सोमवार, 15 अप्रैल 2013

छप्पय - धनवालों के होने लगे, नाटक सौ-सौ सेर के


मीठे-मीठे बोल, सभी के मन को भाते,
कड़वी सच्ची बात, लोग सुनकर चिढ़ जाते।

अपनी गलती भूल, सभी पर दोष लगाना,
है दुनिया की रीत, दुष्ट को साधु बताना॥

अब जिसको अपना जानिए, चल देता मुँह फेर के।
धनवालों के होने लगे, नाटक सौ-सौ सेर के॥

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति -
    शुभकामनायें आदरणीय ||

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका आदरणीय रविकर सर........

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  2. उत्तर
    1. स्वागत है आपका आदरणीया मोनिका शर्मा जी। हार्दिक आभार.........

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