सोमवार, 18 नवंबर 2013

सौ हाइकु

(१)
दुर्गम पथ
अनजान पथिक
मन शंकित

(२)
प्रकृति माता
स्नेहमयी आँचल
करे पालन

(३)
साँस व्यथित
धड़कनें क्रंदित
हताश मन

(४)
पंख हैं छोटे
विराट आसमान
पंछी बेबस

(५)
मुक्त उड़ान
बादलों का नगर
दिल का ख्वाब

(६)
स्वतंत्र छाया
शक्तिशाली मुखौटा
गंदा मजाक

(७)
भागमभाग
अंधी प्रतिस्पर्धाएँ
टूटते ख्वाब

(८)
विषैली हवा
मोबाइल टावर
गौरैया लुप्त

(९)
अंधा सम्राट
लिप्सा, महत्वाकांक्षा
महाभारत

(१०)
जीवन वृक्ष
आजादी जड़, तना
चेतना पत्ते

(११)
जा रही ठंढ
नाचता पतझड़
आता बसंत

(१२)
आपसी प्यार
समर्पण, विश्वास
घर की नींव

(१३)
तृप्त हृदय
खिलखिलाती साँसें
जीवन सुख

(१४)
हृदय विश्व
मन अपना देश
चुनना तुम्हें

(१५)
रात झरोखा
चंद्र खड़ा निहारे
तारों के दीप

(१६)
मैना के किस्से
डाल-डाल की बातें
तोते से पूछो

(१७)
काँटों का शह्र
गुलाबों के महल
कैसा रहस्य

(१८)
तुष्टिकरण
छद्मनिरपेक्षता
सर्वनाशक

(१९)
घाती घर में
बेटों रहो सतर्क
राष्ट्र का प्रश्न

(२०)
फैली दिव्यता
हटे तम के तंबू
हुआ सवेरा

(२१)
जिम्मेदारियाँ
अपनी आकांक्षाएँ
कशमकश

(२२)
नहीं अभाव
वितरण का खोट
जन्मा आक्रोश

(२३)
सीधा न सादा
"तेज" हो गया ज्यादा
आम आदमी

(२४)
खोखलापन
भ्रामक आवरण
सर्वसुलभ

(२५)
खुद में खोट
राजनेता को दोष
पुराना ट्रेंड

(२६)
पन्ने पुराने
यादों के खंडहर
पड़े अकेले

(२७)
साँसों की भाषा
धड़कनों की बातें
पिया ही बूझे

(२८)
मन की पीर
उफनते जज्बात
गीत के बोल

(२९)
काँटों से तीक्ष्ण
जलाते पल-पल
अधूरे ख्वाब

(३०)
तन्हाई दर्द
तन्हाई ही ढाढस
तन्हा जिंदगी

(३१)
वक्त मदारी
जीवन बंदरिया
सत्य तो यही

(३२)
पथिक अंधा
अनजान सड़क
बुरा है अंत

(३३)
मन-पखेरू
व्यग्रता बने पंख
उड़ा जा रहा

(३४)
दर्द के तूफाँ
निराशा का भँवर
माँझी कहाँ हो

(३५)
पानी ही पानी
तिनका तक नहीं
डूब जाऊँगा

(३६)
मीत मिलेगा
कब फूल खिलेगा
पूछे पुरवा

(३७)
जीवन-अर्थ
साँस-साँस का प्रश्न
क्या दूँ जवाब

(३८)
हारा हृदय
दिवास्वप्न व्यसन
चुभते पल

(३९)
तम के जाले
अनिश्चिय की धूल
ढँकी चेतना

(४०)
धुंध छँटेगी
मौसम बदलेगा
भरोसा रखो

(४१)
हवा है मीत
नाचता संग-संग
बूढ़ा पीपल

(४२)
निकला चाँद
विरहन देखती
मिला सहारा

(४३)
एक शिखर
दूसरा तलहटी
मिलन कैसा

(४४)
हंसों का जोड़ा
प्रेम का साक्षी चाँद
झील बिछौना

(४५)
हो गयी रात
बल्ब जले तारों के
मस्ती में चाँद

(४६)
खुद को कोसे
निहारे आसमान
ताड़ अकेला

(४७)
नभ दे वर
हरियाली दुलारे
वन्यजीवन

(४८)
आस के मोती
धड़कनों की डोर
जीवनमाला

(४९)
तारों की टोली
चंद्रमा का अँगना
निशा का गाँव

(५०)
चेतना-वृक्ष
भावनाओं की डालें
काव्य ही फल

(५१)
बुलाते कर्म
रोके अकर्मण्यता
मन की स्थिति

(५२)
विषैली गैसें
नाभिकीय कचरे
रोती प्रकृति

(५३)
नभ की पीड़ा
पवन की उदासी
दिल जलाती

(५४)
मेघों को दिया
समंदरों में बाँटा
बचे ही आँसू

(५५)
जीवन युद्ध
जिजीविषा ही शस्त्र
धर्म कवच

(५६)
झुग्गी में कार
याचक बने राजा
आया चुनाव

(५७)
नंगे से नृत्य
सट्टेबाजी, फरेब
कैसा ये खेल

(५८)
दिल ने लिखी
नयनों ने सुनाई
वो पाती तुम्हें

(५९)
मेघा भी रोये
मयूरों ने मनाया
माने न मेघ

(६०)
धरती फटी
बादल रहे रूठे
दुखी किसान

(६१)
भोर रिझाती
शाम दिल चुराती
मेघों के देश

(६२)
तोड़े बंधन
पा लिया आसमान
जन्म सफल

(६३)
त्यागो संशय
छानो गहराईयाँ
मोती मिलेंगे

(६४)
कँटीली झाड़
दकियानूसी रीति
हटाने योग्य

(६५)
सुअवसर
दुष्टों का नाश करो
युद्ध न टालो

(६६)
अति उदार
अप्रत्यक्ष अधर्मी
साक्षी अतीत

(६७)
शाम दीवानी
सजी हैं महफिलें
हम अकेले

(६८)
रात अंधेरी
निशाचरों की बेला
भोर हो जल्दी

(६९)
बिम्ब ही मोती
अलंकार नगीने
हाइकुमाला

(७०)
कोयल मौन
उपवन उदास
कैसा बसंत

(७१)
थोथी अहिंसा
रीढ़हीन सिद्धांत
आत्मघातक

(७२)
आत्महीनता
मजनुइया इश्क
कुंठाजनक

(७३)
स्नेह का लेप
उत्तम उपचार
भरता घाव

(७४)
कच्चे जज्बात
फकत मौजमस्ती
प्यार का नाम

(७५)
वासना जन्मी
प्यार ने कहा विदा
होंगे कुकर्म

(७६)
श्वेत वो मूर्ति
कोयला है पड़ोसी
दाग का डर

(७७)
उठा लो शस्त्र
धर्मयुद्ध प्रारंभ
है निर्णायक

(७८)
कौओं की एका
चींटी की उदारता
सीख मानव

(७९)
एक ही धातु
कोई गढ़े बर्तन
कोई कटार

(८०)
मायावीलोक
आहट से समझो
नैनों को पढ़ो

(८१)
मृत्यु का लोक
जीवन को ढूँढता
तन नादान

(८२)
देखा मंजर
विस्फोट, आग, धुँआ
उबला रक्त

(८३)
चूड़ी-कंगना
बिंदिया, वो सिन्दूर
बने "लो क्लास"

(८४)
उड़े-उड़े से
चेहरा ज्यों छिपाते
वफा के रंग

(८५)
आस न रखो
आरोप न लगाओ
वो आश्रित है

(८६)
दुर्भाग्यशाली
अंग-अंग गुलाम
कठपुतली

(८७)
खिली वादियाँ
महकता चमन
वफा तुम्हारी

(८८)
नभ तो भ्रम
धरती ही प्रणम्य
आश्रयदाता

(८९)
जड़ों से प्यार
नभ करे सलाम
धरतीपुत्र

(९०)
प्रचंड तेज
हम हैं सनातनी
गर्व है हमें

(९१)
बूँदों का चित्र
सूरज भरे रंग
इन्द्रधनुष

(९२)
मेघों का नीर
धरा की अमानत
कहता नभ

(९३)
रंग उड़ातीं
ज्यों पुष्पों को चिढ़ाती
ये तितलियाँ

(९४)
भौंरों से खेला
गाल गोरी के चूमे
पुष्प वो सूखा

(९५)
चुभते ख्वाब
सागर को तरसे
ताल की मीन

(९६)
धुँए से लोग
साथ कष्टदायक
दम घुटता

(९७)
कुत्ते दहाड़े
नाचा खुद मदारी
वक्त का खेल

(९८)
विज्ञानी शत्रु
यांत्रिक शर-शूल
बिंधा ओजोन

(९९)
प्राप्त को खोना
अप्राप्य की लालसा
मानववृत्ति

(१००)
भ्रम के धब्बे
गगन की कालिख
भोर ने धोयी

4 टिप्‍पणियां:

  1. गजब-
    कुछ ज्यादा हो गए एक साथ
    आदरणीय-

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    1. बहुत-बहुत आभार आपका आदरणीय रविकर सर..........

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  2. umda haikuz or bhi post dekhe sabhi sundar ..haiga bhi uttam .. par me ravikar ji ki baat se sahamt hu kuchh jyada ho gaye ek sath ... :)

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    1. आपका हार्दिक स्वागत है आदरणीया सुनीता जी। प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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