बुधवार, 18 सितंबर 2013

पाँच बरवै

इस दुनिया में जो भी, पिये शराब।
खुद ही अपना जीवन, करे खराब॥

मद्यपान है घातक, समझें आप।
करा रहा यह जग में, कितने पाप॥

कर अपने अंतर्मन, को खामोश।
दारू पीकर मानव, खोता होश॥

भाई सच को देखो, आँखें खोल।
पैसे देकर लेते, विष क्यों मोल॥

अस्त-व्यस्त से कपड़े, बिखरे केश।
पियक्कड़ों का हरदिन, का यह वेश॥


6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीया रिचा जी

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  2. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (20-09-2013) के चर्चामंच - 1374 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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    1. आपका हार्दिक आभार प्रिय मित्र अरुन शर्मा जी

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  3. सुन्दर बरवै छंद .....
    मधुर सुहाने बरवै, दिए रचाय
    माँ सरस्वती प्रतिदिन,रहें सहाय|

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