कुछ और बड़ा होता है तो कर्म और सपनों के जद्दोजहद में फँसकर कह उठता है|


बुलाते कर्म
रोके अकर्मण्यता
मन की स्थिति


मन की पीर कुछ इस तरह व्यक्त की गई

दिल ने कही
नयनों ने सुनाई
वो पाती तुम्हें

जब समाज के लोगों से पाला पड़ा तो स्वभाव की भिन्नता भी पता चली इस प्रकार से|

एक ही धातु
कोई गढ़े बर्तन
कोई कटार


वो टूटा पत्ता
हवा जिधर भेजे
मजबूर है


अब देखिए किस बारीकी से अजीतेन्दु ने विवेकशील और धूर्त में अन्तर बता दिया|

वो गजराज
तुम एक श्रृंगाल
लड़ोगे कैसे


उच्छृंखलता
आजादी की उड़ान
भिन्न हैं दोनो


एक उदाहरण प्रकृति को मानव जीवन से जोड़ने का प्रयास|

हड़बड़ाते
ज्यों दफ्तर को जाते
भोर में पंछी

धरा की पीर
गगन ने दिखाई
रो पड़े मेघ


युवामन की प्रेमाभिव्यक्ति कितनी मुखर है|

होश ले जाती
तेरे गालों से आती
गंध गुलाबी

तेरी छुअन
छुपा रखी है मैंने
धड़कनों में

झील उद्यान
भ्रमण को निकले
हँस कुँवर

यह वह हाइकु है जिसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया|

नन्हें व्यापारी
डालों पर लगाते
मधु की फैक्ट्री

जीवन में आने वाले सुनहरे अवसरों को समेट लेने का संदेश देने वाला यह  हाइकु कितना कोमल है|

फूल हैं खिले
गूँथ लो जल्दी माला
सूख न जाएँ

बुरा वक्त हमेशा डराता ही है...कैसे इसे हाइकु में देखते हैं|

घिसा न करो
अतीत के चिराग
जिन्न आते हैं

एक ही वस्तु का महत्व दो जगहों पर भिन्न है|

एक नमक
कहीं बने जिन्दगी
कहीं पे मौत

आत्मनिर्भरता का सटीक उदाहरण है ये हाइकु|

लगे जो प्यास
माँगो न पानी कहीं
खोद लो कुँआ

गाँव से निकले हुए बच्चे या लोग शहरों से सीखकर आते हैं तो उसका लाभ अपने गाँव को भी देना चाहते हैं|
इसे बड़ी बारीकी से ढाला है अजीतेन्दु ने अपने हाइकु में|

गाँव को देते
शहरी वातायन
ताजी हवाएँ

अपने संस्कार और अपनी अंतरात्मा की सुनने वाले कवि महोदय के शब्द देखिए|

दिल किले का
दिमाग द्वारपाल
करे सुरक्षा

अब यह हाइकु जो फ़ेसबुक की सच्चाई है

समूहों में भी
'मैं' का एहसास
ले रहा साँसें

पूरे हाइकु पढ़ने के बाद आप भी हाइकुकार गौरव अजीतेन्दु की लेखनी के कायल हो जाएँगे| मन के मुक्त आकाश में विचरण करके मानस हँस ने क्या सुन्दर और चमकीले मोती चुने हैं!! आगे भी अजीतेन्दु जैसे उत्साही और सही सोच वाले लेखक से उत्कृष्ट सृजन की अपेक्षा है| असींम शुभकामनाओं के साथ...ऋता शेखर मधु

पुस्तक परिचय - मुक्त उड़ान (हाइकु संकलन)






















पुस्तक :  मुक्त उड़ान

विधा : हाइकु (500 हाइकु संकलित)

प्रकार : पेपरबैक

पृष्ठ : 108

संस्करण : प्रथम

मूल्य : 100/- रुपये (कोई डाकखर्च नहीं)

लेखक : कुमार गौरव अजीतेन्दु

भूमिका : आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

आईएसबीएन : 978-81-925946-8-2

प्रकाशक : शुक्तिका प्रकाशन, कोलकाता

पुस्तक मँगवाने के लिए संपर्क करें :

सुरेश कुमार चौधरी
शुक्तिका प्रकाशन, 508 न्यू अलीपुर मार्केट कॉम्प्लेक्स
न्यू अलीपुर, कोलकाता - 700053
मोबाइल: 09830010986
ईमेल: skchoudhary2005@gmail.com

गुरुवार, 15 मई 2014

हाइकु गीत - आप हमारे

मस्त नजारे
नभ, चाँद-सितारे
आप हमारे

स्वप्न सजे हैं
दिल झूम उठा है
साज बजे हैं
प्रीत लगायी
धड़कन लौटायी
बने सहारे

जीवन जागा
अब हुआ उजाला
तम है भागा
ऋतु बासंती
कोयल मदमाती
हमें दुलारे

साँसें महकीं
हैं भाव हुलसते
आँखें बहकीं
बाग-बगीचे
तितली इठलाती
लगते प्यारे

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

गप्पू बंदर - बाल कविता (चौपई छंद)














गप्पू बंदर था बदमाश
काम एक था उसका खास
चुरा-चुरा के खाता आम
करता औरों को बदनाम

सब पशुओं ने की तब राय
मिलकर सोचा एक उपाय
गधा कैमरा लाया भाग
उसे लगाया फल के बाग

गप्पू जब आया उस रात
उसको पता न थी ये बात
हुई रिकॉर्डिंग, गप्पू चोर
कह दौड़े सब उसकी ओर

जम के पड़ी, खिंचाये कान
सुधर गया गप्पू शैतान
अगले दिन ही खोली शॉप
लगा बेचने आलू चॉप

कामरूप छंद

भोला न बोलें, राज खोलें, "लोक" का भी आप।
शासन थमाते, जो गलत को, मन उन्हीं के पाप॥
"तंत्र" जो बिगड़ा, देश पिछड़ा, सभी भागीदार।
नेता अकेले, दोष झेले, यह नहीं स्वीकार॥

नेता मिले वो, "छूट" दे जो, सोचता ये कौन?
उत्कोच पाकर, वोट बेचें, शातिरों से मौन॥
रखते सदा जो, जाति जिन्दा, हृदय तले सँभाल।
रहते पढ़े पर, अनपढ़ों से, खूब करें बवाल॥

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

मधुमालती छंद

तुम श्वास हो, सुख-गीत हो
मेरी प्रिया, मनमीत हो
दिल में जगा विश्वास हो
रह दूर भी नित पास हो

मनमोहन छंद

चलो बढ़ाएँ आज कदम
बनें दिवाकर, लें हर तम
मिटे हृदय से द्वेष, भरम
करें राष्ट्रहित सभी करम

रविवार, 13 अप्रैल 2014

मुक्तिका - यादें तुम्हारी

इल्लियाँ शक की चमन में छा गईं।
प्यार की कलियाँ सभी मुरझा गईं।

कर अँधेरों से लगे ज्यों साँठगाँठ,
आँधियाँ दीपक बुझाने आ गईं।

दोमुँहेपन की मिली उसको सजा,
धड़कनें उसकी उसे ठुकरा गईं।

जानकर अनजान बनने को विवश,
हाय! स्थितियाँ हाल ये करवा गईं।

आज भी यादें तुम्हारी आ सनम,
फिर कदम मेरे बहुत बहका गईं।

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मुक्तिका - उपवन इक हम भी यदि होते

उपवन इक हम भी यदि होते।
नहीं तरस पुष्पों को रोते।

रंग नित्य करते आलिंगन,
संग-संग ही जगते-सोते।

हर्ष-तितलियाँ करतीं क्रीड़ा,
लगवातीं मस्ती में गोते।

बहा सुगंधों की सलिलाएँ,
उनमें सबके हृदय डुबोते।

प्रीत सखी का हाथ थामकर,
सुखमय, पावन स्वप्न सँजोते।

नटखटपन होता हममें भी,
"गौरव" हँसी नहीं यों खोते।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

बरवै मुक्तिका - मचले भाव

मौसम जो दिखता था, बड़ा उदास।
भरा आपने उसमें, नव उल्लास।

स्वप्न-कोयलें चहकीं, देख बसंत,
हृदयतलों में फैला, पुनः उजास।

सुनी आहटें कोमल, मचले भाव,
लगा आ गई मंजिल, दिल की पास।

साँसों का आलसपन, भागा दूर,
लगीं काम में वो सब, लिए हुलास।

जिह्वा को तो थामे, बैठी लाज,
प्रणय निवेदन का दृग, करें प्रयास।

लगा आज फिर लगने, जीवन मित्र,
कंठ लगाया हमको, दे विश्वास।

मुक्तिका - आप आते

आप आते।
जान लाते।

जिंदगी को,
जगमगाते।

धड़कनों में,
मुस्कुराते।

ख्याल बनकर,
मन लगाते।

प्यास दिल की,
झट बुझाते।

शनिवार, 29 मार्च 2014

नवसंवत्सर आ गया - कुंडलिया

नवसंवत्सर आ गया, जागी नयी उमंग।
हर्ष, स्वप्न, विश्वास भी, लाया है वो संग॥
लाया है वो संग, कामनाओं की कलियाँ,
सजा पुनः मन-खेत, उगी उर्जा की फलियाँ।
आशाएं हों पूर्ण, भरे सुख से सबका घर,
बोले जन-जन झूम, नमन हे नवसंवत्सर॥

रविवार, 23 मार्च 2014

मुक्तिका - अन्यायों का दौर चला है

अन्यायों का दौर चला है।
हृदय-हृदय में क्रोध पला है।

मौनव्रती हो जाओ सारे,
अब तो लगता यही भला है।

उस-उसका अस्तित्व मिट गया,
समय संग जो नहीं ढला है।

तुम विश्वास न करते मुझपर,
ये ही मुझको बहुत खला है।

कुरूपता वो क्यों ना चाहे,
सुंदरता ने जिसे छला है।

जुल्फें उसकी नागिन जैसी,
सच कहता हूँ बुरी बला है।

चलो आठवाँ अचरज देखो,
पत्थर कैसे पड़ा गला है।

डटे रहो मोर्चेपर वीरों,
खतरा पूरा नहीं टला है।

किसी मिथ्य को तथ्य बनाना,
बड़ी लोकप्रिय हुई कला है।

धुँआ नहीं बस गंध आ रही,
लगता कोई स्वप्न जला है।

बैर कहाँ बाकी है "गौरव",
जबसे प्रेम-गुलाल मला है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

प्यारी गौरैया - कुंडलिया















गौरैया तेरे असल, दोषी हम इंसान।
पाप हमारे भोगती, तू नन्हीं सी जान॥
तू नन्हीं सी जान, घोंसलों में है रहती,
रसायनों का वार, रेडिएशन क्या सहती।
इक मौका दे और, उठा मत अपने डेरे,
मानेंगे उपकार, सदा गौरैया तेरे॥

गुरुवार, 20 मार्च 2014

दोहा मुक्तिका - हम तो बने पतंग

भाव सभी पाने लगें, शब्दों का यदि संग।
जाने इस संसार का, क्या होगा तब रंग।

तम के कारागार में, अरसे से हैं आप,
हँस लेते कैसे सदा, देख हृदय है दंग।

नयी समस्या आ रही, मुँह बाये क्यों नित्य,
बदल जरा देखो प्रिये, अब जीने के ढंग।

कितने हैं जो पा रहे, प्रेम-नगर में शांति,
अपनी मित्रों बन गई, एक रात ही जंग।

अधरामृत कब के पिया, अबतक चढ़ा खुमार,
जबकि उतर जाती रही, कुछ घंटों में भंग।

उसने भी लगता किया, कभी अंधविश्वास,
घूम रहा है आजकल, मारा, नंग-धड़ंग।

डोर किसी के हाथ में, घाती चारों ओर,
"गौरव" पूछो हाल मत, हम तो बने पतंग।

रविवार, 16 मार्च 2014

होलीमय कुंडलियाँ

(1)
होली की मस्ती चढ़ी, मची धूम चहुँओर।
सभी खुमारी में मगन, रहा न खुदपर जोर॥
रहा न खुदपर जोर, भंग पी ली ही हमने,
उसका तगड़ा असर, कदम न देता थमने।
नाच रहे ले ढोल, संग मित्रों की टोली,
मन में नयी उमंग, जगा देती है होली॥

(2)
अंबर भी दिखता खिला, हँसती दिखे जमीन।
कैसे फिर न हो भला, मन अपना रंगीन॥
मन अपना रंगीन, बहकने को आतुर है,
उसको देता जोश, फागुनी मीठा सुर है।
सारा गाँव-समाज, दीखता मानों इक घर,
बरसाता आशीष, नेह में डूबा अंबर॥

(3)
दोहे पीटें ढोल तो, रोला मस्त मृदंग।
छंदोंपर मस्ती चढ़ी, देख हुआ दिल दंग॥
देख हुआ दिल दंग, भंग पीती कुंडलिया,
छप्पय संग अहीर, बना बरवै है छलिया।
तरह-तरह के वेश, बना सबका मन मोहे,
होली में मदहोश, सवैया, आल्हा, दोहे॥

(4)
सच्चे दिलसे बोलते, नित हम बारंबार।
साथी तेरा साथ ही, होली का त्योहार॥
होली का त्योहार, हमारा तुझपर निर्भर,
तुझसे ही सुख-चैन, तुझी से खिलता है घर।
हमको नहीं पसंद, रंग बाजारू कच्चे,
जिनमें तेरी प्रीत, वही बस लगते सच्चे॥

(5)
होली बंधक न बने, कुछ धनिकों के पास।
निर्धन को भी हो जरा, फगुआ का अहसास॥
फगुआ का अहसास, मस्त कर दे घर-घर को,
फूँके सब संताप, मिटा हर मन से डर को।
व्यापे हर्षोल्लास, हवा में गूँजे बोली,
बुरा न मानो मीत, झूम लो आई होली॥

(6)
होली से क्या चाहना, दिल में हो यदि प्यार।
जीवन में खुशियाँ रहें, क्षण-क्षण है त्योहार॥
क्षण-क्षण है त्योहार, अगर सच हों सब सपने,
लगें समझने अर्थ, सभी रिश्तों का अपने।
साँस-साँस हो तृप्त, लगे धड़कन हमजोली,
दीवाली हर रात, मनेगी नित ही होली॥

(7)
काले-काले केश हैं, नीले, गहरे नैन।
गाल गुलाबी देख के, आता हमको चैन॥
आता हमको चैन, मधुर सी सुनकर बोली,
सच तो ये है मीत, तुम्हीं हो अपनी होली।
पाकर तुमसे प्रीत, हुए हम हैं मतवाले,
भूले बुरा अतीत, मिटे धब्बे सब काले॥

(8)
आओ सारे मिल करें, कुछ ऐसा हुड़दंग।
विश्वजीत भारत बने, रह जाएं रिपु दंग॥
रह जाएं रिपु दंग, मने अबकी वो होली,
भगवा मलें गुलाल, रंग बन छूटे गोली।
अपना जौहर आज, राष्ट्रपुत्रों दिखलाओ,
थाम हाथ में हाथ, अटल प्रण लेकर आओ॥

(9)
मन में हो शालीनता, निर्मल, कोमल भाव।
जगा सकेंगे आप तब, होली के प्रति चाव॥
होली के प्रति चाव, नहीं कीचड़ से होता,
मिट्टी, गोबर, लीद, देख हर सज्जन रोता।
प्यारे रंग, गुलाल, उड़ा रँगिए सबका तन,
जगे स्नेह, विश्वास, पुष्प सा खिल जाए मन॥

(10)
लज्जा को मत भूलिए, चाहे जो हो पर्व।
ऊँचा होगा नाम औ', लोग करेंगे गर्व॥
लोग करेंगे गर्व, आपसे हाथ मिलाकर,
सुख देंगे त्योहार, स्वयं ही घर में आकर।
अच्छा, स्वच्छ चरित्र, मनुज जीवन की सज्जा,
उसका जीना व्यर्थ, त्याग दी जिसने लज्जा॥

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

महाशिवरात्रि पर विशेष





















रक्षा की ब्रह्मांड की, किया गरल का पान।
शरण हमें भी दिजिए, हे शंकर भगवान।
आदिदेव हैं आप ही, नाथों के हैं नाथ,
त्राण दिलाता कष्ट से, नित्य आपका ध्यान॥

भारतीय सेना के सम्मान में एक घनाक्षरी



















जीभ रक्त माँगती है भारती के शत्रुओं का, नैनों में भरा प्रचंड तेज और ज्वाल है।
वज्र के समान देह, थाम लेते आँधियों को, साँस-साँस चक्रवात सी ही विकराल है।
शूर हैं महान, विश्व धाक मानता सदैव, शोभता गले में नित्य जीत का जो माल है।
ओजवान, शक्तिवान, वीर्यवान, धैर्यवान, हैं इन्हीं के कर्म जो तना हमारा भाल है॥

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

आशुनिकुञ्ज सवैया - आया भालू (बाल रचना)





























(चित्र नेट से साभार)

गीत - साँसों की ये गर्म हवाएं

साँसों की ये गर्म हवाएं
सारा दिन बतियाती हैं

खंडहरों से नोंच-नोंचकर
कभी पुराने किस्से लातीं
कभी समंदर तल में मचती
उथल-पुथल का हाल सुनातीं
नहीं सुनी जिसदिन भी इनकी
रात स्वप्न में आती हैं

राहों से अनजान स्वयं हैं
मददगार लेकिन बन जातीं
महक अनुभवों की लाकर ये
काफी कुछ आसान बनातीं
देख पड़ावों को जाने क्यों
अर्थ भरे मुस्काती हैं

अपनी सी महसूस हुईं तो
कभी परायापन भी छलका
दोनों ही भावों से अक्सर
नयनों से पानी है ढलका
वैसे में इनसे जो बनता
आकर खुद समझाती हैं

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

गीत - तन्हाई से बढ़के कोई

जब-जब रोया हूँ जीवन में
गले लगाया, दिया सहारा
तन्हाई से बढ़के कोई
और नहीं है मीत हमारा

साथ निभाती है ये हरदम
नित पलकों तले बिठाती है
वफा इसी की सोने जैसी
ना झूठी कसमें खाती है
विह्वल हो जाती मेरे बिन
कर ना पाती तनिक गुजारा

शब्दों में जादू है इसके
जख्मों का मरहम बन जाती
प्रिया, प्रेयसी ये ही मेरी
दिखा अदाएं दिल बहलाती
संग बुला लेती सपनों में
लगती माँझी, नाव, किनारा

दगाबाज तो मैं हूँ यारों
बार-बार है इसे रुलाया
क्षमाशील ये बड़े हृदय की
सबकुछ इसने सदा भुलाया
बाँहें फैला पल-पल इसने
बड़े प्यार से मुझे पुकारा

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

गणतंत्र दिवसपर विशेष

अब कैसा शिकवा-गिला, अब तो सभी स्वतंत्र।
जैसे "गण" इस देश के, वैसा ही "गणतंत्र"॥

कैसे इस गणतंत्र पर, करें बताओ गर्व।
खानापूरी रह गये, सभी राष्ट्रीय पर्व॥

ना "गण" हैं, ना "तंत्र" है, है तो केवल स्वार्थ।
सड़कोंपर कुचला पड़ा, पुरखों का परमार्थ॥

"गण" खुद "तंत्र" बिगाड़ते, खुद होते हलकान।
असल समस्या है यही, इसका करो निदान॥

आजादी के बाद "गण", करते इक ही काम।
इच्छाओं के बन रहे, तिल-तिल रोज गुलाम॥

अभियंता के दोष से, बिगड़ा करते यंत्र।
"गण" के अंदर दोष हो, तो बिगड़े "गणतंत्र"॥

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती (२३ जनवरी) पर विशेष
















देश ये सुभाषचंद्र बोस जैसे वीर का है, सोच-सोच यही हमें नाज बड़ा होता है।
उनका विचारमात्र ही दिलों की परतों में, राष्ट्रवाद के नवीन बीज कई बोता है।
बोस के चरणचिन्ह राह दिखलाते हमें, मन उनसा होने के सपन सँजोता है।
आज के सुभाष आप-हम चलो बन जाएं, आज फिर भारत गुलाम बना रोता है॥

शेर थे सुभाष जो सियारों से न घबराए, मार के दहाड़ टूट पड़े रिपुदल पे।
तेज, वेग था प्रचंड, रोम-रोम शस्त्र सा था, भारी पड़ता था सारे छलियों के छल पे।
दिल में दहकता था लावा निशिदिन पर, खेलती थी हँसी सदा मुख के पटल पे।
देश के सपूत थे, महान, अनुकरणीय, टकराए आँधियों से बाजुओं के बल पे॥

रोला छंद

देखूँ आज बहार, हुई इच्छा ये जब-जब।
कैसा ये संयोग, नजर आयी तुम तब-तब।
बनके छटा हसीन, फिजां में छा जाती हो।
ख्वाबों को भी चूम, हकीकत बनवाती हो॥

पाकर तेरी प्रीत, जिंदगी का रस पाया।
लहरा तूने केश, साँस लेना सिखलाया।
बड़ा सुखद संयोग, मिलन ये तेरा-मेरा।
ज्यों फूलों के बाग, तितलियों का हो डेरा॥

दो रोला छंद















सुलगे जीवन आँच, बनी ईंधन ये काया।
तोड़-तोड़ के हाड़, कलेजा मुँह को आया।
हलक मचाता शोर, पिला दूँ उसको पानी।
बाकी पूरी जंग, खून की रहे रवानी॥

पत्थर हैं निष्प्राण, मगर मुझमें जीवन है।
शीतलता का घूँट, माँगता मेरा तन है।
दूर अभी है साँझ, मुझे फिर जुट जाना है।
बुला रहे हैं कर्म, उन्हें भी निपटाना है॥

रविवार, 5 जनवरी 2014

जुगलबंदी (हाइकु की)

(१)
साँसों के संग
भरता हूँ सीने में
तुमको ही मैं
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सीने में जा के
चूमी हैं धड़कनें
मैंने तुम्हारी

(२)
तेरी आहटें
दिल को लगती हैं
प्रणय-धुन
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मेरी आहटें
ढूँढती हैं हमेशा
साथ तुम्हारा