बुधवार, 18 सितंबर 2013

सही समय का सही निर्णय - बाल कहानी

चंदनवन में आज फिर पंचायत बुलाई गई थी। मोटू भालू और झक्का भेड़िये के बीच हुए झगड़े के मामले में फैसला सुनाया जाना था। सरपंच ढुलढुल छछूंदर पगड़ी बाँधे रौब से बाकी चार पंचों भुलभुल गदहा, चंकू बिल्ला, छिप्पू खच्चर और भंगू सियार के साथ बैठे थे। कार्यवाही शुरु हुई।

मोटू भालू ने पहले कहा - "सरपंच जी, कल शाम को मैं रोजाना की तरह अपनी दुकान बंद कर घर लौट रहा था। लगभग ७ बज रहे थे। तभी रास्ते में इस झक्का ने मुझसे मारपीट की और मेरे पास मौजूद पाँच हजार रुपये छीन लिए। वो मेरी हफ्तेभर की कमाई थी। अगर मुझे वो रुपये वापस नहीं मिले तो मैं इस हफ्ते राशन भी नहीं खरीद पाऊँगा। मैं और मेरा परिवार भूखे मर जाएँगे। न्याय करें सरकार, कृपया न्याय करें" कहते-कहते मोटू रो पड़ा।

अब बारी झक्का भेड़िये की थी। उसने अपने उपर लगे आरोप को सिरे से नकारते हुए कहा - "ये सरासर झूठ बोल रहा है सरपंच जी। मैं तो कल शाम ६ बजे के बाद अपने घर से बाहर निकला ही नहीं। मेरी फेवरेट फिल्में टीवीपर आ रहीं थी। वहीसब देख रहा था। फिर मैं इसके रुपये कैसे छीन सकता हूँ? ये मुझे न जाने क्यों फँसाने की कोशिश कर रहा है। न्याय करें सरकार" कहता हुआ झक्का कुटिलता से मुस्कुराया।

"हम्म, तो ये मामला है। मोटू तुम्हारे पास कोई गवाह है?" सरपंच ढुलढुल छछूंदर ने पूछा।

"जी सरकार, जहाँ ये घटना हुई वहाँ से थोड़ी ही दूर पर चमकू बंदर और हनु हाथी की दुकानें हैं। उन्होंने सब अपनी आँखों से देखा है"

"चमकू बंदर और हनु हाथी को हाजिर किया जाए"

दोनों हाजिर हुए। चमकू बोला - "जी सरपंच जी, मोटू सही कह रहा है। झक्का ने उससे पैसे छीने हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा है"

हनु ने भी मोटू के ही पक्ष में गवाही दी - "जी सरपंच जी, मैंने झक्का को मोटू से रुपये लूटकर भागते अपनी आँखों से देखा है"

"झक्का, तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत है कि तुमने गुनाह नहीं किया?" ढुलढुल छछूंदर ने झक्का से भी पूछा।

"नहीं सरकार, मेरे पास कोई सबूत नहीं। मैं तो घर में था" झक्का फिर कुटिलता से मुस्कुराते हुए बोला।

सरपंच ढुलढुल छछूंदर ने बाकी पंचों से राय-मशविरा करने के बाद फैसला सुनाते हुए कहा - "हम्म, हमने सारा मामला सुना। इतना तो तय है कि मोटू से रुपये लूटे गये। लेकिन ये बात साबित नहीं हो पाई कि रुपये झक्का ने ही लूटे। हनु और चमकू की गवाही जरूर इस ओर इशारा कर रही है कि दोषी झक्का है परंतु जब ये घटना हुई उस समय शाम के ७ बज रहे थे। उस समय काफी अँधेरा होता है। दोनों ने सही ही देखा इस बात की कोई गारंटी नहीं। हो सकता है उन्हें भ्रम हुआ हो। अतः ये पंचायत झक्का को संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी करती है। हम कोतवाल बहादुर कुत्ते को आदेश देते हैं कि इस मामले की जाँचकर असली मुजरिम को गिरफ्तार करे। पंचायत समाप्त हुई"

मोटू फैसले से अवाक रह गया। वो बिलख-बिलखकर रोने लगा। हनु और चमकू भी दंग थे। सब सरपंचों को कोसते हुए धीरे-धीरे अपने-अपने घर लौट गये।

दरअसल इस तरह के अन्यायपूर्ण फैसले चंदनवन के लिए कोई नये नहीं थे। ये हमेशा की बात हो गई थी। चंदनवन में भालुओं की संख्या सबसे अधिक थी किन्तु उनमें एकता का अभाव था। बात-बातपर लड़ते रहते। भेड़िये संख्या में भालुओं से एक चौथाई ही थे लेकिन एकजुट थे। जब-जब वन में चुनाव आते वो अपने किसी चमचे छछूंदर, गदहे, सियार या गिरगिट को ही वोट देकर पंच, सरपंच आदि बनवा देते। बदले में उनसे अपने लिए ढेरों सुविधाएं माँग लेते। वो बिकाऊ पंच सदा भेड़ियों की तरफदारी करते थे। वन में हाथी, बंदर, हिरण आदि जानवर नाममात्र के ही थे। सो वो भी खुलकर भेड़ियों के इस गड़बड़झाले के विरुद्ध आवाज नहीं उठा पाते थे।

लेकिन आज के फैसले ने सारे जानवरों में एक गुस्सा भर दिया। आँखों देखी बात झुठलाकर लिया गया गलत निर्णय उनके गले नहीं उतर पा रहा था। अगले ही दिन एक सभा हुई। सारे जानवर उसमें सम्मिलित हुए। सबने आपस में विचार किया कि यदि इन दुष्ट भेड़ियों के जुल्मों से वन को बचाना है तो आपसी छोटे-छोटे झगड़ों को भुलाना ही होगा। सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सब एक होकर अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे।

वन में जब अगला चुनाव आया तो सबने आपसी झगड़े भूलकर वोट डाला। चुनाव परिणाम की घोषणा होते ही जंगल में खुशी व्याप्त हो गई। ईमानदार वीरु भालू सरपंच चुन लिये गये थे। बाकी के चार पंचों के लिए भी लंबू जिराफ, चुटपुट बंदर, मिक्कू गिलहरी और छज्जू हिरण का चयन हुआ था। ये सब अपनी दयालुता और बुद्धिमता के लिए पूरे वन में प्रसिद्ध थे। दुष्ट भेड़िये रातोंरात कहीं भाग गये। कुछ ही दिनों में चंदनवन एक खुशहाल वन के रूप में जाना जाने लगा। सही समयपर लिए गये सही निर्णय ने चंदनवन को बर्बाद होने से बचा लिया। सभी जीव हँसी-खुशी से रहने लगे। 

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