सोमवार, 25 मार्च 2013

दो घनाक्षरी छंद


(१)

नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो,
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।

धरती भी कहती है, गगन भी कहता है,
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने।

भलमानसत को वो, कमजोरी बूझते है,
चलो आज सारा नशा, उनका उतारने।

मनुजों के वेश में वो, दनुजों के वंशज हैं,
दौड़ पड़ो पापियों के, वंश को संहारने॥

(२)

वीरों को ही पूजते हैं, देश-दुनिया में सभी,
बालकों, युवाओं यह, सीख लो अतीत से।

रिपुओं के जड़मूल, का सफाया कर डालो,
दिल से निभाओ प्रीत, हरदम मीत से।

जीवन में क्षण ऐसे, मिलते हैं कभी-कभी,
जान पड़ती है प्यारी, हार जब जीत से।

पढ़ना सिखाना शुरु, नौनिहालों को करो तो,
शुरुआत होए सदा, किसी देशगीत से॥

शनिवार, 23 मार्च 2013

आज के रिश्ते - लघुकथा


इंजिनियर रामबाबू अपनी बेटी दिव्या को एयरपोर्ट छोड़कर अभी-अभी घर लौटे थे। दिव्या ने IIM से एमबीए किया था। एक प्रतिष्ठित कंपनी में बतौर मैनेजर लाखों कमा रही थी। रामबाबू को अपनी बेटी पर खासा गर्व था। नातेदारों से लेकर जान-पहचानवाले सभी लोगों से बात-बातपर वो दिव्या का ही जिक्र छेड़ते थे। अन्य के मुकाबले आर्थिक स्थिति काफी अच्छी होने के कारण रिश्तेदारी में भी उनकी विशेष इज्जत थी। आज छुट्टी थी और कोई खास काम भी नहीं था सो रामबाबू आराम से पलंगपर पसर गये। लेटे-लेटे ही उन्होंने अपनी पत्नी शर्मिला से चाय बनाने को कहा और फिर टीवी चालू कर समाचार देखने लगे।

समाचार देखते-देखते अचानक ही उन्हें अपनी बहन सरिता के बेटे राजीव का ध्यान आया जिसने प्रशासनिक सेवा की प्रारंभिक और मुख्य, दोनों ही परीक्षाएँ पास कर लीं थी और साक्षात्कार भी दे चुका था। अंतिम परिणाम आज-कल में ही आनेवाला था। रामबाबू ने झट से टीवी म्यूट किया और सरिता को फोन लगाया। थोड़ी देर औपचारिक बातें करने के बाद रामबाबू ने सरिता से राजीव के रिजल्ट के बारे में पूछा। सरिता ने थोड़ी निराश आवाज में उत्तर दिया - "नहीं भैया, नहीं हो पाया। राजू (राजीव) की मेहनत में तो कोई कमी नहीं थी। दिन-रात एक कर रखा था उसने। खाने-पीने का भी होश नहीं रहता था। लेकिन दो-तीन नंबरो के अंतर से बात बिगड़ गयी। अभी कल ही तो रिजल्ट आया है। बेचारा बहुत टेंशन में है। मोबाइल बंद कर कमरे में लेटा है। बात कराऊँ क्या?"

"नहीं-नहीं रहने दो। अभी परेशान होगा। मैं बाद में खुद फोन कर के उसे समझा दूँगा। लगा हुआ है तो कहीं न कहीं तो होना ही है। उससे बस इतना कहना कि घबराए नहीं, अच्छा" इसके बाद थोड़ी-बहुत और बातें करने के बाद रामबाबू ने फोन रख दिया। तबतक शर्मिला भी चाय लेकर आ गई। "क्या हुआ? राजीव का तो रिजल्ट आनेवाला था न" उसने आते ही पूछा। "वो नमकीन बिस्किट भी ले आना जो कल लाए थे" रामबाबू ने चाय का कप लेते हुए कहा। फिर बोले - "नहीं हुआ। रिजल्ट कल आया है। सरिता बता रही थी कि सेलेक्ट न हो पाने के कारण थोड़ा परेशान है" फिर धीरे से बुदबुदाए - "हो जाता तो हमारे ही कान काटने लगता" और चाय पीने लगे।

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

घनाक्षरी


भंग में उमंग मिले, नाच हर दिल खिले,
प्यार का प्रतीक पर्व, है होली मनाइये।

पिचकारियों में भरें, रंग देशभक्तिवाले,
रंग एक-दूसरे को, खुद रंग जाइये।

पागल पड़ोसी मिला, लड़ता ही रहता है,
उसको अकलवाली, गुझिया खिलाइये।

फिर भी जो समझे न, होली का तो दिवस है,
गदहे पे बिठा उसे, गाँव में घुमाइये॥

मंगलवार, 19 मार्च 2013

मत्तगयन्द सवैया - कौन यहाँ सबसे बलवाला
















बात चली जब जंगल में - "पशु कौन यहाँ सबसे बलवाला"।
सूँड़ उठा गजराज कहे - "सब मूरख, मैं दम से मतवाला"।
तो वनराज दहाड़ पड़े - "बकवास नहीं, बस मैं रखवाला"।
बंदर पेड़ चढ़ा हँसते - "मुझसे टकरा, कर दूँ मुँह काला"॥

लोमड़, गीदड़ और सियार सभी झपटे - "रुक जा, सुन थोड़ा"।
नाम "गधा" अपना यदि आज तुझे हमने जम के नहिं तोड़ा।
देख हुआ अपमान गधा पिनका, निकला झट से धर कोड़ा।
भाल, जिराफ, कुते उलझे, दुलती जड़ भाग गया हिनु घोड़ा॥

गैंडु प्रसाद चिढ़े, फुँफु साँप बढ़ा डसने विषदंत दिखाते।
मोल, हिपो उछले हिरणों पर, भैंस खड़ी खुर-सींग नचाते।
ऊँट, बिलाव कहाँ चुप थे, टकराकर बाघ गिरे बलखाते।
बैल, कँगारु भिड़े, चुटकी चुहिया बिल में छुप ली घबराते॥

पालक, गाजर ले तब ही छुटकू खरहा घर वापस आया।
पा लड़ते सबको, छुटकू अपने मन में बहुते घबराया।
बात सही बतला सबने उसको अपना सरपंच बनाया।
"एक रहो, इसमें बल है" कह के उसने झगड़ा सुलझाया॥

सोमवार, 18 मार्च 2013

कुछ कुण्डलियाँ


(१)
बेशर्मों का राज है, तनिक न जिनको लाज।
कर घोटाले शान से, बैठे पकड़े ताज॥
बैठे पकड़े ताज, बनाकर गणित सियासी,
नैतिकता को बेच, लगा तिकड़म पच्चासी।
होगा मगर हिसाब, सभी इनके कर्मों का,
हो जाएगा ध्वस्त, किला इन बेशर्मों का॥

(२)
भारत की हम बेटियाँ, सीमापर तैनात।
निर्भय हो मेरे वतन, खाएंगे रिपु मात॥
खाएंगे रिपु मात, प्राण से भी जाएंगे,
कुटिल इरादों संग, कभी यदि चढ़ आएंगे।
लड़ने की हरएक, कला में हमें महारत,
बाँहों में फौलाद, बसा है दिल में भारत॥

(३)
नाहर के गढ़ में मिला, जो बिल्लों को ताज।
पड़ोसिया ड्रैगन मुआ, सिर चढ़ बैठा आज॥
सिर चढ़ बैठा आज, लाँघ के सीमा सारी,
उगल रहा है रोज, आग के गोले भारी।
अब वो अपनेआप, नहीं भागेगा बाहर,
उसकी खातिर सिर्फ, बुलाना होगा नाहर॥

(४)
पाकिस्तानी दोगले, करें वार पर वार।
रहें बढ़ाते हौसला, भारत के गद्दार॥
भारत के गद्दार, उच्च पदपर बैठे हैं,
उनके चमचे साँप, देशभर में पैठे हैं।
कहाँ हुई अब लुप्त, चेतना हिन्दुस्तानी,
जो चढ़ बैठे आज, हमींपर पाकिस्तानी॥

(५)
सहते जाने की हुई, सारी सीमा पार।
तुमको वतन पुकारता, लड़ो आर या पार॥
लड़ो आर या पार, नहीं अब कोई चारा,
हुआ हँसी का पात्र, जगत में भाईचारा।
चलो उठा लो शस्त्र, रहो मत दुखड़े कहते,
करवाओ अहसास, शत्रु को हम जो सहते॥

(६)
ताली दे सकता नहीं, एक अकेला "हाथ"।
निश्चित होना चाहिए, "दूजे" का भी साथ॥
दूजे का भी साथ, मिले तो वारे-न्यारे,
तीखे-तीखे "तीर", "साइकिल" को जो मारे।
लाये "ममता" साथ, रहे घर में खुशहाली,
बचे सुरक्षित "राज", बजाए जम के ताली॥

(७)
माफी होती "खून" को, "बटमारी" को जेल।
दिखा रहा कानून भी, नौटंकी का खेल॥
नौटंकी का खेल, मीडिया भी करवाता,
ले जनता का नाम, झूठ के बाण चलाता।
बहुत हुआ आघात, सहा भारत ने काफी,
कर डालो संहार, नहीं दो इनको माफी॥

(८)
छापा जो कानून में, आज गये खुद भूल।
धौंस दिखाना हो गया, राजनीति का मूल॥
राजनीति का मूल, मात्र अब सत्ता पाना,
जोड़-तोड़ कर खूब, विरोधी को धमकाना।
ताकतवर का नाम, नहीं जिस-जिसने जापा,
इतना ले वो जान, पड़ेगा निश्चित छापा॥

(९)
घिसे दाँत के बाघ हों, बूढ़े-बूढ़े शेर।
तो गीदड़ काहे नहीं, करता फिरे अँधेर॥
करता फिरे अँधेर, लोमड़ी का घरवाला,
छापें सब अखबार, झूठ भर मिर्च-मसाला।
नित लड़ बैठें जीव, बीच में वन रोज पिसे,
देख-देख खरगोश, क्रोध में निज दाँत घिसे॥

(१०)
छोटी सी तो बात है, अगर हुआ अपराध।
चलो चलें हित लें जरा, अपने-अपने साध॥
अपने-अपने साध, स्वार्थ लें थोड़े-थोड़े,
खेलें ऐसे दाँव, लाभ के दौड़ें घोड़े।
उधर न फेंकें जाल, जिधर है मकरी मोटी,
दिखलाने को काम, फाँस लें मछली छोटी॥

कुण्डलिया - हरे उदासी चेतना


(1)
हरे उदासी चेतना, कर दे कुंठित सोच।
फल सारे विश्वास के, खा जाए यह नोंच॥
खा जाए यह नोंच, देह की उर्जा सारी,
मनुज छोड़ दे कर्म, लगे मन बोझिल भारी।
मौसम सुखमय छीन, बिठा ऋतुओं पर पहरे,
सूख रहे सब घाव, करे यह ताजे व हरे॥

(2)
भूले जीने की कला, बने वस्तु बेकार।
बदनसीब है वो जिसे, करे उदासी प्यार॥
करे उदासी प्यार, रहे नित बाहें डाले,
चुभने लगे बसंत, दिखें दिन काले-काले।
भाये नहीं शबाब, न ही सावन के झूले,
दुनिया की क्या बात, मनस वो खुद को भूले॥

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

कुण्डलियाँ


(१)
सुनके-गुनके हाल सब, हमको आया ज्ञान।
ट्रक उँगली से खींचना, होता है आसान॥
होता है आसान, चाँद पर महल बनाना,
सबसे मुश्किल काम, गधों को है समझाना।
नहीं घुसेगी बात, कभी भेजे में उनके,
झगड़ेंगे वो मूर्ख, अक्ल की बातें सुनके॥

(२)
कीमत है इस बात की, सुन लो देकर कान।
घोंचू, उल्लू, भैंस को, मत दो मति का दान॥
मत दो मति का दान, भेड़ के घर में जा के,
देंगे झाड़ू मार, भगाकर बाहर ला के।
इनको करो प्रणाम, इसी में भई गनीमत,
वर्ना जानो आप, चुकानी होगी कीमत॥

दो कुण्डलियाँ बच्चों के लिये



बोला भालू शेर से - "शेरू मेरे यार"।
काफी दिन हैं हो गये, चलो आज बाजार॥
चलो आज बाजार, घूम-फिर कर घर आयें,
पिक्चर-विक्चर देख, समोसे-लड्डू खायें।
सुना बिका कल खूब, बर्फ का मीठा गोला,
हम भी तो लें स्वाद, ठुमकता भालू बोला॥

सुनकर शेरू क्रोध में झपटा - "सुन रे ढीट"।
भालू के बच्चे तुझे, अब मैं दूँगा पीट॥
अब मैं दूँगा पीट, मुझे तू मूर्ख बनाता,
जब जाता बाजार, जेब मेरी कटवाता।
खाता तू तरमाल, चुकाता मैं चुन-चुनकर,
भागा सिर पर पैर रखे भालू यह सुनकर॥

सोमवार, 11 मार्च 2013

पाँच क्षणिकाएँ


(१) ज्वलंत प्रश्न

जब फलदार वृक्ष ही
बन जाएं नरभक्षी,
चूसने लगें रक्त,
तब क्या करे पथिक,
किधर ढूँढे छाँव, शीतलता,
कहाँ करे विश्राम,
कैसे जुटाये भोजन
जेठ की तपती राहों में।

(२) एक घटना

सुबह कुछ फूल देखे थे,
आकार में बड़े-बड़े,
चटख रंगोंवाले, भड़कदार,
मन किया कि घर ले आऊँ,
जाँच की तो पाया
सारे के सारे जहरीले थे।

(३) कैसी बारिश

सुना है कल बारिश हुई थी,
खूब गरज-गरजकर,
लेकिन
चौराहे पर का ठूँठ तो
वैसे का वैसा ही
सूखा, उदास खड़ा है।

(४) खूबसूरत

धुँधलके में बड़ा
खूबसूरत दिखता था वो,
लेकिन
उजाले में देखा तो जाना,
उसका चेहरा भी
दागदार था।

(५) शांति

शांति मेरे पास थी,
थोड़ी सी ही सही
मगर थी,
लेकिन मैं लालची
जरा सी और ढूँढने लगा,
इसी चक्कर में
वो भी कहीं गिर गयी।

बुधवार, 6 मार्च 2013

गुलगुल खरगोश और नशे के सौदागर


गुलगुल खरगोश, चुटपुटवन का जाना-माना व्यापारी था। वन की रौनक फुटफुटबाजार में उसकी मेवों की बड़ी सी दुकान थी। उसकी दुकान के मेवे अपनी गुणवत्ता और ताजगी के लिए पूरे चुटपुटवन में मशहूर थे। उसकी दुकान से काजू, किशमिश, अखरोट आदि जो एकबार खरीदकर खा लेता समझो वो बस उसी का होकर रह जाता। गुलगुल बेहद नेकदिल भी था। वो कभी किसी से झगड़ा नहीं करता। मेवे उचित दाम पर बेचता और कभी-कभी छोटे बच्चों को तो मुफ्त में भी दे दिया करता। उसके इन्हीं गुणों के कारण चुटपुटवन के सभी जानवर उसकी बहुत इज्जत करते थे। आसपास के वनों में भी फुटफुटबाजार कहो तो गुलगुल के कारण ही जाना जाता था। जानवर दूर-दूर से मेवे खरीदने गुलगुल के यहाँ आते थे।

एक दिन की बात है कि गुलगुल हमेशा की तरह अपनी दुकान में बैठा कामकाज देख रहा था। उस दिन बाजार में कुछ ज्यादा ही चहलपहल थी। होती भी क्यों न, कुछ ही दिनों के बाद चुटपुटवन के राजा शेर मक्खनसिंह के बेटे की शादी जो होनेवाली थी। सभी जानवर शादी में भेंट करने के लिए अपने-अपने हिसाब से उपहार खरीद रहे थे। कोई सजावट की चीजें खरीद रहा था तो कोई कपड़े। कोई फूलों के गुलदस्ते ले रहा था तो कोई खानेपीने की चीजें। गुलगुल की दुकान पर भी बड़ी भीड़ थी। वो जल्दी-जल्दी सभी ग्राहकों को निपटा रहा था। तभी दो लोमड़ वहाँ आये। उन्होंने पहले तो भीड़ छँटने का थोड़ा इंतजार किया फिर भीड़ न छँटती देख गुलगुल से बोले - "अरे सेठजी, जरा इधर सुनिये....."। गुलगुल बोला - " अरे भैया, देखते नहीं, कितनी भीड़ है। बोलो क्या चाहिए?" लेकिन लोमड़ न माने। उन्होंने फिर कहा - "ही.....ही......ही.....सेठजी, काम तो आप ही के मतलब का है। हम सिर्फ पाँच मिनट का समय लेंगे"। गुलगुल बाहर आया - "बोलो, क्या काम है?" लोमड़ बोले - "सेठजी, हमलोग अरब से खास मुनक्के और खजूर लाए हैं। बिल्कुल ताजा और बढ़िया माल है। वैसे तो पूरे माल की कीमत लाखों में है पर आपको सिर्फ पचास हजार में दे देंगे"। गुलगुल को बड़ी हैरानी हुई। उसने पूछा कि क्यों भई, मेरे लिए ऐसी मेहरबानी क्यों? मैं तो तुमलोगों को जानता भी नहीं"। लोमड़ों ने पहले तो कुटिलता से एक-दूसरे की ओर देखा और फिर बोले - "ही.....ही.....ही....अरे सेठ जी , आप तो इस वन के सबसे बड़े व्यापारी है। आपके साथ बिजनेस करना हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात होगी। इसमें आपका और हमारा दोनों का फायदा है। आप हमें एक मौका तो दिजिए, आप रातोंरात अरबपति बन जाएंगे"।

गुलगुल लालची जरा भी नहीं था। उसका माथा ठनका। उसने ताड़ लिया कि जो भी हो ये लोमड़ ईमानदार तो नहीं हो सकते। पहले तो उसके मन में आया कि डाँटकर इन लोमड़ों को अपनी दुकान से भगा दे लेकिन फिर उसने सोचा कि ऐसा करने से इनके इरादों का पता नही चल पाएगा और ये कहीं और जाकर अपना खेल शुरु कर देंगे। यही सोचकर वो चुप रहा। उसने लोमड़ों से कहा - "अरे भाई, जब ऐसा है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। परंतु तुमलोग पहले अपना माल तो दिखाओ। बिना देखे-परखे मैं कुछ नहीं खरीदता"। लोमड़ झट से राजी हो गये। वो गुलगुल को अपने साथ बाजार के कोने में ले गये जहाँ उनकी जीप खड़ी थी। जीप के पिछले हिस्से में कई बोरियाँ पड़ी थीं। लोमड़ों ने उनमें से एक बोरी को बाहर निकाला और उसे खोलते हुए बोले - ये लिजिये सेठजी, आप खुद ही देखकर तसल्ली कर लिजिये"। गुलगुल ने देखा की बोरी में खजूर भरा था। उसने कुछ खजूरों को उठाया और देखा। खजूर बिल्कुल ही साधारण थे। उनमें खासियतवाली कोई बात न थी। गुलगुल ने गुस्से से लोमड़ों की ओर देखा और कहा - "तुमलोगों ने मुझे बेवकूफ समझ रखा है? मैं नहीं खरीदता ऐसा माल। तुमने तो कहा था कि ये अरब के खास खजूर है। क्या खासियत है इनमें?" लोमड़ों ने आसपास देखा और फिर धीरे से बोले - "सेठजी, खासियत इन खजूर-मुनक्कों में नहीं बल्कि इस पाउडर में है"। कहते हुए उन्होंने बोरी के अंदर छुपा एक सफेद पाउडर का पैकेट निकाला। फिर बोले - "वो अरबवाली बात तो हमने इसलिए कही थी क्योंकि उस समय आसपास बहुत से जानवर थे"। गुलगुल ने पाउडर का पैकेट अपने हाथों में लिया और उलट-पुलट कर देखा। उसे कुछ समझ नहीं आया। उसने पूछा - "क्या है ये?"

लोमड़ों ने फिर आसपास देखा और बोले - "सेठजी, ये बड़ा खास पाउडर है। शहरों में मनुष्य इसका उपयोग नशे के लिए करते हैं। इस पाउडर का गुण ये है कि इसमें तेज नशा होता है और महल-परियाँ-बगीचे न जाने क्या-क्या दिखने लगता है। लेकिन जो भी इसका सेवन करता है वो इसका आदि हो जाता है। फिर उसे इसके बिना बहुत सारी परेशानियाँ शुरु हो जाती हैं। और तब वो इसे लेनेपर मजबूर हो जाता है। इतना मजबूर कि इसके लिए वो अपना घरबार तक बेच सकता है। इसके सेवन से शरीर अंदर से खोखला होकर कमजोर होने लगता है। यहाँतक कि इसके प्रभाव से मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए इसकी खुलेआम बिक्री पर रोक है। खैर इनसब बातों से हमें क्या लेना। हमारा उद्देश्य तो बस पैसे कमाना होना चाहिए। आपको बस इतना करना है कि यह पाउडर अपनी दुकान में बिकनेवाले मेवों पर छिड़ककर बेच देना है। जब जानवर उन मेवों को खाएंगे तो मेवों के साथ-साथ ये पाउडर भी उनके अंदर चला जाएगा। एकबार खाने के बाद वो खुद ही दुबारा मजबूर होकर वैसे ही मेवे ढूँढेंगे। वो फिर आपकी दुकान पर ही आएंगे, क्योंकि वैसे पाउडरवाले मेवे उन्हें और कहीं नहीं मिलनेवाले। आप फिर वही पाउडरवाले मेवे उन्हें बेचेंगे। आपका बिजनेस दुगना हो जाएगा और किसी को शक भी नहीं होगा। और तो और आप मनमानी कीमत भी ले सकते हैं। नशे में जकड़े जानवर आपको मुँहमाँगी कीमत देंगे। आप अरबों में खेलेगे अरबों में और आपको ये पाउडर बेच-बेचकर हम भी अमीर हो जाएंगे। कहिए, है न दोनो का फायदा"।

ये सब सुनने के बाद गुलगुल खरगोश का मन गुस्से से काँप उठा। उसके मन में आया कि ऐसे पापियों को यहीं मार डाले। लेकिन वो अकेला था और लोमड़ दो। इसके अलावा ऐसा करना कानून को अपने हाथ में लेना होता। और वैसे भी नशे के उन सौदागरों के पूरे गिरोह का पर्दाफाश ज्यादा जरूरी था। यहीसब सोचकर उसने कहा - "अरे मेरे प्यारे लोमड़ भाईयों, सचमुच ये तो हमदोनों के लिए बड़े फायदे का सौदा होगा। मैं तो तैयार हूँ। लेकिन अभी दुकान पर बड़ी भीड़ है। अगर अभी कुछ करुँगा तो किसी को शक हो जाएगा। तुमलोग ऐसा करो आज रात को मेरी दुकान पर आ जाओ। मै ये पाउडर खरीद भी लूँगा और तुमलोगों की सहायता से अपनी दुकान में रखे सारे मेवों पर छिड़क भी दूँगा। इसके बाद कल से तो हमारी चाँदी ही चाँदी है। कहो क्या ख्याल है?"
लोमड़ झट से तैयार हो गये और रात नौ बजे आने की बात कहकर चले गये। उनके जाते ही गुलगुल खरगोश सीधा राजमहल गया और महाराज मक्खनसिंह को सारी बात बताई। महाराज ने कोतवाल बग्गा बाघ को सिपाहियों को साथ लेकर गुलगुल खरगोश के साथ जाने और उन नशे के सौदागरों को गिरफ्तार कर घसीटते हुए दरबार में पेश करने की आज्ञा दी। बग्गा ने महाराज की आज्ञानुसार गुलगुल की दुकान को अपने सिपाहियों के साथ घेर लिया और छुपकर बैठ गया। तय समय पर दोनों लोमड़ एक बैग में नशीले पाउडर के ढेर सारे पैकेट लिए गुलगुल की दुकान पर पहुँचे। गुलगुल ने दोनों को अंदर बुलाया और माल निकालने के लिए कहा। लोमड़ों ने जैसे ही बैग से पैकेट निकाले गुलगुल ने ताली बजा दी। ताली बजते ही कोतवाल बग्गा अपने सिपाहियों के साथ दुकान के अंदर चला आया और दोनों लोमड़ों को नशीले पाउडर के पैकेटस के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। दोनो को महाराज के सामने पेश किया गया। महाराज के द्वारा सख्ती से पूछताछ करनेपर दोनों ने अपने बाकी साथियों का भी पता बता दिया। कोतवाल बग्गा ने रातोंरात छापा मारकर उनसब को भी गिरफ्तार कर लिया। नशे के सौदागरों का पूरा गिरोह अब सलाखों के पीछे था। सुबह होते-होते गुलगुल खरगोश की बुद्धिमानी और देशभक्ति की खबर पूरे चुटपुटवन में फैल गयी। सभी गुलगुल की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। महाराज मक्खनसिंह ने गुलगुल को भरे दरबार में खूब सारे हीरे-जवाहरात देकर सम्मानित किया और चुटपुटवन का नया वाणिज्यमंत्री बना दिया। सभी ने खूब तालियाँ बजाकर फैसले का स्वागत किया।