शनिवार, 17 अगस्त 2013

अबकी बजने दे रणभेरी (आल्हा छंद)

शठ, कायर, कुंठित नापाकी, भूल नहीं जाना औकात।
तुझे मसलने को काफी है, हिन्दी वीरों की इक लात॥
विश्वपटल से मिट ही जाती, अबतक तुम दनुजों की जात।
विवश मगर कर देती हमको, राजनीति की बिछी बिसात॥

चार बार आया लड़ने तू, थूक-थूक चाटा हरबार।
इकहत्तर में अंग गँवाया, तो करगिल में मान अपार॥
भूख नाचती घर में फिर भी, जुटा रहा घातक हथियार।
अरे रक्त ही गंदा तेरा, औ' बर्बर, वहशी संस्कार॥

छुरा पीठ में घोंप रहा है, फेंक-फेंक अनगिन छलजाल।
चिनगारी देखी है तूने, देखा नहीं अभीतक ज्वाल॥
अबकी बजने दे रणभेरी, लाएंगे ऐसा भूचाल।
घर में घुस-घुसके मारेंगे, खींच-खींचके तेरी खाल॥