बुधवार, 17 अप्रैल 2013

कुछ छप्पय छंद


(१)
आहत खाकर बाण, मृत्यु शय्या पर लेटे,
पूछ रहा है देश, कहाँ हैं मेरे बेटे।
बचा रहे हैं प्राण, कहीं छुप के वारों से,
या वो नीच कपूत, मिल गये गद्दारों से॥
मुझको देते उपहार ये, मेरे निश्छल प्यार का।
क्या बढ़िया कर्ज चुका रहे, माटी के उपकार का॥

(२)
कितने-कितने ख्वाब, अभी से मन में पाले,
रहे गुलाटी मार, सेक्युलर टोपीवाले।
अपने मन से रोज, बदलते परिभाषाएं,
कलतक कहते चोर, आज खुद गले लगाएं॥
लेकिन बेचारे क्या करें, आदत से लाचार हैं।
वो बरसाती मेढक सभी, मतलब के ही यार हैं॥

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया है भाई-
    शुभकामनायें-

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    1. स्वागत है आपका आदरणीय रविकर सर। बहुत-बहुत आभार..........

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  2. आपकी यह रचना दिनांक 21.06.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/
    पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  3. आदरणीय ब्रिजेश जी आपका बहुत बहुत आभार!
    बहुत ही मनोरम है या प्रसारण का प्रसार

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  4. आपकी यह रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.in) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  5. अच्छा लगा कि आप ने छप्पय छंदों में रचना की है...बहुत बहुत बधाई...

    @मानवता अब तार-तार है

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