रविवार, 21 अप्रैल 2013

ये मेरा खरगोश, बड़ा ही प्यारा-प्यारा (रोला छंद)















ये मेरा खरगोश, बड़ा ही प्यारा-प्यारा,
गुलथुल, गोल-मटोल, सभी को लगता न्यारा।
खेले मेरे साथ, नित्यदिन छुपम-छुपाई,
चोर-सिपाही, दौड़ और पकड़म-पकड़ाई॥

लंबे-लंबे कान, रुई सी कोमल काया,
भोले-भाले नैन, देख के मन हर्षाया।

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

होता उल्टे काम का, गलत सदा परिणाम - दोहे (बाल रचना)















मटकू गदहा आलसी, सोता था दिन-रात
समझाते सब ही उसे, नहीं समझता बात
मिलता कोई काम तो, छुप जाता झट भाग
खाता सबके खेत से, चुरा-चुरा कर साग

बीवी लाती थी कमा, पड़ा उड़ाता मौज
बैठाये रखता सदा, लफंदरों की फौज
इक दिन का किस्सा सुनो, बीवी थी बाजार
मटकू था घर में पड़ा, आदत से लाचार

जुटा रखी थी आज भी, उसने अपनी टीम
खिला रहा था मुफ्त में, दूध-मलाई, क्रीम

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

सुंदरी सवैया - बहादुर मुनिया चुहिया





















मुनिया चुहिया सब से मिल के रहती, करती न कभी मनमानी।
वन के पशु भी खुश थे उससे, कहते - "हम बालक हैं, तुम नानी"।
मुनिया इक रोज उठी सुबहे गुझिया व पनीर पुलाव बनाने।
कुछ दोस्त सियार, कँगारु, गधे जुटते उसके घर दावत खाने॥

चिपु एक बिलाव बड़ा बदमाश, तभी गुजरा मुँह पान चबाते।