सोमवार, 18 मार्च 2013

कुण्डलिया - हरे उदासी चेतना


(1)
हरे उदासी चेतना, कर दे कुंठित सोच।
फल सारे विश्वास के, खा जाए यह नोंच॥
खा जाए यह नोंच, देह की उर्जा सारी,
मनुज छोड़ दे कर्म, लगे मन बोझिल भारी।
मौसम सुखमय छीन, बिठा ऋतुओं पर पहरे,
सूख रहे सब घाव, करे यह ताजे व हरे॥

(2)
भूले जीने की कला, बने वस्तु बेकार।
बदनसीब है वो जिसे, करे उदासी प्यार॥
करे उदासी प्यार, रहे नित बाहें डाले,
चुभने लगे बसंत, दिखें दिन काले-काले।
भाये नहीं शबाब, न ही सावन के झूले,
दुनिया की क्या बात, मनस वो खुद को भूले॥

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति है आदरणीय |
    शुभकामनायें स्वीकारें ||

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना के लिए आपका आभारी हूँ आदरणीय रविकर सर.....

      हटाएं
  2. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति,आभार.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपका बहुत-बहुत आभार आदरणीय राजेन्द्र जी.....

      हटाएं