शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

रविवार, 21 अप्रैल 2013

ये मेरा खरगोश, बड़ा ही प्यारा-प्यारा (रोला छंद)















ये मेरा खरगोश, बड़ा ही प्यारा-प्यारा
गुलथुल, गोल-मटोल, सभी को लगता न्यारा
खेले मेरे साथ, नित्यदिन छुपम-छुपाई
चोर-सिपाही, दौड़ और पकड़म-पकड़ाई

लंबे-लंबे कान, रुई सी कोमल काया
भोले-भाले नैन, देख के मन हर्षाया

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

होता उल्टे काम का, गलत सदा परिणाम - दोहे (बाल रचना)















मटकू गदहा आलसी, सोता था दिन-रात
समझाते सब ही उसे, नहीं समझता बात
मिलता कोई काम तो, छुप जाता झट भाग
खाता सबके खेत से, चुरा-चुरा कर साग

बीवी लाती थी कमा, पड़ा उड़ाता मौज
बैठाये रखता सदा, लफंदरों की फौज
इक दिन का किस्सा सुनो, बीवी थी बाजार
मटकू था घर में पड़ा, आदत से लाचार

जुटा रखी थी आज भी, उसने अपनी टीम
खिला रहा था मुफ्त में, दूध-मलाई, क्रीम

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

सुंदरी सवैया - बहादुर मुनिया चुहिया





















मुनिया चुहिया सब से मिल के रहती, करती न कभी मनमानी
वन के पशु भी खुश थे उससे, कहते - "हम बालक हैं, तुम नानी"
मुनिया इक रोज उठी सुबहे गुझिया व पनीर पुलाव बनाने
कुछ दोस्त सियार, कँगारु, गधे जुटते उसके घर दावत खाने

चिपु एक बिलाव बड़ा बदमाश, तभी गुजरा मुँह पान चबाते

बुधवार, 6 मार्च 2013

गुलगुल खरगोश और नशे के सौदागर


गुलगुल खरगोश, चुटपुटवन का जाना-माना व्यापारी था। वन की रौनक फुटफुटबाजार में उसकी मेवों की बड़ी सी दुकान थी। उसकी दुकान के मेवे अपनी गुणवत्ता और ताजगी के लिए पूरे चुटपुटवन में मशहूर थे। उसकी दुकान से काजू, किशमिश, अखरोट आदि जो एकबार खरीदकर खा लेता समझो वो बस उसी का होकर रह जाता। गुलगुल बेहद नेकदिल भी था। वो कभी किसी से झगड़ा नहीं करता। मेवे उचित दाम पर बेचता और कभी-कभी छोटे बच्चों को तो मुफ्त में भी दे दिया करता। उसके इन्हीं गुणों के कारण चुटपुटवन के सभी जानवर उसकी बहुत इज्जत करते थे। आसपास के वनों में भी फुटफुटबाजार कहो तो गुलगुल के कारण ही जाना जाता था। जानवर दूर-दूर से मेवे खरीदने गुलगुल के यहाँ आते थे।


गुरुवार, 17 जनवरी 2013

सेनापति वीरु हाथी और डाकू नाटा गीदड़ (बाल कहानी)


मीठे पानी के विशालकाय झरने के किनारे बसा तथा बड़े-बड़े फलदार वृक्षों और अत्यंत सुंदर, रंग-बिरंगे, सुगंधित फूलों के प्यारे-प्यारे पौधों से भरपूर एक हरा-भरा वन था "विराटवन"। उस वन में कई प्रकार के पशु-पक्षी जैसे - बाघ, चीता, भालू, बंदर, हिरण, तोता, गौरैया, कबूतर इत्यादि बड़े प्रेम से मिलजुल कर रहते थे। वहाँ का राजा दहाड़सिंह एक बब्बर शेर था जो कि बहुत ही योग्य शासक था और प्रजा को अपनी संतान समझता था। उसका सेनापति वीरु नामक युवा हाथी था जो अपनी वीरता और रणकौशल के लिए आसपास के वनों में विख्यात था। वीरु मानो राजा दहाड़सिंह का दायाँ हाथ था। विराटवन पर जब भी कोई खतरा आता, वीरु अपनी बहादुरी से उस खतरे को जड़ से खत्म कर देता। धीरे-धीरे विराटवन अजेय हो गया। कोई भी शत्रु उस पर आक्रमण करने से डरने लगा। वन के सभी वासी निडर होकर अपने-अपने घरों में रहते थे।