बुधवार, 29 मई 2013

समझदार चप्पू

चप्पू हिरण नंदनवन में अपने परिवार के साथ रहता था। वो एक बहादुर और समझदार छौना (हिरण का बच्चा) था। छुटपन में ही वो बड़ी बुद्धिमानी की बातें करता था। वो पढ़ने में भी बहुत तेज था। हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आता। अपने से बड़ों की इज्जत करता और उनका कहा मानता। सुबह-सुबह उठकर नित्यक्रिया से निवृत होने के बाद नहा-धोकर भगवान का ध्यान करना उसकी दिनचर्या में शामिल था। वो जम के हरी सब्जियाँ खाता और दूध पीता था। इससे उसको खेलने और पढ़ने के लिए भरपूर ताकत मिलती थी।

एक दिन चप्पू के स्कूल में छुट्टी थी। वो घर में बैठा पढ़ाई कर रहा था। उसके पिताजी दफ्तर गये हुए थे और माँ खाना बना रही थी। तभी रसोई गैस खत्म हो गई। चप्पू की माँ ने चप्पू को आवाज दी - "चप्पू, जरा इधर आ बेटा"

चप्पू आया - "क्या बात है माँ"

उसकी माँ बोली - "अरे बेटा देख न, रसोई गैस खत्म हो गई। जा जरा छुनकू चाचा के यहाँ से एक लीटर केरोसिन ले आ। तेरे पापा तो शाम तक आएँगे, तबतक स्टोव से ही काम चलाना पड़ेगा। ये ले पैसे और डिब्बा, जो पैसे बच जाएं, वो तू रख लेना, अच्छा।"  चप्पू के माँ-बाप कभी उससे पैसों का हिसाब-किताब नहीं माँगते थे। उन्हें चप्पू पर पूरा विश्वास था।

"ठीक है माँ" चप्पू पैसे लेकर निकल गया।

छुनकू छुछुंदर की कंट्रोल रेट दुकान पास में ही थी। उसका केरोसिन का कारोबार था। वो एक नंबर का लालची
था। मौका लगते ही किसी को भी ठग लेता। चप्पू उसकी दुकान पर पहुँचा।

"प्रणाम छुनकू चाचा, एक लीटर केरोसिन देना" चप्पू ने कहा।

"हें....हें.....हें....अरे चप्पू बेटा, खुश रहो खुश रहो, कैसे हो। आज बड़े दिन बाद चाचा की याद आई" छुनकू दाँतें निपोरते हुए बोला।

"रसोई गैस खत्म हो गई है चाचा। माँ ने एक लीटर केरोसिन लाने को कहा है। वही लेने आया हूँ" चप्पू ने मुस्कुरा के जवाब दिया।

"हें....हें.....हें....अभी लो बेटा अभी लो" छुनकू ने तेल नापने का बर्तन उठाया।

छुनकू जब तेल नाप रहा था तो चप्पू की नजर नापनेवाले बर्तन के पेंदे पर गई। अरे ये क्या, बर्तन का पेंदा अंदर की ओर काफी ज्यादा धँसा हुआ था। चप्पू समझ गया कि इस लालची छुनकू ने तेल कम नापने के लिए ये शरारत कर रखी है। लेकिन वो चुप रहा और सब देखता रहा। तेल चप्पू के डिब्बे में डालकर छुनकू ने काउंटर पर रखा और बोला - ये लो चप्पू बेटा, एक लीटर केरोसिन। पैंतालीस रुपये हुए लेकिन तुम्हारे लिए सिर्फ तैंतालीस.....हें....हें.....हें...."

चप्पू ने आज सुबह के ही अखबार में केरोसिन का दाम चालीस रुपये होने की खबर पढ़ी थी। वो समझ गया कि अब इस लालची को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसने अनजान होने का नाटक करते हुए कहा - "चाचा आप कितने अच्छे हैं। आपका तेल नापने का बर्तन तो और भी अच्छा है। उसको उल्टा कर के भी उसमें काफी कुछ रखा जा सकता है। आपने उसे इतनी अच्छी तरह से ठोंका है कि बाहर से देखने में कुछ पता नहीं चलता कि वो बर्तन दोनों तरफ से काम में लाया जा सकता है। आप तेल पैंतालीस में बेचते हैं लेकिन मेरे लिए उसमें दो रुपये कम कर देते हैं। उन दो रुपयों से मैं दो टॉफियाँ खरीद सकता हूँ। वाह वाह चाचा। ये बातें मैं सबको बताऊँगा। अपने घर में, स्कूल में सबको। ये लिजिए तैंतालीस रुपये"

सबको बताने की बात सुनकर छुनकू का तो डर के मारे बुरा हाल हो गया। वो बेईमानी तो कर ही रहा था। उसने चप्पू को बच्चा समझ के ठगना चाहा लेकिन यहाँ तो दूसरी बात हो गई। उसे तो काटो तो खून नहीं। वो घबराहट को छिपाते हुए बोला - "अरे बेटा, ये चाचा-भतीजे के बीच की बातें सबको काहे बताओगे। ये तो अपनी आपस की बात है। ये लो अपने तीन रुपये और वापस ले लो। मेरी दुकान यानि तुम्हारी दुकान। अरे थोड़ा सा और केरोसिन भी लेते जाओ। लेकिन किसी से कुछ कहना मत"

चप्पू बोला - "अरे चाचा, आप तो डर गये लगते हैं। आप चोरी थोड़े कर रहे हैं कि आपको पुलिस पकड़ लेगी"

छुनकू ने बात संभालने की कोशिश की - "अरे नहीं-नहीं चप्पू बेटा। वो बात नहीं है। दरअसल ये छूट तो मैं तुम्हें खासतौर से दे रहा हूँ। अब तुम तो मेरे सबसे प्यारे भतीजे हो। तुम्हें नहीं दूँगा तो और किसे दूँगा। जब सबलोग जान जाएंगे तो सब माँगने लगेंगे। सब को देने लगा तो मेरा तो बड़ा नुकसान हो जाएगा न, ....हें....हें.....हें...."

चप्पू तो सब समझ ही रहा था। उसने कहा - "ठीक है चाचा, जैसी आपकी मर्जी। तब तो मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगा, अच्छा अब चलता हूँ"

कह के चप्पू जाने के लिए मुड़ा। छुनकू उसे जाता समझ के खुश हो ही रहा था कि चप्पू फिर पलटा।

छुनकू घबराया - "क्या बात है बेटा, कुछ भूल गये क्या?"

चप्पू बोला - "चाचा, अभी-अभी याद आया। मेरे स्कूल के बगल में भी एक आपकी दुकान के जैसी ही दुकान है। कुछ दिनों पहले वहाँ पुलिस आई थी। पुलिसवाले वहाँ खड़े लोगों को उस दुकान में रखे सामान नापनेवाले बर्तन दिखा-दिखाकर कुछ कह रहे थे। मुझे लगता है कि वो उस दुकान के मालिक की बड़ाई कर रहे थे क्योंकि उसने भी अपने नापनेवाले बर्तनों को आपकी ही तरह दोनों तरफ से काम में लानेवाला बना रखा था। मतलब उसके तले को अंदर की तरफ ठोंका हुआ था। जैसा आपने किया हुआ है। उसके बाद पुलिस उस दुकानदार को जीप में बैठा के कहीं ले गई। मुझे तो लगता है कि वो दुकानदार खूब मजे कर रहा है क्योंकि अभीतक वापस आया नहीं है। यदि पुलिस को आपके बारे में पता चला तो वो आपको भी अपने साथ ले जाएगी और खूब मजे कराएगी। कितना मजा आएगा न? आप मुझे भी अपने साथ बुला लेना। हमदोनों खूब मस्ती करेंगे"

छुनकू को तो पसीना आने लगा - "अरे बेटा लेकिन.........."

चप्पू ने जिद पकड़ ली - "लेकिन-वेकिन कुछ नहीं चाचा। मैं सबको भले न बताऊं, लेकिन पुलिस को बताने में तो कोई हर्ज नहीं? इसमें मुझे कोई दिक्कत भी नहीं होगी। मेरे दोस्त चिंकू खरहे के पापा पुलिस में ही हैं। बस मुझे चिंकू से कहना है। वो अपने पापा से कहेगा और फिर तो मजा ही मजा है, अब मैं चला। आप तैयार रहना....."

पुलिस के नाम से छुनकू की बची-खुची हिम्मत भी जवाब दे गई। उसके मुँह से निकल गया - "अरे बेटा, ऐसे ठोंके हुए बर्तन का उपयोग करना चोरी ही कहलाता है। तय दाम से ज्यादा पर कुछ बेचना भी जुर्म है। उस दुकानदार को पुलिस पकड़ के जेल ले गई है, मजे कराने नहीं। अगर ये सब बातें तुम बाहर किसी को बता दोगे तो सचमुच पुलिस मुझे भी पकड़ लेगी। मैं तो तुम्हारा चाचा हूँ न"

अब चप्पू ने गुस्साते हुए कहा - "अच्छा तो आप मुझे ठग रहे थे"

"माफ कर दो बेटा माफ कर दो, तुम अड़तीस रुपये ही देना" छुनकू गिड़गिड़ाने लगा।

"रिश्वत दे रहे हैं क्या चाचा? अब तो मैं सबको बता के ही रहूँगा" चप्पू मानने के मूड में नहीं था।

"तो तुम ही बोलो बेटा मैं क्या करुँ" छुनकू फिर गिड़गिड़ाया।

"वादा किजिए कि आज से फिर किसी के साथ ऐसा नहीं करेंगे वर्ना मैं चला सबको बताने" चप्पू ने उससे कहा।

"ठीक है बेटा ठीक है। मैं वादा करता हूँ, कान पकड़ता हूँ। अब किसी से बेईमानी नहीं करुँगा" छुनकू अपने कान पकड़े हुए बोला।

"तो ठीक है। यदि आप ऐसा कहते है तो मैं आपको छोड़ देता हूँ। आखिर आप तो मेरे छुनकू चाचा हैं। ये लिजिए अपने चालीस रुपये" कहते हुए चप्पू ने छुनकू को रुपये दिए और केरोसिन लेकर मुस्कुराते हुए घर की ओर चल पड़ा।

बुधवार, 22 मई 2013

दोहे - मैला हुआ क्रिकेट


बिके हुए प्यादे सभी, बिका हुआ रनरेट।
लुप्त हुई है स्वच्छता, मैला हुआ क्रिकेट॥

लगा रहा है बैट तो, सौदे पर ही जोर।
टर्न हो रही गेंद भी, सट्टाघर की ओर॥

मैदानों पर चल रहा, बैट-बॉल का खेल।
परदे पीछे हो रहा, जुआरियों का मेल॥

खिलाड़ियों ने शौक से, बेच दिया है देश।
बाहर बैठे डॉन के, मान रहे निर्देश॥

माटी ने पैदा किया, पाला सालों-साल।
सुरा-सुंदरी के लिए, बिका देश का लाल॥

पकड़े तो कीड़े गये, बिच्छू हैं आजाद।
मारेंगे फिर डंक वो, कुछ अरसे के बाद॥

फैलाती डी-कंपनी, फिक्सिंग का ये जाल।
भारत के दुश्मन सभी, होते मालामाल॥

बीसीसीआई डरी, खड़े कर दिये हाथ।
नेटवर्क इतना बड़ा, कौन फँसाये माथ॥

गई कबड्डी काम से, खो-खो भी गुमनाम।
क्रिकेटिया इस भूत ने, हमको किया गुलाम॥

देशद्रोहियों को नहीं, मिले क्षमा का दान।
बहिष्कार इनका करो, कहता यही विधान॥

बुधवार, 8 मई 2013

मुक्तिका - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है


कोई पगड़ी कुचलता तो कोई आँखें दिखाता है।
सहन करने लगे हम तो हमें जग आजमाता है।

सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का,
शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है।

भरा होता तपा लोहा जहाँ के नौजवानों में,
शहर वो ही भला कैसे ठगा सा दीख जाता है।

जरा सी बात क्या कर दी वतन की लाज की खातिर,
जमाना कोसता मुझको, बड़ा जालिम बताता है।

मुझे तो प्यार है मेरे उसी प्राचीन भारत से,
जो वेदों की ऋचाएं पढ़के औरों को पढ़ाता है।

अदा माशूक की थोड़ी नहीं भाती कभी दिल को,
हमेशा लहलहाते खेतों का दर्शन सुहाता है।

बड़ा ही गर्व होता है सदा उस क्षण को "गौरव" जब,
तिरंगे को नमन करने विदेशी सिर झुकाता है।