सोमवार, 18 मार्च 2013

कुछ कुण्डलियाँ


(१)
बेशर्मों का राज है, तनिक न जिनको लाज।
कर घोटाले शान से, बैठे पकड़े ताज॥
बैठे पकड़े ताज, बनाकर गणित सियासी,
नैतिकता को बेच, लगा तिकड़म पच्चासी।
होगा मगर हिसाब, सभी इनके कर्मों का,
हो जाएगा ध्वस्त, किला इन बेशर्मों का॥

(२)
भारत की हम बेटियाँ, सीमापर तैनात।
निर्भय हो मेरे वतन, खाएंगे रिपु मात॥
खाएंगे रिपु मात, प्राण से भी जाएंगे,
कुटिल इरादों संग, कभी यदि चढ़ आएंगे।
लड़ने की हरएक, कला में हमें महारत,
बाँहों में फौलाद, बसा है दिल में भारत॥

(३)
नाहर के गढ़ में मिला, जो बिल्लों को ताज।
पड़ोसिया ड्रैगन मुआ, सिर चढ़ बैठा आज॥
सिर चढ़ बैठा आज, लाँघ के सीमा सारी,
उगल रहा है रोज, आग के गोले भारी।
अब वो अपनेआप, नहीं भागेगा बाहर,
उसकी खातिर सिर्फ, बुलाना होगा नाहर॥

(४)
पाकिस्तानी दोगले, करें वार पर वार।
रहें बढ़ाते हौसला, भारत के गद्दार॥
भारत के गद्दार, उच्च पदपर बैठे हैं,
उनके चमचे साँप, देशभर में पैठे हैं।
कहाँ हुई अब लुप्त, चेतना हिन्दुस्तानी,
जो चढ़ बैठे आज, हमींपर पाकिस्तानी॥

(५)
सहते जाने की हुई, सारी सीमा पार।
तुमको वतन पुकारता, लड़ो आर या पार॥
लड़ो आर या पार, नहीं अब कोई चारा,
हुआ हँसी का पात्र, जगत में भाईचारा।
चलो उठा लो शस्त्र, रहो मत दुखड़े कहते,
करवाओ अहसास, शत्रु को हम जो सहते॥

(६)
ताली दे सकता नहीं, एक अकेला "हाथ"।
निश्चित होना चाहिए, "दूजे" का भी साथ॥
दूजे का भी साथ, मिले तो वारे-न्यारे,
तीखे-तीखे "तीर", "साइकिल" को जो मारे।
लाये "ममता" साथ, रहे घर में खुशहाली,
बचे सुरक्षित "राज", बजाए जम के ताली॥

(७)
माफी होती "खून" को, "बटमारी" को जेल।
दिखा रहा कानून भी, नौटंकी का खेल॥
नौटंकी का खेल, मीडिया भी करवाता,
ले जनता का नाम, झूठ के बाण चलाता।
बहुत हुआ आघात, सहा भारत ने काफी,
कर डालो संहार, नहीं दो इनको माफी॥

(८)
छापा जो कानून में, आज गये खुद भूल।
धौंस दिखाना हो गया, राजनीति का मूल॥
राजनीति का मूल, मात्र अब सत्ता पाना,
जोड़-तोड़ कर खूब, विरोधी को धमकाना।
ताकतवर का नाम, नहीं जिस-जिसने जापा,
इतना ले वो जान, पड़ेगा निश्चित छापा॥

(९)
घिसे दाँत के बाघ हों, बूढ़े-बूढ़े शेर।
तो गीदड़ काहे नहीं, करता फिरे अँधेर॥
करता फिरे अँधेर, लोमड़ी का घरवाला,
छापें सब अखबार, झूठ भर मिर्च-मसाला।
नित लड़ बैठें जीव, बीच में वन रोज पिसे,
देख-देख खरगोश, क्रोध में निज दाँत घिसे॥

(१०)
छोटी सी तो बात है, अगर हुआ अपराध।
चलो चलें हित लें जरा, अपने-अपने साध॥
अपने-अपने साध, स्वार्थ लें थोड़े-थोड़े,
खेलें ऐसे दाँव, लाभ के दौड़ें घोड़े।
उधर न फेंकें जाल, जिधर है मकरी मोटी,
दिखलाने को काम, फाँस लें मछली छोटी॥

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सार्थक कुंडलियाँ,सदर आभार.

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    1. हार्दिक आभारी हूँ आदरणीय राजेन्द्र जी..........

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  2. बढ़िया कुण्डलियाँ....
    सार्थक भाव..

    अनु

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