बुधवार, 22 मई 2013

दोहे - मैला हुआ क्रिकेट


बिके हुए प्यादे सभी, बिका हुआ रनरेट।
लुप्त हुई है स्वच्छता, मैला हुआ क्रिकेट॥

लगा रहा है बैट तो, सौदे पर ही जोर।
टर्न हो रही गेंद भी, सट्टाघर की ओर॥

मैदानों पर चल रहा, बैट-बॉल का खेल।
परदे पीछे हो रहा, जुआरियों का मेल॥

खिलाड़ियों ने शौक से, बेच दिया है देश।
बाहर बैठे डॉन के, मान रहे निर्देश॥

माटी ने पैदा किया, पाला सालों-साल।
सुरा-सुंदरी के लिए, बिका देश का लाल॥

पकड़े तो कीड़े गये, बिच्छू हैं आजाद।
मारेंगे फिर डंक वो, कुछ अरसे के बाद॥

फैलाती डी-कंपनी, फिक्सिंग का ये जाल।
भारत के दुश्मन सभी, होते मालामाल॥

बीसीसीआई डरी, खड़े कर दिये हाथ।
नेटवर्क इतना बड़ा, कौन फँसाये माथ॥

गई कबड्डी काम से, खो-खो भी गुमनाम।
क्रिकेटिया इस भूत ने, हमको किया गुलाम॥

देशद्रोहियों को नहीं, मिले क्षमा का दान।
बहिष्कार इनका करो, कहता यही विधान॥

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह रचना कल बृहस्पतिवार (23-05-2013) को ब्लॉग प्रसारण के "विशेष रचना कोना" पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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    1. अवश्य, अवश्य प्रिय मित्रवर अरुण शर्मा अनन्त जी। हार्दिक आभार आपका। :)

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  2. दोहों के माध्यम से मैला हुआ क्रिकेट,बहुत ही उत्कृष्ट प्रस्तुति.

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    1. स्नेह हेतु आपका हार्दिक आभार आदरणीय राजेन्द्र सर।

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  3. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena69.blogspot.in/

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    1. आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीय मदन जी।

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    1. स्वागत है आपका आदरणीय नीरज कुमार जी। सराहना के लिए आपका ह्रदय से आभार।

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  5. एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

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    1. आपका हार्दिक आभारी हूँ भाई संजय जी। स्नेह बनाए रखें।

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  6. आजकल चल रही क्रिकेट में अराजकता का सटीक चित्रण. हर क्षेत्र में यही आग लगी हुई है. क्या होगा इस देश का जाने....

    शुभकामनायें

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    1. हार्दिक स्वागत आपका आदरणीया प्रीति जी। प्रोत्साहन हेतु बहुत-बहुत आभार।

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  7. सिंह के मुख पर लिखे गए शब्दों को या तो जरा ऊपर ले जायें अथवा रंग बदल दें, पढ़े नही जा रहे :)

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    1. वहाँ ये मत्तगयन्द सवैया लिखा है आदरणीया........


      वो नर नाहिं रहे डरते डरते सबसे नित आप हि हारे।
      पामर भाँति चले चरता पशु भी अपमान सदा कर डारे।
      मानव जो जिए गौरव से अपनी करनी करते हुए सारे।
      जीवन हैं कहते जिसको बसता हिय में निजमान किनारे॥

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  8. दो लोगों ने ही शानदार पर निशान लगाया था, तीसरा हम भी लगा दिए हैं.
    बहुत खुल के लिखा है.
    ऐसे ही प्रोत्साहित होकर रचें.
    मज़ा आ गया.

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