शनिवार, 21 सितंबर 2013

धर्म के विरुद्ध नित्य षडयंत्र हो रहे हैं - घनाक्षरी

धर्म के विरुद्ध नित्य षडयंत्र हो रहे हैं, पुष्प राष्ट्रवाद का भी आज कुम्हला रहा।
आसुरी प्रवृत्तियों से त्राहि-त्राहि साधुता है, एक अँधियारा मानो गगन में छा रहा।
दुःख की तो बात है कि सबकुछ देख के भी, तरुणों के रक्त में उबाल नहीं आ रहा।
किसकी नजर लगी भारत की वीरता को, शूकरों का झुंड खड़ा शेर को चिढ़ा रहा॥

महाराणा प्रताप के वंशज किधर गये, पृथ्वीराज चौहान के पूत कहाँ खो गये।
दिखते नहीं महान शिवाजी के बेटे भी तो, लगता है ये सब अतीत में ही सो गये।
काट रहे गोरी औ' औरंगजेब क्रूरता से, हिंदुत्व की फसलों को पुरखे जो बो गये।
साम, दाम, दंड, भेद का चला कुचक्र ऐसा, बचे-खुचे नाहर भी पामर से हो गये॥

अपने ही देश का विनाश करने चले हो, अरे कुलघातियों बहुत पछताओगे।
नीड़ जब तिनके समान बिखर जाएगा, बरसात में सोचो कहाँ सिर छुपाओगे।
क्षणभर के लिए नहीं देगा शरण कोई, घुट खुले आसमां के नीचे मर जाओगे।
वर्तमान से तो गालियाँ हजार मिलेंगी ही, भविष्य में भी सदा कलंक कहलाओगे॥

वक्त दे रहा है एकबार फिर मौका तुम्हें, शूल ये विधर्मिता का जड़ से उखाड़ दो।
मटमैला सा पड़ा है देशदर्पण जो आज, आओ सुतों सब मिल धूल सारी झाड़ दो।
योजनाएं बन रही राष्ट्र के विरुद्ध जो भी, पौरुष दिखाओ सारी योजना बिगाड़ दो।
वीर हो महान तुम पकड़ के शत्रुओं को, एक पटकन में ही भू पर पछाड़ दो॥

3 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्कार आपकी यह रचना कल रविवार (22--09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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    1. हार्दिक आभार प्रिय मित्र अरुन शर्मा जी

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  2. बहुत सुन्दर भाव रचना अजितेंदु जी, हार्दिक बधाई

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