सोमवार, 25 मार्च 2013

दो घनाक्षरी छंद


(१)

नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो,
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।

धरती भी कहती है, गगन भी कहता है,
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने।

भलमानसत को वो, कमजोरी बूझते है,
चलो आज सारा नशा, उनका उतारने।

मनुजों के वेश में वो, दनुजों के वंशज हैं,
दौड़ पड़ो पापियों के, वंश को संहारने॥

(२)

वीरों को ही पूजते हैं, देश-दुनिया में सभी,
बालकों, युवाओं यह, सीख लो अतीत से।

रिपुओं के जड़मूल, का सफाया कर डालो,
दिल से निभाओ प्रीत, हरदम मीत से।

जीवन में क्षण ऐसे, मिलते हैं कभी-कभी,
जान पड़ती है प्यारी, हार जब जीत से।

पढ़ना सिखाना शुरु, नौनिहालों को करो तो,
शुरुआत होए सदा, किसी देशगीत से॥

4 टिप्‍पणियां:




  1. नव संवत् का रवि नवल, दे स्नेहिल संस्पर्श !
    पल प्रतिपल हो हर्षमय, पथ पथ पर उत्कर्ष !!



    प्रिय बंधुवर कुमार गौरव अजीतेंदु जी
    राष्ट्रभक्ति-भाव से ओत-प्रोत दोनों घनाक्षरी छंद अच्छे और प्रेरक हैं । आपको हृदय से बधाई !
    आपके ब्लॉग पर पहली बार पहुंचा हूं ,
    आपकी बहुत सारी रचनाएं पढ़ी , अच्छा लिखते हैं आप !
    ...बहुत प्रसन्नता हो रही है ।
    आपकी लेखनी से सदैव श्रेष्ठ सृजन होता रहे , यही कामना है...

    आपको सपरिवार नव संवत्सर की बहुत बहुत बधाई !
    हार्दिक शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं...

    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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    1. आपका हार्दिक स्वागत है आदरणीय राजेंद्र सर। प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार....आपको भी सपरिवार नव संवत्सर की हार्दिक बधाई.......

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  2. # Hot Models को आप जैसे श्रेष्ठ सरस्वती-उपासक द्वारा अपने ब्लॉग में स्थान देना बहुत अजीब लग रहा है ...


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    1. आदरणीय राजेंद्र सर, इस गैजेट के साथ कई बार कुछ उपयोगी लिंक्स जैसे "एड अ न्यू गैजेट, शॉप औनलाइन" इत्यादि मिलते रहते थे इसलिए इसे जोड़ा था। वैसे आपके कहे का सम्मान करते हुए इसे तत्काल हटा दिया है।

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