बुधवार, 8 मई 2013

मुक्तिका - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है


कोई पगड़ी कुचलता तो कोई आँखें दिखाता है।
सहन करने लगे हम तो हमें जग आजमाता है।

सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का,
शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है।

भरा होता तपा लोहा जहाँ के नौजवानों में,
शहर वो ही भला कैसे ठगा सा दीख जाता है।

जरा सी बात क्या कर दी वतन की लाज की खातिर,
जमाना कोसता मुझको, बड़ा जालिम बताता है।

मुझे तो प्यार है मेरे उसी प्राचीन भारत से,
जो वेदों की ऋचाएं पढ़के औरों को पढ़ाता है।

अदा माशूक की थोड़ी नहीं भाती कभी दिल को,
हमेशा लहलहाते खेतों का दर्शन सुहाता है।

बड़ा ही गर्व होता है सदा उस क्षण को "गौरव" जब,
तिरंगे को नमन करने विदेशी सिर झुकाता है।

8 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आपका हार्दिक स्वागत है आदरणीय अरुण साथी जी। बहुत-बहुत आभार।

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  2. बहुत सुन्दर! लाजवाब! ढेरों बधाई!

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका आदरणीय बृजेश जी। आपसे सराहना पाकर मन हर्षित हुआ।

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  3. आपकी यह सुन्दर रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.com) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  4. अच्छी रचना...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं.

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    1. आपका हार्दिक आभारी हूँ भाई संजय जी। स्नेह बनाए रखें।

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