सोमवार, 25 नवंबर 2013

गीत - अकुलाहट की फांस चुभी है

अकुलाहट की फांस चुभी है
मन में टीस उठाती है

ऊँचाई को तरस रहा दिल
पंछी रोज बुलाते हैं
पंखहीनता के पिंजरे में
अरमां गुम हो जाते हैं
लाचारी डायन सी बैठी
मंद-मंद मुस्काती है

घायल भावों की गठरी का
बोझ बढ़ा ही जाता है
उठा-उठा के शब्द थके हैं
छलक पसीना आता है
लंबा रस्ता अजगर दिखता
मंजिल लगे चिढ़ाती है

पास लगा है जीवन-मेला
इच्छाएं बलखाती हैं
सवारियाँ जातीं जो उसतक
भरी-भरी सब आतीं हैं
पीड़ा कुछ दिल में रह जाती
कुछ आँखों तक आती है

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