रविवार, 23 जून 2013

घनाक्षरी - हो रहा कुचक्र भारतीयता के नाश हेतु

हो रहा कुचक्र भारतीयता के नाश हेतु, दानवों, विधर्मियों का फैल रहा जाल है।
खंड-खंड हो रही है कामना अखंडता की, टूटने को व्यग्र होती आज डाल-डाल है।
वोटबैंक तुष्ट रहे, लालसा है सेवकों की, दोषियों को छोड़ने का हो रहा कमाल है।
देश के सपूत खा रहे हैं लाठियाँ हजार, गाड़ियों में घूमता विदेश का बिडाल है॥

नारियों के वस्त्र छोटे आधुनिकता दिखाते, कैसी ये विडंबना हुई नये समाज में।
"कूल डूड" कहलाना भाने लगा तरुणों को, अंगरेजी दासता ही दीखती रिवाज में।
कोयलों ने कूकना तो कब का ही छोड़ दिया, अब गाता गदहा है फटी सी आवाज में।
तेजोमहालय का तो नाम भी न लेता कोई, सारे रुचि लेने लगे मुरदों के ताज में॥

नाचते हैं नग्न शत्रु शीश तान ढीठता से, खूब नोंचते हमारी आन, बान, शान को।
संपदा अपार लूट, रौंद पुष्प-डालियों को, छू रहे हैं नित्य दुष्ट पाप के उफान को।
जानते सभी हमारे सैनिकों के हाथ बँधे, लोकतंत्र है सुसुप्त, भूलता विधान को।
त्राहिमाम, त्राहिमाम हंस हैं पुकारते व, हो रहा नसीब राज गिद्ध, चील, श्वान को॥

मौन तो प्रतीक धीरता, विवेक का परंतु, बेबसी का आज वो निशान है बना हुआ।
कायरों की ढाल, कर्महीनता का माल और, निर्बलों के माथ भव्य छत्र सा तना हुआ।
सत्य से विहीन, चाटुकारिता से ओतप्रोत, लिप्त देशद्रोह में व पाप से सना हुआ।
एक अंधकार स्वार्थ, लोभ, मोह, वासना का, क्षुद्रता से युक्त हो जो और भी घना हुआ॥

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह रचना कल सोमवार (24-06-2013) को ब्लॉग प्रसारण के "विशेष रचना कोना" पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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    1. अवश्य प्रिय मित्रवर अरुण शर्मा अनन्त जी। सम्मान हेतु आपका ह्रदय से आभार।

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