सोमवार, 16 दिसंबर 2013

गीत - जी रही हैं दूरियाँ

भींगते तकियों से आँसू पी रही हैं दूरियाँ
मस्त हो नजदीकियों में जी रही हैं दूरियाँ

अनदिखी कितनी लकीरें खींच आँगन में खड़ीं
अनसुनेपन को बना बिस्तर दलानों में पड़ीं
बैठ फटती तल्खियों को सी रही हैं दूरियाँ

तोड़ देतीं फूल गर खिलता कभी एहसास का
कर रहीं रिश्तों के घर को महल जैसे ताश का
इन गुनाहों की सदा दोषी रही हैं दूरियाँ

प्यार में जब घुन लगा तो खोखलापन आ गया
भूतबँगले सा वहाँ भी खालीपन ही छा गया
ऐसे ही माहौल में जनती रही हैं दूरियाँ

बोझ कर संबंध को गर्माहटें भी हट गईं
जोड़नेवाली जमीनें खाइयों से पट गईं
देख हँस-हँस के मजा लेती रही हैं दूरियाँ

पार कर जाए कोई तन्हा मुसाफिर यत्न कर
ना लगे रस्ते में भी वीरानियों का कोई डर
इन लिहाजों से बड़ी टेढ़ी रही हैं दूरियाँ

सोमवार, 25 नवंबर 2013

फूल (बाल कविता)















फूल खड़े रहते मुस्काते
दे रस मीठा मधु बनवाते
फ्रेंड इन्हीं की तितलीरानी
रोज सुनाती नयी कहानी
खुशबू-खुशबू हरदिन खेलें
इक-दूजे को पकड़ें-ठेलें
आँधी आती तो डर जाते
पत्तों में जाकर छिप जाते

गीत - अकुलाहट की फांस चुभी है

अकुलाहट की फांस चुभी है
मन में टीस उठाती है

ऊँचाई को तरस रहा दिल
पंछी रोज बुलाते हैं
पंखहीनता के पिंजरे में
अरमां गुम हो जाते हैं
लाचारी डायन सी बैठी
मंद-मंद मुस्काती है

घायल भावों की गठरी का
बोझ बढ़ा ही जाता है
उठा-उठा के शब्द थके हैं
छलक पसीना आता है
लंबा रस्ता अजगर दिखता
मंजिल लगे चिढ़ाती है

पास लगा है जीवन-मेला
इच्छाएं बलखाती हैं
सवारियाँ जातीं जो उसतक
भरी-भरी सब आतीं हैं
पीड़ा कुछ दिल में रह जाती
कुछ आँखों तक आती है

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

हाइकु मुक्तक

रात है बाकी / अभी जागो सनम / जरा प्यार दो।
ख्वाब में देखा / हकीकत में वही / उपहार दो।
बातें हैं काफी / बहुत जो बाँटना / तुमसे यहाँ,
आज है मौका / हया को भूलकर / दिल वार दो॥

सोमवार, 18 नवंबर 2013

सौ हाइकु

(१)
दुर्गम पथ
अनजान पथिक
मन शंकित

(२)
प्रकृति माता
स्नेहमयी आँचल
करे पालन

(३)
साँस व्यथित
धड़कनें क्रंदित
हताश मन

(४)
पंख हैं छोटे
विराट आसमान
पंछी बेबस

(५)
मुक्त उड़ान
बादलों का नगर
दिल का ख्वाब

(६)
स्वतंत्र छाया
शक्तिशाली मुखौटा
गंदा मजाक

(७)
भागमभाग
अंधी प्रतिस्पर्धाएँ
टूटते ख्वाब

(८)
विषैली हवा
मोबाइल टावर
गौरैया लुप्त

(९)
अंधा सम्राट
लिप्सा, महत्वाकांक्षा
महाभारत

(१०)
जीवन वृक्ष
आजादी जड़, तना
चेतना पत्ते

(११)
जा रही ठंढ
नाचता पतझड़
आता बसंत

(१२)
आपसी प्यार
समर्पण, विश्वास
घर की नींव

(१३)
तृप्त हृदय
खिलखिलाती साँसें
जीवन सुख

(१४)
हृदय विश्व
मन अपना देश
चुनना तुम्हें

(१५)
रात झरोखा
चंद्र खड़ा निहारे
तारों के दीप

(१६)
मैना के किस्से
डाल-डाल की बातें
तोते से पूछो

(१७)
काँटों का शह्र
गुलाबों के महल
कैसा रहस्य

(१८)
तुष्टिकरण
छद्मनिरपेक्षता
सर्वनाशक

(१९)
घाती घर में
बेटों रहो सतर्क
राष्ट्र का प्रश्न

(२०)
फैली दिव्यता
हटे तम के तंबू
हुआ सवेरा

(२१)
जिम्मेदारियाँ
अपनी आकांक्षाएँ
कशमकश

(२२)
नहीं अभाव
वितरण का खोट
जन्मा आक्रोश

(२३)
सीधा न सादा
"तेज" हो गया ज्यादा
आम आदमी

(२४)
खोखलापन
भ्रामक आवरण
सर्वसुलभ

(२५)
खुद में खोट
राजनेता को दोष
पुराना ट्रेंड

(२६)
पन्ने पुराने
यादों के खंडहर
पड़े अकेले

(२७)
साँसों की भाषा
धड़कनों की बातें
पिया ही बूझे

(२८)
मन की पीर
उफनते जज्बात
गीत के बोल

(२९)
काँटों से तीक्ष्ण
जलाते पल-पल
अधूरे ख्वाब

(३०)
तन्हाई दर्द
तन्हाई ही ढाढस
तन्हा जिंदगी

(३१)
वक्त मदारी
जीवन बंदरिया
सत्य तो यही

(३२)
पथिक अंधा
अनजान सड़क
बुरा है अंत

(३३)
मन-पखेरू
व्यग्रता बने पंख
उड़ा जा रहा

(३४)
दर्द के तूफाँ
निराशा का भँवर
माँझी कहाँ हो

(३५)
पानी ही पानी
तिनका तक नहीं
डूब जाऊँगा

(३६)
मीत मिलेगा
कब फूल खिलेगा
पूछे पुरवा

(३७)
जीवन-अर्थ
साँस-साँस का प्रश्न
क्या दूँ जवाब

(३८)
हारा हृदय
दिवास्वप्न व्यसन
चुभते पल

(३९)
तम के जाले
अनिश्चिय की धूल
ढँकी चेतना

(४०)
धुंध छँटेगी
मौसम बदलेगा
भरोसा रखो

(४१)
हवा है मीत
नाचता संग-संग
बूढ़ा पीपल

(४२)
निकला चाँद
विरहन देखती
मिला सहारा

(४३)
एक शिखर
दूसरा तलहटी
मिलन कैसा

(४४)
हंसों का जोड़ा
प्रेम का साक्षी चाँद
झील बिछौना

(४५)
हो गयी रात
बल्ब जले तारों के
मस्ती में चाँद

(४६)
खुद को कोसे
निहारे आसमान
ताड़ अकेला

(४७)
नभ दे वर
हरियाली दुलारे
वन्यजीवन

(४८)
आस के मोती
धड़कनों की डोर
जीवनमाला

(४९)
तारों की टोली
चंद्रमा का अँगना
निशा का गाँव

(५०)
चेतना-वृक्ष
भावनाओं की डालें
काव्य ही फल

(५१)
बुलाते कर्म
रोके अकर्मण्यता
मन की स्थिति

(५२)
विषैली गैसें
नाभिकीय कचरे
रोती प्रकृति

(५३)
नभ की पीड़ा
पवन की उदासी
दिल जलाती

(५४)
मेघों को दिया
समंदरों में बाँटा
बचे ही आँसू

(५५)
जीवन युद्ध
जिजीविषा ही शस्त्र
धर्म कवच

(५६)
झुग्गी में कार
याचक बने राजा
आया चुनाव

(५७)
नंगे से नृत्य
सट्टेबाजी, फरेब
कैसा ये खेल

(५८)
दिल ने लिखी
नयनों ने सुनाई
वो पाती तुम्हें

(५९)
मेघा भी रोये
मयूरों ने मनाया
माने न मेघ

(६०)
धरती फटी
बादल रहे रूठे
दुखी किसान

(६१)
भोर रिझाती
शाम दिल चुराती
मेघों के देश

(६२)
तोड़े बंधन
पा लिया आसमान
जन्म सफल

(६३)
त्यागो संशय
छानो गहराईयाँ
मोती मिलेंगे

(६४)
कँटीली झाड़
दकियानूसी रीति
हटाने योग्य

(६५)
सुअवसर
दुष्टों का नाश करो
युद्ध न टालो

(६६)
अति उदार
अप्रत्यक्ष अधर्मी
साक्षी अतीत

(६७)
शाम दीवानी
सजी हैं महफिलें
हम अकेले

(६८)
रात अंधेरी
निशाचरों की बेला
भोर हो जल्दी

(६९)
बिम्ब ही मोती
अलंकार नगीने
हाइकुमाला

(७०)
कोयल मौन
उपवन उदास
कैसा बसंत

(७१)
थोथी अहिंसा
रीढ़हीन सिद्धांत
आत्मघातक

(७२)
आत्महीनता
मजनुइया इश्क
कुंठाजनक

(७३)
स्नेह का लेप
उत्तम उपचार
भरता घाव

(७४)
कच्चे जज्बात
फकत मौजमस्ती
प्यार का नाम

(७५)
वासना जन्मी
प्यार ने कहा विदा
होंगे कुकर्म

(७६)
श्वेत वो मूर्ति
कोयला है पड़ोसी
दाग का डर

(७७)
उठा लो शस्त्र
धर्मयुद्ध प्रारंभ
है निर्णायक

(७८)
कौओं की एका
चींटी की उदारता
सीख मानव

(७९)
एक ही धातु
कोई गढ़े बर्तन
कोई कटार

(८०)
मायावीलोक
आहट से समझो
नैनों को पढ़ो

(८१)
मृत्यु का लोक
जीवन को ढूँढता
तन नादान

(८२)
देखा मंजर
विस्फोट, आग, धुँआ
उबला रक्त

(८३)
चूड़ी-कंगना
बिंदिया, वो सिन्दूर
बने "लो क्लास"

(८४)
उड़े-उड़े से
चेहरा ज्यों छिपाते
वफा के रंग

(८५)
आस न रखो
आरोप न लगाओ
वो आश्रित है

(८६)
दुर्भाग्यशाली
अंग-अंग गुलाम
कठपुतली

(८७)
खिली वादियाँ
महकता चमन
वफा तुम्हारी

(८८)
नभ तो भ्रम
धरती ही प्रणम्य
आश्रयदाता

(८९)
जड़ों से प्यार
नभ करे सलाम
धरतीपुत्र

(९०)
प्रचंड तेज
हम हैं सनातनी
गर्व है हमें

(९१)
बूँदों का चित्र
सूरज भरे रंग
इन्द्रधनुष

(९२)
मेघों का नीर
धरा की अमानत
कहता नभ

(९३)
रंग उड़ातीं
ज्यों पुष्पों को चिढ़ाती
ये तितलियाँ

(९४)
भौंरों से खेला
गाल गोरी के चूमे
पुष्प वो सूखा

(९५)
चुभते ख्वाब
सागर को तरसे
ताल की मीन

(९६)
धुँए से लोग
साथ कष्टदायक
दम घुटता

(९७)
कुत्ते दहाड़े
नाचा खुद मदारी
वक्त का खेल

(९८)
विज्ञानी शत्रु
यांत्रिक शर-शूल
बिंधा ओजोन

(९९)
प्राप्त को खोना
अप्राप्य की लालसा
मानववृत्ति

(१००)
भ्रम के धब्बे
गगन की कालिख
भोर ने धोयी

रविवार, 10 नवंबर 2013

राष्ट्रगौरव


(चित्र गूगल से साभार)

मुक्तिका - चाँदनी छिटकी हुई पर मन मेरा खामोश है

चाँदनी छिटकी हुई पर मन मेरा खामोश है।
बेखबर इस रात में सारा जहाँ मदहोश है।

वक्त आगे भागता, जम से गये मेरे कदम,
हाँ, सहारा दे रहा तन्हाई का आगोश है।

हँस रहा चेहरा मेरा तुम तो बस इतना जानते,
क्योंकि गम दिल संग सीने में ही परदापोश है।

माँगता मैं रह गया, दे दो बहारों कुछ मुझे,
अनसुना कर बढ़ गईं, इसका बड़ा आक्रोश है।

अब कहाँ रौनक बची "गौरव" उमंगों की यहाँ,
घट रहा साँसों सहित धड़कन का पल-पल जोश है।

बुधवार, 6 नवंबर 2013

मुक्तिका - लोग हैं तैयार खुद की लाश ढोने के लिए

ख्वाब के मोती हकीकत में पिरोने के लिए।
लोग हैं तैयार खुद की लाश ढोने के लिए।

झोंपड़े में सो रहा मजदूर कितने चैन से,
है नहीं कुछ पास उसके क्योंकि खोने के लिए।

आसमां की वो खुली, लंबी उड़ानें छोड़कर,
क्यों तरसते हैं परिंदे कैद होने के लिए।

जिंदगी भर खून औरों का बहाते जो रहे,
जा रहे हैं तान सीना पाप धोने के लिए।

जगमगाते हैं दिखावे से शहर के सब मकान,
सादगी तो रह गई है मात्र कोने के लिए।

पुष्प सारे चल दिए रंगीन गमलों की तरफ,
रह गया उजड़ा चमन बदहाल रोने के लिए।

रविवार, 3 नवंबर 2013

नया-नवेला चिड़ा सुहाना (बाल कविता)














नया-नवेला चिड़ा सुहाना
फैशनबाजी का दीवाना
हरा गॉगल्स, टोपी नीली
चोंच क्यूट सी, पीली-पीली
पैदा होते "हैल्लो" बोला
लगा गटकने कोका कोला
पाँव घोंसले से ना निकले
नटखट मन-दिल जाते फिसले
शरारती होगा ये पक्का
रख देगा कर हक्का-बक्का
मचाएगा ऐसी शैतानी
याद आएगी दादी-नानी

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

कविता - राष्ट्रवाद का अनुयायी है

















राष्ट्रवाद का अनुयायी है, राष्ट्रप्रेम की अलख जगाता।
भारतहित में सदा समर्पित, भारतमाता को नित ध्याता॥

साधारण परिवार में जन्मा, पर साधारण नहीं तेज है।
कंटकमय पथ को भी वो कर देता श्रम से पुष्प-सेज है॥

अविवाहित जीवन को चुनकर, लिया देश की सेवा का व्रत।
संघ समान शक्ति से जुड़कर, हुआ महान कर्म, तप में रत॥

अनुपम वक्ता, मधुर, मनोहर वाणी से जीत हृदय लेता।
बना प्रेरणा नवयुवकों की, नवरस जन-जन में भर देता॥

आज भयानक अँधियारे में, दीपक जैसा दीख रहा है।
देख उसे अविजित, मन सबका तम से लड़ना सीख रहा है॥

जगा रहा है हमें निरन्तर, आओ आहुति तुम भी डालो।
भटक रहा है राष्ट्र मार्ग से, सारे मिलकर इसे सँभालो॥

गीत - किरण दिखी है इक आशा की
















किरण दिखी है इक आशा की।

दुनिया में भारत का परचम एकबार फिर लहराएगा,
होंठ-होंठ मुस्कान सजेगी, धुंध छँटेगी हर बाधा की।
किरण दिखी है इक आशा की।

भूखा सोएगा ना कोई भी पीकर प्याले आँसू के,
सपने भी सच होंगे सारे, राह सजेगी अभिलाषा की।
किरण दिखी है इक आशा की।

कमल खिलेगा सदभावों का सभी दिलों के तालाबों में,
मंदिर होगा देश हमारा औ' पूजा भारतमाता की।
किरण दिखी है इक आशा की।

सफल नहीं हो पाएंगी अब चालें घर के गद्दारों की,
जगह नहीं होगी नफरत की ना नफरतवाली भाषा की।
किरण दिखी है इक आशा की।

मुक्तिका - ये मिला मौका सुनहरा मत गँवाना साथियों




















रो चुका भारत बहुत अब है हँसाना साथियों।
ये मिला मौका सुनहरा मत गँवाना साथियों।

भ्रष्ट करते जा रहे हैं खोखला निशिदिन हमें,
आज हमको मिल इन्हें होगा मिटाना साथियों।

सरहदों पे बांकुरों के हाथ बांधे जा रहे,
उनके मन विश्वास भी होगा बढ़ाना साथियों।

कबतलक देखोगे कटते शीश बेटों के कहो,
काट के सिर तो हमें रिपु का गिराना साथियों।

वोट खातिर तुष्ट करना नीति है घातक बड़ी,
किन्तु ये धंधा रहा उनका पुराना साथियों।

"डर" दिखा भरमाएँगे वो फिर तुम्हें इसबार भी,
तुम किसी ऐसे छलावे में न आना साथियों।

रख चुके गिरवी हमारा मान वो परदेस में,
अब सबक इन द्रोहियों को है सिखाना साथियों।

शोभती मूरत नहीं कोई सिंहासन पे रखी,
आ गया है वक्त अब उसको हटाना साथियों।

शनिवार, 21 सितंबर 2013

धर्म के विरुद्ध नित्य षडयंत्र हो रहे हैं - घनाक्षरी

धर्म के विरुद्ध नित्य षडयंत्र हो रहे हैं, पुष्प राष्ट्रवाद का भी आज कुम्हला रहा।
आसुरी प्रवृत्तियों से त्राहि-त्राहि साधुता है, एक अँधियारा मानो गगन में छा रहा।
दुःख की तो बात है कि सबकुछ देख के भी, तरुणों के रक्त में उबाल नहीं आ रहा।
किसकी नजर लगी भारत की वीरता को, शूकरों का झुंड खड़ा शेर को चिढ़ा रहा॥

महाराणा प्रताप के वंशज किधर गये, पृथ्वीराज चौहान के पूत कहाँ खो गये।
दिखते नहीं महान शिवाजी के बेटे भी तो, लगता है ये सब अतीत में ही सो गये।
काट रहे गोरी औ' औरंगजेब क्रूरता से, हिंदुत्व की फसलों को पुरखे जो बो गये।
साम, दाम, दंड, भेद का चला कुचक्र ऐसा, बचे-खुचे नाहर भी पामर से हो गये॥

अपने ही देश का विनाश करने चले हो, अरे कुलघातियों बहुत पछताओगे।
नीड़ जब तिनके समान बिखर जाएगा, बरसात में सोचो कहाँ सिर छुपाओगे।
क्षणभर के लिए नहीं देगा शरण कोई, घुट खुले आसमां के नीचे मर जाओगे।
वर्तमान से तो गालियाँ हजार मिलेंगी ही, भविष्य में भी सदा कलंक कहलाओगे॥

वक्त दे रहा है एकबार फिर मौका तुम्हें, शूल ये विधर्मिता का जड़ से उखाड़ दो।
मटमैला सा पड़ा है देशदर्पण जो आज, आओ सुतों सब मिल धूल सारी झाड़ दो।
योजनाएं बन रही राष्ट्र के विरुद्ध जो भी, पौरुष दिखाओ सारी योजना बिगाड़ दो।
वीर हो महान तुम पकड़ के शत्रुओं को, एक पटकन में ही भू पर पछाड़ दो॥

बुधवार, 18 सितंबर 2013

पाँच बरवै

इस दुनिया में जो भी, पिये शराब।
खुद ही अपना जीवन, करे खराब॥

मद्यपान है घातक, समझें आप।
करा रहा यह जग में, कितने पाप॥

कर अपने अंतर्मन, को खामोश।
दारू पीकर मानव, खोता होश॥

भाई सच को देखो, आँखें खोल।
पैसे देकर लेते, विष क्यों मोल॥

अस्त-व्यस्त से कपड़े, बिखरे केश।
पियक्कड़ों का हरदिन, का यह वेश॥


बहादुर चंपू (बाल कहानी)

चंपू खरगोश कंधेपर बस्ता टाँगे शाम को ट्यूशन से घर लौट रहा था। उसे आज नया ज्योमैट्री बॉक्स खरीदने के चक्कर में देर हो गई थी। सर्दियों के दिन थे सो अँधेरा जल्दी घिर आता था। वो तेजी से पैर बढ़ा रहा था ताकि शीघ्र घर पहुँच सके। उनदिनों जंगल में बच्चों के अपहरण की घटनाएं काफी बढ़ गई थीं। कुछ ही दिन पहले छज्जू हिरण के बेटे छुनकू को कुछ अपराधियों ने उठा लिया था। उसका अभीतक कोई पता नहीं चल पाया था। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए चंपू की माँ ने उसे रोज जल्दी घर लौटने को कहा था। ट्यूशन की जगह से चंपू के घर के बीच थोड़ी दूरतक रास्ता सुनसान पड़ता था। वहाँ दोनों तरफ घने पेड़ थे और स्ट्रीट लाइट भी काफी दूर-दूरपर लगी थी। जब चंपू वहाँ पहुँचा तो और सतर्क हो गया। उसने अपनी चाल थोड़ी और तेज कर दी।

तभी अचानक चंपू को अपने पीछे से कुछ आहट सी सुनाई दी। वो कुछ समझ पाता इससे पहले किसी ने उसका मुँह कसके दबाकर उसे उठाया और पेड़ों के बीच बने एक कच्चे रास्ते की ओर भागा। थोड़ा अंदर जाने के बाद वो रुका और एक अजीब सी आवाज निकाली। उसके ऐसा करते ही उसके कुछ और साथी झाड़ियों से निकलकर वहाँ आ गये। चंपू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने उनसब की ओर देखा। अँधेरा होने के कारण कुछ ज्यादा स्पष्ट तो नहीं दिख रहा था लेकिन चंपू को इतना समझ आ ही गया कि वो चार-पाँच लोमड़ थे। तभी जिसने चंपू का मुँह दबाया हुआ था उसने उससे कहा कि देख छोकरे, तेरे मुँह से हाथ हटा रहा हूँ। अगर कोई आवाज की तो गला काट दूँगा, यह कह उसने उसके मुँह से हाथ हटा दिया। चंपू को बहुत डर लग रहा था। वो अकेला एक छोटा खरगोश का बच्चा और कहाँ वो चार-पाँच हट्टे-कट्टे लोमड़। वो डर के मारे रोने लगा। उसे रोता देख सब हँसने लगे। उनसबों ने उसे ले जाकर एक पुराने घर में बंद कर दिया और खुद बाहर बैठकर कुछ बात करने लगे।

बेचारा चंपू अंदर बहुत डरा-सहमा बैठा था। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे। वो रोने लगा लेकिन फिर उसने अपने मन को शांत किया। वो जानता था कि रोने से कुछ नहीं होनेवाला। उसने आँसू पोंछे और सोचने लगा। उसे काफी डरा हुआ देखकर लोमड़ों ने उसके हाथ-पैर खुले ही छोड़ दिये थे। उन्होंने सोचा कि ये कहाँ भागेगा? ये तो वैसे ही डर से रो रहा है। तभी चंपू को किसी और के भी रोने की आवाज सुनाई दी। आवाज बगल के कमरे से आ रही थी। चंपू धीरे से बगलवाले कमरे तक गया और झांका। वो हैरान रह गया। वहाँ छज्जू हिरण का लापता बेटा छुनकू बैठा रो रहा था। चंपू समझ गया कि उसका भी अपहरण इन्हीं बदमाशों ने किया है। वो छुनकू के पास गया। छुनकू उसे देखते ही उससे लिपट गया और रोने लगा। छुनकू ने उसे बताया कि ये लोमड़ बड़े दुष्ट हैं। ये बच्चों को मारकर उनके अंग निकाल लेते हैं। उन्हें बेचकर इन्हें काफी पैसे मिलते हैं। कुछ दिन पहले इनका एक साथी भेड़िया आया था। उससे ये लोग यहीसब बातें कर रहे थे। जिसे सुनकर उसे सारी बातें पता चलीं। चंपू ने उसे भी हिम्मत बँधाई और इस समस्या से निकलने का उपाय सोचने को कहा। छुनकू भी चुप हो गया और चंपू का हाथ पकड़कर बैठ गया। तभी चंपू को एक आइडिया आया। उसने छुनकू के कान में कुछ कहा। सारी बातें सुनने के बाद छुनकू ने घबराते हुए उससे पूछा -

"क्या इसमें कोई खतरा नहीं?"

"खतरे के डर से बैठे रहे तो यहीं फँसे रह जाएंगे। हमें हिम्मत दिखानी ही होगी" चंपू ने दृढ़ता से कहा।

फिर चंपू उठा और अपने बस्ते को खोल उसमें से ज्योमैट्री बॉक्स निकाला। बदमाशों ने उसका बस्ता भी उसी कमरे में छोड़ दिया था। उसमें से उसने अपना परकार निकाला और उसे अपने पास छुपाकर रख लिया। फिर वो दरवाजे के पास आया और बाहर उन लोमड़ों की बातें सुनने की कोशिश करने लगा। तभी उसे दरवाजे में एक सुराख दिखी। उसने उससे बाहर झांका। उसने देखा कि पाँचो बैठे कुछ बात कर रहे थे। फिर थोड़ी देर बाद उनमें से चार उठे और कहीं चले गये। शायद वो खाना खाने गये थे। एक अभी वहीं बैठा निगरानी कर रहा था। चंपू ने जान लिया कि यही सही मौका है कुछ करने का। वो भागकर छुनकू के पास आया और उसके कान में कुछ कहा। सुनते ही छुनकू उठा और दरवाजे के पास आकर आँखें बंद कर लेट गया। चंपू भी वहीं आकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा -

"अंकल, जल्दी आइए, ये जाने कैसे बेहोश हो गया है, जल्दी आइए" कहते-कहते उसने रोना शुरु कर दिया।

बाहर बैठे लोमड़ ने जब उसके रोने की आवाज सुनी तो वह भागा अंदर आया। आखिर उसे उन्हें बेचकर ही तो पैसे मिलने थे। वो अंदर आया तो उसने देखा कि छुनकू जमीनपर गिरा था और चंपू उसके पास ही बैठा रो रहा था।

"क्यों रे, क्या हुआ इसे? तूने मारा है क्या" उसने गुस्से में पूछा।

"नहीं नहीं, मैंने कुछ नहीं किया। ये खुद ही यहाँ गिर पड़ा" चंपू डरने का नाटक करते हुए बोला।

"तो इसे क्या हुआ" कहता हुआ वो लोमड़ उसके नजदीक आया और उसे देखने लगा। वो जैसे ही उसकी नब्ज देखने के लिए नीचे झुका चंपू ने अपने पास छुपा परकार निकाला और एक झटके में उस लोमड़ की एक आँख में भोंक दिया। जोरदार चीख मारकर वो दुष्ट लोमड़ वहीं जमीनपर गिर पड़ा और बुरी तरह तड़पने लगा। उसकी वो आँख फूट चुकी थी। वो दर्द से बिलबिला रहा था। चंपू और छुनकू झटके से उठे और बाहर की ओर भागे। बाहर कोई नहीं था। वो मुख्य सड़क की ओर भागने लगे।

सड़क के नजदीक आते ही उसे थानेदार गन्नू हाथी की पेट्रोलिंग जीप आती दिखी। वो सड़क किनारे खड़े होकर "बचाओ बचाओ" चिल्लाने लगे। गन्नू ने जैसे ही उन्हें देखा उसने अपनी जीप रोकी और उतरकर उनके पास आया। सारी बातें जानकर गन्नू ने उन्हें बहुत शाबासी दी और उन्हें उन बदमाशों का अड्डा दिखाने को कहा। चंपू गन्नू को लेकर वापस उसी जगह पर आया और वो घर दिखा दिया जहाँ उन बदमाशों ने उसे रखा था। गन्नू अपनी रिवाल्वर हाथ में ले अंदर घुसा तो देखा कि वो लोमड़ जिसकी आँख चंपू ने फोड़ दी थी, बेहोश पड़ा था। बाकी शायद अभी लौटे नहीं थे। गन्नू ने तुरंत उस लोमड़ को अपनी जीप में डलवाया और बाकियों का इंतजार करने लगा। बाकी चारों बदमाश थोड़ी ही देर बाद वहाँ आते दिखाई दिये। उनके घर में घुसते ही गन्नू ने उनसब को भी पकड़ लिया और थाने ले आया। उनसे सख्ती से पूछताछ करनेपर उन्होंने अपने पूरे गिरोह का पता बता दिया। सारा गिरोह पकड़ा गया।

गन्नू ने अपनी जीप में बिठाकर चंपू और छुनकू को उनके घरोंतक पहुँचाया। चंपू के माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था। चंपू को देखते ही उन्होंने उसे गले से लगा लिया। छुनकू के माँ-बाप भी छुनकू को देख खुशी से नाच उठे। अगले दिन के अखबारों में चंपू और छुनकू की बहादुरी के ही किस्से थे। सभी उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे थे। अपहर्ता गिरोह के पकड़े जाने से जंगलवासियों ने एकबार फिर चैन की साँस ली और सभी खुशी-खुशी रहने लगे।

कह मुकरियाँ

(1)
जो चाहोगे दिलवाएगी,
काम हमेशा ये आएगी।
खिलवाएगी खूब मिठाई,
क्या वो परियाँ? नहीं "पढ़ाई"॥

(2)
सबसे अच्छी दोस्त तुम्हारी,
बात बताती प्यारी-प्यारी।
देती हरदम सही जवाब,
क्या वो मीना? नहीं "किताब"॥

(3)
डरना कभी न जिसने जाना,
हमने-तुमने "हीरो" माना।
भागा जिनके डर से पाजी,
स्पाइडरमैन? नहीं "शिवाजी"॥

(4)
भारत को वो जीत दिलाते,
दुनिया में लोहा मनवाते।
दुश्मन कहते जिन्हें "तबाही",
धोनी, वीरू? नहीं "सिपाही"॥

(5)
खेल हमारा जाना-माना,
गाँव-गाँव जाता पहचाना।
जिसमें हमसे सभी फिसड्डी,
क्या वो क्रिकेट? नहीं "कबड्डी"॥

(6)
बड़े-बड़ों को दे पटकनिया,
उसके आगे झुकती दुनिया।
जीते हरदम वही लड़ाई,
अंडरटेकर? नहीं "चतुराई"॥

सही समय का सही निर्णय - बाल कहानी

चंदनवन में आज फिर पंचायत बुलाई गई थी। मोटू भालू और झक्का भेड़िये के बीच हुए झगड़े के मामले में फैसला सुनाया जाना था। सरपंच ढुलढुल छछूंदर पगड़ी बाँधे रौब से बाकी चार पंचों भुलभुल गदहा, चंकू बिल्ला, छिप्पू खच्चर और भंगू सियार के साथ बैठे थे। कार्यवाही शुरु हुई।

मोटू भालू ने पहले कहा - "सरपंच जी, कल शाम को मैं रोजाना की तरह अपनी दुकान बंद कर घर लौट रहा था। लगभग ७ बज रहे थे। तभी रास्ते में इस झक्का ने मुझसे मारपीट की और मेरे पास मौजूद पाँच हजार रुपये छीन लिए। वो मेरी हफ्तेभर की कमाई थी। अगर मुझे वो रुपये वापस नहीं मिले तो मैं इस हफ्ते राशन भी नहीं खरीद पाऊँगा। मैं और मेरा परिवार भूखे मर जाएँगे। न्याय करें सरकार, कृपया न्याय करें" कहते-कहते मोटू रो पड़ा।

अब बारी झक्का भेड़िये की थी। उसने अपने उपर लगे आरोप को सिरे से नकारते हुए कहा - "ये सरासर झूठ बोल रहा है सरपंच जी। मैं तो कल शाम ६ बजे के बाद अपने घर से बाहर निकला ही नहीं। मेरी फेवरेट फिल्में टीवीपर आ रहीं थी। वहीसब देख रहा था। फिर मैं इसके रुपये कैसे छीन सकता हूँ? ये मुझे न जाने क्यों फँसाने की कोशिश कर रहा है। न्याय करें सरकार" कहता हुआ झक्का कुटिलता से मुस्कुराया।

"हम्म, तो ये मामला है। मोटू तुम्हारे पास कोई गवाह है?" सरपंच ढुलढुल छछूंदर ने पूछा।

"जी सरकार, जहाँ ये घटना हुई वहाँ से थोड़ी ही दूर पर चमकू बंदर और हनु हाथी की दुकानें हैं। उन्होंने सब अपनी आँखों से देखा है"

"चमकू बंदर और हनु हाथी को हाजिर किया जाए"

दोनों हाजिर हुए। चमकू बोला - "जी सरपंच जी, मोटू सही कह रहा है। झक्का ने उससे पैसे छीने हैं। मैंने अपनी आँखों से देखा है"

हनु ने भी मोटू के ही पक्ष में गवाही दी - "जी सरपंच जी, मैंने झक्का को मोटू से रुपये लूटकर भागते अपनी आँखों से देखा है"

"झक्का, तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत है कि तुमने गुनाह नहीं किया?" ढुलढुल छछूंदर ने झक्का से भी पूछा।

"नहीं सरकार, मेरे पास कोई सबूत नहीं। मैं तो घर में था" झक्का फिर कुटिलता से मुस्कुराते हुए बोला।

सरपंच ढुलढुल छछूंदर ने बाकी पंचों से राय-मशविरा करने के बाद फैसला सुनाते हुए कहा - "हम्म, हमने सारा मामला सुना। इतना तो तय है कि मोटू से रुपये लूटे गये। लेकिन ये बात साबित नहीं हो पाई कि रुपये झक्का ने ही लूटे। हनु और चमकू की गवाही जरूर इस ओर इशारा कर रही है कि दोषी झक्का है परंतु जब ये घटना हुई उस समय शाम के ७ बज रहे थे। उस समय काफी अँधेरा होता है। दोनों ने सही ही देखा इस बात की कोई गारंटी नहीं। हो सकता है उन्हें भ्रम हुआ हो। अतः ये पंचायत झक्का को संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी करती है। हम कोतवाल बहादुर कुत्ते को आदेश देते हैं कि इस मामले की जाँचकर असली मुजरिम को गिरफ्तार करे। पंचायत समाप्त हुई"

मोटू फैसले से अवाक रह गया। वो बिलख-बिलखकर रोने लगा। हनु और चमकू भी दंग थे। सब सरपंचों को कोसते हुए धीरे-धीरे अपने-अपने घर लौट गये।

दरअसल इस तरह के अन्यायपूर्ण फैसले चंदनवन के लिए कोई नये नहीं थे। ये हमेशा की बात हो गई थी। चंदनवन में भालुओं की संख्या सबसे अधिक थी किन्तु उनमें एकता का अभाव था। बात-बातपर लड़ते रहते। भेड़िये संख्या में भालुओं से एक चौथाई ही थे लेकिन एकजुट थे। जब-जब वन में चुनाव आते वो अपने किसी चमचे छछूंदर, गदहे, सियार या गिरगिट को ही वोट देकर पंच, सरपंच आदि बनवा देते। बदले में उनसे अपने लिए ढेरों सुविधाएं माँग लेते। वो बिकाऊ पंच सदा भेड़ियों की तरफदारी करते थे। वन में हाथी, बंदर, हिरण आदि जानवर नाममात्र के ही थे। सो वो भी खुलकर भेड़ियों के इस गड़बड़झाले के विरुद्ध आवाज नहीं उठा पाते थे।

लेकिन आज के फैसले ने सारे जानवरों में एक गुस्सा भर दिया। आँखों देखी बात झुठलाकर लिया गया गलत निर्णय उनके गले नहीं उतर पा रहा था। अगले ही दिन एक सभा हुई। सारे जानवर उसमें सम्मिलित हुए। सबने आपस में विचार किया कि यदि इन दुष्ट भेड़ियों के जुल्मों से वन को बचाना है तो आपसी छोटे-छोटे झगड़ों को भुलाना ही होगा। सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सब एक होकर अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे।

वन में जब अगला चुनाव आया तो सबने आपसी झगड़े भूलकर वोट डाला। चुनाव परिणाम की घोषणा होते ही जंगल में खुशी व्याप्त हो गई। ईमानदार वीरु भालू सरपंच चुन लिये गये थे। बाकी के चार पंचों के लिए भी लंबू जिराफ, चुटपुट बंदर, मिक्कू गिलहरी और छज्जू हिरण का चयन हुआ था। ये सब अपनी दयालुता और बुद्धिमता के लिए पूरे वन में प्रसिद्ध थे। दुष्ट भेड़िये रातोंरात कहीं भाग गये। कुछ ही दिनों में चंदनवन एक खुशहाल वन के रूप में जाना जाने लगा। सही समयपर लिए गये सही निर्णय ने चंदनवन को बर्बाद होने से बचा लिया। सभी जीव हँसी-खुशी से रहने लगे। 

सोमवार, 16 सितंबर 2013

मुक्तिका - वीरता अब हो रही गुमनाम है

वीरता अब हो रही गुमनाम है।
कायरों की रोज रंगीं शाम है।

हाल भारी है बुरा इस देश का,
मच रहा चहुँओर ही कुहराम है।

भौंकता "नापाक" सीमा लाँघ के,
दंड अपना क्यों पड़ा बेकाम है।

घूमते हैं सेठ बनके लोग वो,
भीख से जिनका भरा गोदाम है।

बाँकुरों के हाथ बाँधे "वोट" ने,
मान अपना हो रहा नीलाम है।

पामरों का झुंड भारत बन गया,
जा रहा जग को यही पैगाम है।

चोट जो खाई हमारे गर्व ने,
दीखती हमपर बड़ा इलजाम है।

बोल दें कैसे बता "गौरव" हमें,
अब यहाँ आराम ही आराम है।

शनिवार, 7 सितंबर 2013

चिड़िया रानी












चिड़िया रानी, चिड़िया रानी,
तुम तो निकली बड़ी सयानी।

मेरी बगिया में तुम आई,
एक पेड़पर जगह बनाई।
मिहनत से मुँह कभी न मोड़ा,
तिनका-तिनका तुमने जोड़ा।
एक घोंसला वहाँ बनाया,
जो हमसब के मन को भाया।
करी नहीं तुमने शैतानी,
तुम तो निकली बड़ी सयानी।

बच्चे आये वहाँ तुम्हारे,
छोटे-छोटे, प्यारे-प्यारे।
दाने उनको रोज खिलाती,
उड़ना भी तुम ही सिखलाती।
चूँ-चूँ, चूँ-चूँ बच्चे गाते।
चहक-चहक डालोंपर जाते।
तुमसे बगिया हुई सुहानी।
तुम तो निकली बड़ी सयानी।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

अबकी बजने दे रणभेरी (आल्हा छंद)

शठ, कायर, कुंठित नापाकी, भूल नहीं जाना औकात।
तुझे मसलने को काफी है, हिन्दी वीरों की इक लात॥
विश्वपटल से मिट ही जाती, अबतक तुम दनुजों की जात।
विवश मगर कर देती हमको, राजनीति की बिछी बिसात॥

चार बार आया लड़ने तू, थूक-थूक चाटा हरबार।
इकहत्तर में अंग गँवाया, तो करगिल में मान अपार॥
भूख नाचती घर में फिर भी, जुटा रहा घातक हथियार।
अरे रक्त ही गंदा तेरा, औ' बर्बर, वहशी संस्कार॥

छुरा पीठ में घोंप रहा है, फेंक-फेंक अनगिन छलजाल।
चिनगारी देखी है तूने, देखा नहीं अभीतक ज्वाल॥
अबकी बजने दे रणभेरी, लाएंगे ऐसा भूचाल।
घर में घुस-घुसके मारेंगे, खींच-खींचके तेरी खाल॥

बुधवार, 10 जुलाई 2013

बाल मुक्तिका





















अरे बच्चों चलो देखें, नया सर्कस जो आया है।
तमाशों का पिटारा इक वो अपने संग लाया है।

लिये ढोलक चले ठुम-ठुम बँदरिया झूमती-गाती,
चलाता साइकिल भालू सभी के मन को भाया है।

सलामी दे रहा हाथी, तो तोता दागता तोपें,
किसी दमदार ने बाइक को रॉकिट सा उड़ाया है।

गुजर जाती मजे से आग के छल्लों से इक लड़की,
बड़ी हिम्मत भरी उसमें, उसे डर छू न पाया है।

करामातें दिखाते गेंद से जोकर रँगीले नौ,
चलाना बाघ को रिक्शा भला किसने सिखाया है।

लगा मौका मजे ले लो, सुनाना स्कूल में किस्से,
कि कैसे शेर ने करतब दिखा सबको हँसाया है।

रविवार, 23 जून 2013

घनाक्षरी - हो रहा कुचक्र भारतीयता के नाश हेतु

हो रहा कुचक्र भारतीयता के नाश हेतु, दानवों, विधर्मियों का फैल रहा जाल है।
खंड-खंड हो रही है कामना अखंडता की, टूटने को व्यग्र होती आज डाल-डाल है।
वोटबैंक तुष्ट रहे, लालसा है सेवकों की, दोषियों को छोड़ने का हो रहा कमाल है।
देश के सपूत खा रहे हैं लाठियाँ हजार, गाड़ियों में घूमता विदेश का बिडाल है॥

नारियों के वस्त्र छोटे आधुनिकता दिखाते, कैसी ये विडंबना हुई नये समाज में।
"कूल डूड" कहलाना भाने लगा तरुणों को, अंगरेजी दासता ही दीखती रिवाज में।
कोयलों ने कूकना तो कब का ही छोड़ दिया, अब गाता गदहा है फटी सी आवाज में।
तेजोमहालय का तो नाम भी न लेता कोई, सारे रुचि लेने लगे मुरदों के ताज में॥

नाचते हैं नग्न शत्रु शीश तान ढीठता से, खूब नोंचते हमारी आन, बान, शान को।
संपदा अपार लूट, रौंद पुष्प-डालियों को, छू रहे हैं नित्य दुष्ट पाप के उफान को।
जानते सभी हमारे सैनिकों के हाथ बँधे, लोकतंत्र है सुसुप्त, भूलता विधान को।
त्राहिमाम, त्राहिमाम हंस हैं पुकारते व, हो रहा नसीब राज गिद्ध, चील, श्वान को॥

मौन तो प्रतीक धीरता, विवेक का परंतु, बेबसी का आज वो निशान है बना हुआ।
कायरों की ढाल, कर्महीनता का माल और, निर्बलों के माथ भव्य छत्र सा तना हुआ।
सत्य से विहीन, चाटुकारिता से ओतप्रोत, लिप्त देशद्रोह में व पाप से सना हुआ।
एक अंधकार स्वार्थ, लोभ, मोह, वासना का, क्षुद्रता से युक्त हो जो और भी घना हुआ॥

बुधवार, 29 मई 2013

समझदार चप्पू

चप्पू हिरण नंदनवन में अपने परिवार के साथ रहता था। वो एक बहादुर और समझदार छौना (हिरण का बच्चा) था। छुटपन में ही वो बड़ी बुद्धिमानी की बातें करता था। वो पढ़ने में भी बहुत तेज था। हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आता। अपने से बड़ों की इज्जत करता और उनका कहा मानता। सुबह-सुबह उठकर नित्यक्रिया से निवृत होने के बाद नहा-धोकर भगवान का ध्यान करना उसकी दिनचर्या में शामिल था। वो जम के हरी सब्जियाँ खाता और दूध पीता था। इससे उसको खेलने और पढ़ने के लिए भरपूर ताकत मिलती थी।

एक दिन चप्पू के स्कूल में छुट्टी थी। वो घर में बैठा पढ़ाई कर रहा था। उसके पिताजी दफ्तर गये हुए थे और माँ खाना बना रही थी। तभी रसोई गैस खत्म हो गई। चप्पू की माँ ने चप्पू को आवाज दी - "चप्पू, जरा इधर आ बेटा"

चप्पू आया - "क्या बात है माँ"

उसकी माँ बोली - "अरे बेटा देख न, रसोई गैस खत्म हो गई। जा जरा छुनकू चाचा के यहाँ से एक लीटर केरोसिन ले आ। तेरे पापा तो शाम तक आएँगे, तबतक स्टोव से ही काम चलाना पड़ेगा। ये ले पैसे और डिब्बा, जो पैसे बच जाएं, वो तू रख लेना, अच्छा।"  चप्पू के माँ-बाप कभी उससे पैसों का हिसाब-किताब नहीं माँगते थे। उन्हें चप्पू पर पूरा विश्वास था।

"ठीक है माँ" चप्पू पैसे लेकर निकल गया।

छुनकू छुछुंदर की कंट्रोल रेट दुकान पास में ही थी। उसका केरोसिन का कारोबार था। वो एक नंबर का लालची
था। मौका लगते ही किसी को भी ठग लेता। चप्पू उसकी दुकान पर पहुँचा।

"प्रणाम छुनकू चाचा, एक लीटर केरोसिन देना" चप्पू ने कहा।

"हें....हें.....हें....अरे चप्पू बेटा, खुश रहो खुश रहो, कैसे हो। आज बड़े दिन बाद चाचा की याद आई" छुनकू दाँतें निपोरते हुए बोला।

"रसोई गैस खत्म हो गई है चाचा। माँ ने एक लीटर केरोसिन लाने को कहा है। वही लेने आया हूँ" चप्पू ने मुस्कुरा के जवाब दिया।

"हें....हें.....हें....अभी लो बेटा अभी लो" छुनकू ने तेल नापने का बर्तन उठाया।

छुनकू जब तेल नाप रहा था तो चप्पू की नजर नापनेवाले बर्तन के पेंदे पर गई। अरे ये क्या, बर्तन का पेंदा अंदर की ओर काफी ज्यादा धँसा हुआ था। चप्पू समझ गया कि इस लालची छुनकू ने तेल कम नापने के लिए ये शरारत कर रखी है। लेकिन वो चुप रहा और सब देखता रहा। तेल चप्पू के डिब्बे में डालकर छुनकू ने काउंटर पर रखा और बोला - ये लो चप्पू बेटा, एक लीटर केरोसिन। पैंतालीस रुपये हुए लेकिन तुम्हारे लिए सिर्फ तैंतालीस.....हें....हें.....हें...."

चप्पू ने आज सुबह के ही अखबार में केरोसिन का दाम चालीस रुपये होने की खबर पढ़ी थी। वो समझ गया कि अब इस लालची को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसने अनजान होने का नाटक करते हुए कहा - "चाचा आप कितने अच्छे हैं। आपका तेल नापने का बर्तन तो और भी अच्छा है। उसको उल्टा कर के भी उसमें काफी कुछ रखा जा सकता है। आपने उसे इतनी अच्छी तरह से ठोंका है कि बाहर से देखने में कुछ पता नहीं चलता कि वो बर्तन दोनों तरफ से काम में लाया जा सकता है। आप तेल पैंतालीस में बेचते हैं लेकिन मेरे लिए उसमें दो रुपये कम कर देते हैं। उन दो रुपयों से मैं दो टॉफियाँ खरीद सकता हूँ। वाह वाह चाचा। ये बातें मैं सबको बताऊँगा। अपने घर में, स्कूल में सबको। ये लिजिए तैंतालीस रुपये"

सबको बताने की बात सुनकर छुनकू का तो डर के मारे बुरा हाल हो गया। वो बेईमानी तो कर ही रहा था। उसने चप्पू को बच्चा समझ के ठगना चाहा लेकिन यहाँ तो दूसरी बात हो गई। उसे तो काटो तो खून नहीं। वो घबराहट को छिपाते हुए बोला - "अरे बेटा, ये चाचा-भतीजे के बीच की बातें सबको काहे बताओगे। ये तो अपनी आपस की बात है। ये लो अपने तीन रुपये और वापस ले लो। मेरी दुकान यानि तुम्हारी दुकान। अरे थोड़ा सा और केरोसिन भी लेते जाओ। लेकिन किसी से कुछ कहना मत"

चप्पू बोला - "अरे चाचा, आप तो डर गये लगते हैं। आप चोरी थोड़े कर रहे हैं कि आपको पुलिस पकड़ लेगी"

छुनकू ने बात संभालने की कोशिश की - "अरे नहीं-नहीं चप्पू बेटा। वो बात नहीं है। दरअसल ये छूट तो मैं तुम्हें खासतौर से दे रहा हूँ। अब तुम तो मेरे सबसे प्यारे भतीजे हो। तुम्हें नहीं दूँगा तो और किसे दूँगा। जब सबलोग जान जाएंगे तो सब माँगने लगेंगे। सब को देने लगा तो मेरा तो बड़ा नुकसान हो जाएगा न, ....हें....हें.....हें...."

चप्पू तो सब समझ ही रहा था। उसने कहा - "ठीक है चाचा, जैसी आपकी मर्जी। तब तो मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगा, अच्छा अब चलता हूँ"

कह के चप्पू जाने के लिए मुड़ा। छुनकू उसे जाता समझ के खुश हो ही रहा था कि चप्पू फिर पलटा।

छुनकू घबराया - "क्या बात है बेटा, कुछ भूल गये क्या?"

चप्पू बोला - "चाचा, अभी-अभी याद आया। मेरे स्कूल के बगल में भी एक आपकी दुकान के जैसी ही दुकान है। कुछ दिनों पहले वहाँ पुलिस आई थी। पुलिसवाले वहाँ खड़े लोगों को उस दुकान में रखे सामान नापनेवाले बर्तन दिखा-दिखाकर कुछ कह रहे थे। मुझे लगता है कि वो उस दुकान के मालिक की बड़ाई कर रहे थे क्योंकि उसने भी अपने नापनेवाले बर्तनों को आपकी ही तरह दोनों तरफ से काम में लानेवाला बना रखा था। मतलब उसके तले को अंदर की तरफ ठोंका हुआ था। जैसा आपने किया हुआ है। उसके बाद पुलिस उस दुकानदार को जीप में बैठा के कहीं ले गई। मुझे तो लगता है कि वो दुकानदार खूब मजे कर रहा है क्योंकि अभीतक वापस आया नहीं है। यदि पुलिस को आपके बारे में पता चला तो वो आपको भी अपने साथ ले जाएगी और खूब मजे कराएगी। कितना मजा आएगा न? आप मुझे भी अपने साथ बुला लेना। हमदोनों खूब मस्ती करेंगे"

छुनकू को तो पसीना आने लगा - "अरे बेटा लेकिन.........."

चप्पू ने जिद पकड़ ली - "लेकिन-वेकिन कुछ नहीं चाचा। मैं सबको भले न बताऊं, लेकिन पुलिस को बताने में तो कोई हर्ज नहीं? इसमें मुझे कोई दिक्कत भी नहीं होगी। मेरे दोस्त चिंकू खरहे के पापा पुलिस में ही हैं। बस मुझे चिंकू से कहना है। वो अपने पापा से कहेगा और फिर तो मजा ही मजा है, अब मैं चला। आप तैयार रहना....."

पुलिस के नाम से छुनकू की बची-खुची हिम्मत भी जवाब दे गई। उसके मुँह से निकल गया - "अरे बेटा, ऐसे ठोंके हुए बर्तन का उपयोग करना चोरी ही कहलाता है। तय दाम से ज्यादा पर कुछ बेचना भी जुर्म है। उस दुकानदार को पुलिस पकड़ के जेल ले गई है, मजे कराने नहीं। अगर ये सब बातें तुम बाहर किसी को बता दोगे तो सचमुच पुलिस मुझे भी पकड़ लेगी। मैं तो तुम्हारा चाचा हूँ न"

अब चप्पू ने गुस्साते हुए कहा - "अच्छा तो आप मुझे ठग रहे थे"

"माफ कर दो बेटा माफ कर दो, तुम अड़तीस रुपये ही देना" छुनकू गिड़गिड़ाने लगा।

"रिश्वत दे रहे हैं क्या चाचा? अब तो मैं सबको बता के ही रहूँगा" चप्पू मानने के मूड में नहीं था।

"तो तुम ही बोलो बेटा मैं क्या करुँ" छुनकू फिर गिड़गिड़ाया।

"वादा किजिए कि आज से फिर किसी के साथ ऐसा नहीं करेंगे वर्ना मैं चला सबको बताने" चप्पू ने उससे कहा।

"ठीक है बेटा ठीक है। मैं वादा करता हूँ, कान पकड़ता हूँ। अब किसी से बेईमानी नहीं करुँगा" छुनकू अपने कान पकड़े हुए बोला।

"तो ठीक है। यदि आप ऐसा कहते है तो मैं आपको छोड़ देता हूँ। आखिर आप तो मेरे छुनकू चाचा हैं। ये लिजिए अपने चालीस रुपये" कहते हुए चप्पू ने छुनकू को रुपये दिए और केरोसिन लेकर मुस्कुराते हुए घर की ओर चल पड़ा।

बुधवार, 22 मई 2013

दोहे - मैला हुआ क्रिकेट


बिके हुए प्यादे सभी, बिका हुआ रनरेट।
लुप्त हुई है स्वच्छता, मैला हुआ क्रिकेट॥

लगा रहा है बैट तो, सौदे पर ही जोर।
टर्न हो रही गेंद भी, सट्टाघर की ओर॥

मैदानों पर चल रहा, बैट-बॉल का खेल।
परदे पीछे हो रहा, जुआरियों का मेल॥

खिलाड़ियों ने शौक से, बेच दिया है देश।
बाहर बैठे डॉन के, मान रहे निर्देश॥

माटी ने पैदा किया, पाला सालों-साल।
सुरा-सुंदरी के लिए, बिका देश का लाल॥

पकड़े तो कीड़े गये, बिच्छू हैं आजाद।
मारेंगे फिर डंक वो, कुछ अरसे के बाद॥

फैलाती डी-कंपनी, फिक्सिंग का ये जाल।
भारत के दुश्मन सभी, होते मालामाल॥

बीसीसीआई डरी, खड़े कर दिये हाथ।
नेटवर्क इतना बड़ा, कौन फँसाये माथ॥

गई कबड्डी काम से, खो-खो भी गुमनाम।
क्रिकेटिया इस भूत ने, हमको किया गुलाम॥

देशद्रोहियों को नहीं, मिले क्षमा का दान।
बहिष्कार इनका करो, कहता यही विधान॥

बुधवार, 8 मई 2013

मुक्तिका - शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है


कोई पगड़ी कुचलता तो कोई आँखें दिखाता है।
सहन करने लगे हम तो हमें जग आजमाता है।

सभी कहते अरे भाई, हमारा देश गाँधी का,
शिवाजी भी यहीं के हैं, नहीं क्यों याद आता है।

भरा होता तपा लोहा जहाँ के नौजवानों में,
शहर वो ही भला कैसे ठगा सा दीख जाता है।

जरा सी बात क्या कर दी वतन की लाज की खातिर,
जमाना कोसता मुझको, बड़ा जालिम बताता है।

मुझे तो प्यार है मेरे उसी प्राचीन भारत से,
जो वेदों की ऋचाएं पढ़के औरों को पढ़ाता है।

अदा माशूक की थोड़ी नहीं भाती कभी दिल को,
हमेशा लहलहाते खेतों का दर्शन सुहाता है।

बड़ा ही गर्व होता है सदा उस क्षण को "गौरव" जब,
तिरंगे को नमन करने विदेशी सिर झुकाता है।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

जय जय श्री हनुमान






















संतन के प्यारे बड़े, भक्तन के अभिमान।
करुँ निशिदिन मैं वंदना, जय जय श्री हनुमान॥(१)

रामदूत के नाम से, भागें भूत-पिशाच।
फूँके भय की झाड़ को, रामभक्ति की आँच॥(२)

गगन दबाता है चरण, चँवर डुलावे काल।
महावीर, बलवान हैं, अंजनि माँ के लाल॥(३)

हनुमत ही हैं प्रेरणा, सदकर्मों के मूल।
बजरंगी के तेज से, खिलते मरु में फूल॥(४)

महाप्रतापी केसरी, के सुत प्रभु हनुमान।
अंजनि माँ के लाडले, करते हैं कल्याण॥(५)

वेदों के ज्ञाता बड़े, दाता, कृपानिधान।
पवनतनय, संकटहरण, हैं हनुमत भगवान॥(६)

हनुमत का आशीष है, भारत वृक्ष विराट।
कोई भी बैरी नहीं, सकता जिसको काट॥(७)

पार लगाते मारुती, दुख-विपदा कर दूर।
कभी नहीं मन मानना, खुद को तू मजबूर॥(८)

दानव सेना घेर ले, भूत चलायें बाण।
जपो नाम हनुमान का, बच जाएंगे प्राण॥(९)

काहे को भटके मनुज, इधर-उधर अविराम।
हनुमत ही देंगे तुझे, मनवांछित परिणाम॥(१०)

रविवार, 21 अप्रैल 2013

ये मेरा खरगोश, बड़ा ही प्यारा-प्यारा (रोला छंद)

















ये मेरा खरगोश, बड़ा ही प्यारा-प्यारा,
गुलथुल, गोल-मटोल, सभी को लगता न्यारा।
खेले मेरे साथ, नित्यदिन छुपम-छुपाई,
चोर-सिपाही, दौड़ और पकड़म-पकड़ाई॥

लंबे-लंबे कान, रुई सी कोमल काया,
भोले-भाले नैन, देख के मन हर्षाया।
फुदक-फुदक चहुँओर, घूम घरभर में आता,
गाजर-पालक खूब, मजे ले चट कर जाता॥

हमने इसको गिफ्ट, किया है नरम बिछावन,
घर इक जालीदार, रंग जिसका मनभावन।
करता है आराम, रात को उसमें जाकर,
मिलता हमसे जाग, सुबह में बाहर आकर॥

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

कुछ छप्पय छंद


(१)
आहत खाकर बाण, मृत्यु शय्या पर लेटे,
पूछ रहा है देश, कहाँ हैं मेरे बेटे।
बचा रहे हैं प्राण, कहीं छुप के वारों से,
या वो नीच कपूत, मिल गये गद्दारों से॥
मुझको देते उपहार ये, मेरे निश्छल प्यार का।
क्या बढ़िया कर्ज चुका रहे, माटी के उपकार का॥

(२)
कितने-कितने ख्वाब, अभी से मन में पाले,
रहे गुलाटी मार, सेक्युलर टोपीवाले।
अपने मन से रोज, बदलते परिभाषाएं,
कलतक कहते चोर, आज खुद गले लगाएं॥
लेकिन बेचारे क्या करें, आदत से लाचार हैं।
वो बरसाती मेढक सभी, मतलब के ही यार हैं॥

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

छप्पय - धनवालों के होने लगे, नाटक सौ-सौ सेर के


मीठे-मीठे बोल, सभी के मन को भाते,
कड़वी सच्ची बात, लोग सुनकर चिढ़ जाते।

अपनी गलती भूल, सभी पर दोष लगाना,
है दुनिया की रीत, दुष्ट को साधु बताना॥

अब जिसको अपना जानिए, चल देता मुँह फेर के।
धनवालों के होने लगे, नाटक सौ-सौ सेर के॥

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

होता उल्टे काम का, गलत सदा परिणाम - दोहे (बाल रचना)





















मटकू गदहा आलसी, सोता था दिन-रात।
समझाते सब ही उसे, नहीं समझता बात॥
मिलता कोई काम तो, छुप जाता झट भाग।
खाता सबके खेत से, चुरा-चुरा कर साग॥
बीवी लाती थी कमा, पड़ा उड़ाता मौज।
बैठाये रखता सदा, लफंदरों की फौज॥
इक दिन का किस्सा सुनो, बीवी थी बाजार।
मटकू था घर में पड़ा, आदत से लाचार॥
जुटा रखी थी आज भी, उसने अपनी टीम।
खिला रहा था मुफ्त में, दूध-मलाई, क्रीम॥
उसके सारे दोस्त थे, छँटे हुए बदमाश।
खेल रहे थे बैठ के, चालाकी से ताश॥
मौका बढ़िया ताड़ के, चली उन्होंने चाल।
मटकू को लड्डू दिया, नशा जरा सा डाल॥
जैसे ही मटकू गिरा, सुध-बुध खो बेहोश।
शैतानों पर चढ़ गया, शैतानी का जोश॥
सारे ताले तोड़ के, पूरे घर को लूट।
बोरी में कसके सभी, लिये फटाफट फूट॥
बीवी आई लौट के, देखा घर का हाल।
रो-रो के उसका हुआ, हाल बड़ा बेहाल॥
मटकू को ला होश में, बतला के सब बात।
मारी उसको खींच के, पिछवाड़े पर लात॥
मटकू भी रोने लगा, पकड़-पकड़ के कान।
नहीं दिखाऊंगा कभी, ऐसी झूठी शान॥
सीख लिया मैंने सबक, पड़ा चुकाना दाम।
होता उल्टे काम का, गलत सदा परिणाम॥

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

सुंदरी सवैया - बहादुर मुनिया चुहिया





















मुनिया चुहिया सब से मिल के रहती, करती न कभी मनमानी।
वन के पशु भी खुश थे उससे, कहते - "हम बालक हैं, तुम नानी"।
मुनिया इक रोज उठी सुबहे गुझिया व पनीर पुलाव बनाने।
कुछ दोस्त सियार, कँगारु, गधे जुटते उसके घर दावत खाने॥

चिपु एक बिलाव बड़ा बदमाश, तभी गुजरा मुँह पान चबाते।
पकवान पके समझा जब वो, ठिठका तब लार बड़ी टपकाते।
मुँह ढाँप घुसा वह पैर दबा छुप के घर में तरमाल चुराने।
मुनिया सहसा पहुँची जब तो चिपु दाँत निकाल लगा डरवाने॥

मुनिया दिखलाकर साहस दौड़ गई, झट बेलन हाथ उठाया।
कस के कुछ बेलन दे चिपु के सिर पे उसको तब मार भगाया।
जब दोस्त जुटे घर में, मुनिया हँस के सबको यह बात बताई।
सुन बात, सभी मिल खूब हँसे कर के उसकी भरपूर बड़ाई॥

सोमवार, 25 मार्च 2013

दो घनाक्षरी छंद


(१)

नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो,
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।

धरती भी कहती है, गगन भी कहता है,
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने।

भलमानसत को वो, कमजोरी बूझते है,
चलो आज सारा नशा, उनका उतारने।

मनुजों के वेश में वो, दनुजों के वंशज हैं,
दौड़ पड़ो पापियों के, वंश को संहारने॥

(२)

वीरों को ही पूजते हैं, देश-दुनिया में सभी,
बालकों, युवाओं यह, सीख लो अतीत से।

रिपुओं के जड़मूल, का सफाया कर डालो,
दिल से निभाओ प्रीत, हरदम मीत से।

जीवन में क्षण ऐसे, मिलते हैं कभी-कभी,
जान पड़ती है प्यारी, हार जब जीत से।

पढ़ना सिखाना शुरु, नौनिहालों को करो तो,
शुरुआत होए सदा, किसी देशगीत से॥

शनिवार, 23 मार्च 2013

आज के रिश्ते - लघुकथा


इंजिनियर रामबाबू अपनी बेटी दिव्या को एयरपोर्ट छोड़कर अभी-अभी घर लौटे थे। दिव्या ने IIM से एमबीए किया था। एक प्रतिष्ठित कंपनी में बतौर मैनेजर लाखों कमा रही थी। रामबाबू को अपनी बेटी पर खासा गर्व था। नातेदारों से लेकर जान-पहचानवाले सभी लोगों से बात-बातपर वो दिव्या का ही जिक्र छेड़ते थे। अन्य के मुकाबले आर्थिक स्थिति काफी अच्छी होने के कारण रिश्तेदारी में भी उनकी विशेष इज्जत थी। आज छुट्टी थी और कोई खास काम भी नहीं था सो रामबाबू आराम से पलंगपर पसर गये। लेटे-लेटे ही उन्होंने अपनी पत्नी शर्मिला से चाय बनाने को कहा और फिर टीवी चालू कर समाचार देखने लगे।

समाचार देखते-देखते अचानक ही उन्हें अपनी बहन सरिता के बेटे राजीव का ध्यान आया जिसने प्रशासनिक सेवा की प्रारंभिक और मुख्य, दोनों ही परीक्षाएँ पास कर लीं थी और साक्षात्कार भी दे चुका था। अंतिम परिणाम आज-कल में ही आनेवाला था। रामबाबू ने झट से टीवी म्यूट किया और सरिता को फोन लगाया। थोड़ी देर औपचारिक बातें करने के बाद रामबाबू ने सरिता से राजीव के रिजल्ट के बारे में पूछा। सरिता ने थोड़ी निराश आवाज में उत्तर दिया - "नहीं भैया, नहीं हो पाया। राजू (राजीव) की मेहनत में तो कोई कमी नहीं थी। दिन-रात एक कर रखा था उसने। खाने-पीने का भी होश नहीं रहता था। लेकिन दो-तीन नंबरो के अंतर से बात बिगड़ गयी। अभी कल ही तो रिजल्ट आया है। बेचारा बहुत टेंशन में है। मोबाइल बंद कर कमरे में लेटा है। बात कराऊँ क्या?"

"नहीं-नहीं रहने दो। अभी परेशान होगा। मैं बाद में खुद फोन कर के उसे समझा दूँगा। लगा हुआ है तो कहीं न कहीं तो होना ही है। उससे बस इतना कहना कि घबराए नहीं, अच्छा" इसके बाद थोड़ी-बहुत और बातें करने के बाद रामबाबू ने फोन रख दिया। तबतक शर्मिला भी चाय लेकर आ गई। "क्या हुआ? राजीव का तो रिजल्ट आनेवाला था न" उसने आते ही पूछा। "वो नमकीन बिस्किट भी ले आना जो कल लाए थे" रामबाबू ने चाय का कप लेते हुए कहा। फिर बोले - "नहीं हुआ। रिजल्ट कल आया है। सरिता बता रही थी कि सेलेक्ट न हो पाने के कारण थोड़ा परेशान है" फिर धीरे से बुदबुदाए - "हो जाता तो हमारे ही कान काटने लगता" और चाय पीने लगे।

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

घनाक्षरी


भंग में उमंग मिले, नाच हर दिल खिले,
प्यार का प्रतीक पर्व, है होली मनाइये।

पिचकारियों में भरें, रंग देशभक्तिवाले,
रंग एक-दूसरे को, खुद रंग जाइये।

पागल पड़ोसी मिला, लड़ता ही रहता है,
उसको अकलवाली, गुझिया खिलाइये।

फिर भी जो समझे न, होली का तो दिवस है,
गदहे पे बिठा उसे, गाँव में घुमाइये॥

मंगलवार, 19 मार्च 2013

मत्तगयन्द सवैया - कौन यहाँ सबसे बलवाला
















बात चली जब जंगल में - "पशु कौन यहाँ सबसे बलवाला"।
सूँड़ उठा गजराज कहे - "सब मूरख, मैं दम से मतवाला"।
तो वनराज दहाड़ पड़े - "बकवास नहीं, बस मैं रखवाला"।
बंदर पेड़ चढ़ा हँसते - "मुझसे टकरा, कर दूँ मुँह काला"॥

लोमड़, गीदड़ और सियार सभी झपटे - "रुक जा, सुन थोड़ा"।
नाम "गधा" अपना यदि आज तुझे हमने जम के नहिं तोड़ा।
देख हुआ अपमान गधा पिनका, निकला झट से धर कोड़ा।
भाल, जिराफ, कुते उलझे, दुलती जड़ भाग गया हिनु घोड़ा॥

गैंडु प्रसाद चिढ़े, फुँफु साँप बढ़ा डसने विषदंत दिखाते।
मोल, हिपो उछले हिरणों पर, भैंस खड़ी खुर-सींग नचाते।
ऊँट, बिलाव कहाँ चुप थे, टकराकर बाघ गिरे बलखाते।
बैल, कँगारु भिड़े, चुटकी चुहिया बिल में छुप ली घबराते॥

पालक, गाजर ले तब ही छुटकू खरहा घर वापस आया।
पा लड़ते सबको, छुटकू अपने मन में बहुते घबराया।
बात सही बतला सबने उसको अपना सरपंच बनाया।
"एक रहो, इसमें बल है" कह के उसने झगड़ा सुलझाया॥

सोमवार, 18 मार्च 2013

कुछ कुण्डलियाँ


(१)
बेशर्मों का राज है, तनिक न जिनको लाज।
कर घोटाले शान से, बैठे पकड़े ताज॥
बैठे पकड़े ताज, बनाकर गणित सियासी,
नैतिकता को बेच, लगा तिकड़म पच्चासी।
होगा मगर हिसाब, सभी इनके कर्मों का,
हो जाएगा ध्वस्त, किला इन बेशर्मों का॥

(२)
भारत की हम बेटियाँ, सीमापर तैनात।
निर्भय हो मेरे वतन, खाएंगे रिपु मात॥
खाएंगे रिपु मात, प्राण से भी जाएंगे,
कुटिल इरादों संग, कभी यदि चढ़ आएंगे।
लड़ने की हरएक, कला में हमें महारत,
बाँहों में फौलाद, बसा है दिल में भारत॥

(३)
नाहर के गढ़ में मिला, जो बिल्लों को ताज।
पड़ोसिया ड्रैगन मुआ, सिर चढ़ बैठा आज॥
सिर चढ़ बैठा आज, लाँघ के सीमा सारी,
उगल रहा है रोज, आग के गोले भारी।
अब वो अपनेआप, नहीं भागेगा बाहर,
उसकी खातिर सिर्फ, बुलाना होगा नाहर॥

(४)
पाकिस्तानी दोगले, करें वार पर वार।
रहें बढ़ाते हौसला, भारत के गद्दार॥
भारत के गद्दार, उच्च पदपर बैठे हैं,
उनके चमचे साँप, देशभर में पैठे हैं।
कहाँ हुई अब लुप्त, चेतना हिन्दुस्तानी,
जो चढ़ बैठे आज, हमींपर पाकिस्तानी॥

(५)
सहते जाने की हुई, सारी सीमा पार।
तुमको वतन पुकारता, लड़ो आर या पार॥
लड़ो आर या पार, नहीं अब कोई चारा,
हुआ हँसी का पात्र, जगत में भाईचारा।
चलो उठा लो शस्त्र, रहो मत दुखड़े कहते,
करवाओ अहसास, शत्रु को हम जो सहते॥

(६)
ताली दे सकता नहीं, एक अकेला "हाथ"।
निश्चित होना चाहिए, "दूजे" का भी साथ॥
दूजे का भी साथ, मिले तो वारे-न्यारे,
तीखे-तीखे "तीर", "साइकिल" को जो मारे।
लाये "ममता" साथ, रहे घर में खुशहाली,
बचे सुरक्षित "राज", बजाए जम के ताली॥

(७)
माफी होती "खून" को, "बटमारी" को जेल।
दिखा रहा कानून भी, नौटंकी का खेल॥
नौटंकी का खेल, मीडिया भी करवाता,
ले जनता का नाम, झूठ के बाण चलाता।
बहुत हुआ आघात, सहा भारत ने काफी,
कर डालो संहार, नहीं दो इनको माफी॥

(८)
छापा जो कानून में, आज गये खुद भूल।
धौंस दिखाना हो गया, राजनीति का मूल॥
राजनीति का मूल, मात्र अब सत्ता पाना,
जोड़-तोड़ कर खूब, विरोधी को धमकाना।
ताकतवर का नाम, नहीं जिस-जिसने जापा,
इतना ले वो जान, पड़ेगा निश्चित छापा॥

(९)
घिसे दाँत के बाघ हों, बूढ़े-बूढ़े शेर।
तो गीदड़ काहे नहीं, करता फिरे अँधेर॥
करता फिरे अँधेर, लोमड़ी का घरवाला,
छापें सब अखबार, झूठ भर मिर्च-मसाला।
नित लड़ बैठें जीव, बीच में वन रोज पिसे,
देख-देख खरगोश, क्रोध में निज दाँत घिसे॥

(१०)
छोटी सी तो बात है, अगर हुआ अपराध।
चलो चलें हित लें जरा, अपने-अपने साध॥
अपने-अपने साध, स्वार्थ लें थोड़े-थोड़े,
खेलें ऐसे दाँव, लाभ के दौड़ें घोड़े।
उधर न फेंकें जाल, जिधर है मकरी मोटी,
दिखलाने को काम, फाँस लें मछली छोटी॥

कुण्डलिया - हरे उदासी चेतना


(1)
हरे उदासी चेतना, कर दे कुंठित सोच।
फल सारे विश्वास के, खा जाए यह नोंच॥
खा जाए यह नोंच, देह की उर्जा सारी,
मनुज छोड़ दे कर्म, लगे मन बोझिल भारी।
मौसम सुखमय छीन, बिठा ऋतुओं पर पहरे,
सूख रहे सब घाव, करे यह ताजे व हरे॥

(2)
भूले जीने की कला, बने वस्तु बेकार।
बदनसीब है वो जिसे, करे उदासी प्यार॥
करे उदासी प्यार, रहे नित बाहें डाले,
चुभने लगे बसंत, दिखें दिन काले-काले।
भाये नहीं शबाब, न ही सावन के झूले,
दुनिया की क्या बात, मनस वो खुद को भूले॥

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

कुण्डलियाँ


(१)
सुनके-गुनके हाल सब, हमको आया ज्ञान।
ट्रक उँगली से खींचना, होता है आसान॥
होता है आसान, चाँद पर महल बनाना,
सबसे मुश्किल काम, गधों को है समझाना।
नहीं घुसेगी बात, कभी भेजे में उनके,
झगड़ेंगे वो मूर्ख, अक्ल की बातें सुनके॥

(२)
कीमत है इस बात की, सुन लो देकर कान।
घोंचू, उल्लू, भैंस को, मत दो मति का दान॥
मत दो मति का दान, भेड़ के घर में जा के,
देंगे झाड़ू मार, भगाकर बाहर ला के।
इनको करो प्रणाम, इसी में भई गनीमत,
वर्ना जानो आप, चुकानी होगी कीमत॥

दो कुण्डलियाँ बच्चों के लिये



बोला भालू शेर से - "शेरू मेरे यार"।
काफी दिन हैं हो गये, चलो आज बाजार॥
चलो आज बाजार, घूम-फिर कर घर आयें,
पिक्चर-विक्चर देख, समोसे-लड्डू खायें।
सुना बिका कल खूब, बर्फ का मीठा गोला,
हम भी तो लें स्वाद, ठुमकता भालू बोला॥

सुनकर शेरू क्रोध में झपटा - "सुन रे ढीट"।
भालू के बच्चे तुझे, अब मैं दूँगा पीट॥
अब मैं दूँगा पीट, मुझे तू मूर्ख बनाता,
जब जाता बाजार, जेब मेरी कटवाता।
खाता तू तरमाल, चुकाता मैं चुन-चुनकर,
भागा सिर पर पैर रखे भालू यह सुनकर॥

सोमवार, 11 मार्च 2013

पाँच क्षणिकाएँ


(१) ज्वलंत प्रश्न

जब फलदार वृक्ष ही
बन जाएं नरभक्षी,
चूसने लगें रक्त,
तब क्या करे पथिक,
किधर ढूँढे छाँव, शीतलता,
कहाँ करे विश्राम,
कैसे जुटाये भोजन
जेठ की तपती राहों में।

(२) एक घटना

सुबह कुछ फूल देखे थे,
आकार में बड़े-बड़े,
चटख रंगोंवाले, भड़कदार,
मन किया कि घर ले आऊँ,
जाँच की तो पाया
सारे के सारे जहरीले थे।

(३) कैसी बारिश

सुना है कल बारिश हुई थी,
खूब गरज-गरजकर,
लेकिन
चौराहे पर का ठूँठ तो
वैसे का वैसा ही
सूखा, उदास खड़ा है।

(४) खूबसूरत

धुँधलके में बड़ा
खूबसूरत दिखता था वो,
लेकिन
उजाले में देखा तो जाना,
उसका चेहरा भी
दागदार था।

(५) शांति

शांति मेरे पास थी,
थोड़ी सी ही सही
मगर थी,
लेकिन मैं लालची
जरा सी और ढूँढने लगा,
इसी चक्कर में
वो भी कहीं गिर गयी।

बुधवार, 6 मार्च 2013

गुलगुल खरगोश और नशे के सौदागर


गुलगुल खरगोश, चुटपुटवन का जाना-माना व्यापारी था। वन की रौनक फुटफुटबाजार में उसकी मेवों की बड़ी सी दुकान थी। उसकी दुकान के मेवे अपनी गुणवत्ता और ताजगी के लिए पूरे चुटपुटवन में मशहूर थे। उसकी दुकान से काजू, किशमिश, अखरोट आदि जो एकबार खरीदकर खा लेता समझो वो बस उसी का होकर रह जाता। गुलगुल बेहद नेकदिल भी था। वो कभी किसी से झगड़ा नहीं करता। मेवे उचित दाम पर बेचता और कभी-कभी छोटे बच्चों को तो मुफ्त में भी दे दिया करता। उसके इन्हीं गुणों के कारण चुटपुटवन के सभी जानवर उसकी बहुत इज्जत करते थे। आसपास के वनों में भी फुटफुटबाजार कहो तो गुलगुल के कारण ही जाना जाता था। जानवर दूर-दूर से मेवे खरीदने गुलगुल के यहाँ आते थे।

एक दिन की बात है कि गुलगुल हमेशा की तरह अपनी दुकान में बैठा कामकाज देख रहा था। उस दिन बाजार में कुछ ज्यादा ही चहलपहल थी। होती भी क्यों न, कुछ ही दिनों के बाद चुटपुटवन के राजा शेर मक्खनसिंह के बेटे की शादी जो होनेवाली थी। सभी जानवर शादी में भेंट करने के लिए अपने-अपने हिसाब से उपहार खरीद रहे थे। कोई सजावट की चीजें खरीद रहा था तो कोई कपड़े। कोई फूलों के गुलदस्ते ले रहा था तो कोई खानेपीने की चीजें। गुलगुल की दुकान पर भी बड़ी भीड़ थी। वो जल्दी-जल्दी सभी ग्राहकों को निपटा रहा था। तभी दो लोमड़ वहाँ आये। उन्होंने पहले तो भीड़ छँटने का थोड़ा इंतजार किया फिर भीड़ न छँटती देख गुलगुल से बोले - "अरे सेठजी, जरा इधर सुनिये....."। गुलगुल बोला - " अरे भैया, देखते नहीं, कितनी भीड़ है। बोलो क्या चाहिए?" लेकिन लोमड़ न माने। उन्होंने फिर कहा - "ही.....ही......ही.....सेठजी, काम तो आप ही के मतलब का है। हम सिर्फ पाँच मिनट का समय लेंगे"। गुलगुल बाहर आया - "बोलो, क्या काम है?" लोमड़ बोले - "सेठजी, हमलोग अरब से खास मुनक्के और खजूर लाए हैं। बिल्कुल ताजा और बढ़िया माल है। वैसे तो पूरे माल की कीमत लाखों में है पर आपको सिर्फ पचास हजार में दे देंगे"। गुलगुल को बड़ी हैरानी हुई। उसने पूछा कि क्यों भई, मेरे लिए ऐसी मेहरबानी क्यों? मैं तो तुमलोगों को जानता भी नहीं"। लोमड़ों ने पहले तो कुटिलता से एक-दूसरे की ओर देखा और फिर बोले - "ही.....ही.....ही....अरे सेठ जी , आप तो इस वन के सबसे बड़े व्यापारी है। आपके साथ बिजनेस करना हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात होगी। इसमें आपका और हमारा दोनों का फायदा है। आप हमें एक मौका तो दिजिए, आप रातोंरात अरबपति बन जाएंगे"।

गुलगुल लालची जरा भी नहीं था। उसका माथा ठनका। उसने ताड़ लिया कि जो भी हो ये लोमड़ ईमानदार तो नहीं हो सकते। पहले तो उसके मन में आया कि डाँटकर इन लोमड़ों को अपनी दुकान से भगा दे लेकिन फिर उसने सोचा कि ऐसा करने से इनके इरादों का पता नही चल पाएगा और ये कहीं और जाकर अपना खेल शुरु कर देंगे। यही सोचकर वो चुप रहा। उसने लोमड़ों से कहा - "अरे भाई, जब ऐसा है तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। परंतु तुमलोग पहले अपना माल तो दिखाओ। बिना देखे-परखे मैं कुछ नहीं खरीदता"। लोमड़ झट से राजी हो गये। वो गुलगुल को अपने साथ बाजार के कोने में ले गये जहाँ उनकी जीप खड़ी थी। जीप के पिछले हिस्से में कई बोरियाँ पड़ी थीं। लोमड़ों ने उनमें से एक बोरी को बाहर निकाला और उसे खोलते हुए बोले - ये लिजिये सेठजी, आप खुद ही देखकर तसल्ली कर लिजिये"। गुलगुल ने देखा की बोरी में खजूर भरा था। उसने कुछ खजूरों को उठाया और देखा। खजूर बिल्कुल ही साधारण थे। उनमें खासियतवाली कोई बात न थी। गुलगुल ने गुस्से से लोमड़ों की ओर देखा और कहा - "तुमलोगों ने मुझे बेवकूफ समझ रखा है? मैं नहीं खरीदता ऐसा माल। तुमने तो कहा था कि ये अरब के खास खजूर है। क्या खासियत है इनमें?" लोमड़ों ने आसपास देखा और फिर धीरे से बोले - "सेठजी, खासियत इन खजूर-मुनक्कों में नहीं बल्कि इस पाउडर में है"। कहते हुए उन्होंने बोरी के अंदर छुपा एक सफेद पाउडर का पैकेट निकाला। फिर बोले - "वो अरबवाली बात तो हमने इसलिए कही थी क्योंकि उस समय आसपास बहुत से जानवर थे"। गुलगुल ने पाउडर का पैकेट अपने हाथों में लिया और उलट-पुलट कर देखा। उसे कुछ समझ नहीं आया। उसने पूछा - "क्या है ये?"

लोमड़ों ने फिर आसपास देखा और बोले - "सेठजी, ये बड़ा खास पाउडर है। शहरों में मनुष्य इसका उपयोग नशे के लिए करते हैं। इस पाउडर का गुण ये है कि इसमें तेज नशा होता है और महल-परियाँ-बगीचे न जाने क्या-क्या दिखने लगता है। लेकिन जो भी इसका सेवन करता है वो इसका आदि हो जाता है। फिर उसे इसके बिना बहुत सारी परेशानियाँ शुरु हो जाती हैं। और तब वो इसे लेनेपर मजबूर हो जाता है। इतना मजबूर कि इसके लिए वो अपना घरबार तक बेच सकता है। इसके सेवन से शरीर अंदर से खोखला होकर कमजोर होने लगता है। यहाँतक कि इसके प्रभाव से मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए इसकी खुलेआम बिक्री पर रोक है। खैर इनसब बातों से हमें क्या लेना। हमारा उद्देश्य तो बस पैसे कमाना होना चाहिए। आपको बस इतना करना है कि यह पाउडर अपनी दुकान में बिकनेवाले मेवों पर छिड़ककर बेच देना है। जब जानवर उन मेवों को खाएंगे तो मेवों के साथ-साथ ये पाउडर भी उनके अंदर चला जाएगा। एकबार खाने के बाद वो खुद ही दुबारा मजबूर होकर वैसे ही मेवे ढूँढेंगे। वो फिर आपकी दुकान पर ही आएंगे, क्योंकि वैसे पाउडरवाले मेवे उन्हें और कहीं नहीं मिलनेवाले। आप फिर वही पाउडरवाले मेवे उन्हें बेचेंगे। आपका बिजनेस दुगना हो जाएगा और किसी को शक भी नहीं होगा। और तो और आप मनमानी कीमत भी ले सकते हैं। नशे में जकड़े जानवर आपको मुँहमाँगी कीमत देंगे। आप अरबों में खेलेगे अरबों में और आपको ये पाउडर बेच-बेचकर हम भी अमीर हो जाएंगे। कहिए, है न दोनो का फायदा"।

ये सब सुनने के बाद गुलगुल खरगोश का मन गुस्से से काँप उठा। उसके मन में आया कि ऐसे पापियों को यहीं मार डाले। लेकिन वो अकेला था और लोमड़ दो। इसके अलावा ऐसा करना कानून को अपने हाथ में लेना होता। और वैसे भी नशे के उन सौदागरों के पूरे गिरोह का पर्दाफाश ज्यादा जरूरी था। यहीसब सोचकर उसने कहा - "अरे मेरे प्यारे लोमड़ भाईयों, सचमुच ये तो हमदोनों के लिए बड़े फायदे का सौदा होगा। मैं तो तैयार हूँ। लेकिन अभी दुकान पर बड़ी भीड़ है। अगर अभी कुछ करुँगा तो किसी को शक हो जाएगा। तुमलोग ऐसा करो आज रात को मेरी दुकान पर आ जाओ। मै ये पाउडर खरीद भी लूँगा और तुमलोगों की सहायता से अपनी दुकान में रखे सारे मेवों पर छिड़क भी दूँगा। इसके बाद कल से तो हमारी चाँदी ही चाँदी है। कहो क्या ख्याल है?"
लोमड़ झट से तैयार हो गये और रात नौ बजे आने की बात कहकर चले गये। उनके जाते ही गुलगुल खरगोश सीधा राजमहल गया और महाराज मक्खनसिंह को सारी बात बताई। महाराज ने कोतवाल बग्गा बाघ को सिपाहियों को साथ लेकर गुलगुल खरगोश के साथ जाने और उन नशे के सौदागरों को गिरफ्तार कर घसीटते हुए दरबार में पेश करने की आज्ञा दी। बग्गा ने महाराज की आज्ञानुसार गुलगुल की दुकान को अपने सिपाहियों के साथ घेर लिया और छुपकर बैठ गया। तय समय पर दोनों लोमड़ एक बैग में नशीले पाउडर के ढेर सारे पैकेट लिए गुलगुल की दुकान पर पहुँचे। गुलगुल ने दोनों को अंदर बुलाया और माल निकालने के लिए कहा। लोमड़ों ने जैसे ही बैग से पैकेट निकाले गुलगुल ने ताली बजा दी। ताली बजते ही कोतवाल बग्गा अपने सिपाहियों के साथ दुकान के अंदर चला आया और दोनों लोमड़ों को नशीले पाउडर के पैकेटस के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। दोनो को महाराज के सामने पेश किया गया। महाराज के द्वारा सख्ती से पूछताछ करनेपर दोनों ने अपने बाकी साथियों का भी पता बता दिया। कोतवाल बग्गा ने रातोंरात छापा मारकर उनसब को भी गिरफ्तार कर लिया। नशे के सौदागरों का पूरा गिरोह अब सलाखों के पीछे था। सुबह होते-होते गुलगुल खरगोश की बुद्धिमानी और देशभक्ति की खबर पूरे चुटपुटवन में फैल गयी। सभी गुलगुल की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। महाराज मक्खनसिंह ने गुलगुल को भरे दरबार में खूब सारे हीरे-जवाहरात देकर सम्मानित किया और चुटपुटवन का नया वाणिज्यमंत्री बना दिया। सभी ने खूब तालियाँ बजाकर फैसले का स्वागत किया।

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

सेनापति वीरु हाथी और डाकू नाटा गीदड़ (बाल कहानी)


 मीठे पानी के विशालकाय झरने के किनारे बसा तथा बड़े-बड़े फलदार वृक्षों और अत्यंत सुंदर, रंग-बिरंगे, सुगंधित फूलों के प्यारे-प्यारे पौधों से भरपूर एक हरा-भरा वन था "विराटवन"। उस वन में कई प्रकार के पशु-पक्षी जैसे - बाघ, चीता, भालू, बंदर, हिरण, तोता, गौरैया, कबूतर इत्यादि बड़े प्रेम से मिलजुल कर रहते थे। वहाँ का राजा दहाड़सिंह एक बब्बर शेर था जो कि बहुत ही योग्य शासक था और प्रजा को अपनी संतान समझता था। उसका सेनापति वीरु नामक युवा हाथी था जो अपनी वीरता और रणकौशल के लिए आसपास के वनों में विख्यात था। वीरु मानो राजा दहाड़सिंह का दायाँ हाथ था। विराटवन पर जब भी कोई खतरा आता, वीरु अपनी बहादुरी से उस खतरे को जड़ से खत्म कर देता। धीरे-धीरे विराटवन अजेय हो गया। कोई भी शत्रु उस पर आक्रमण करने से डरने लगा। वन के सभी वासी निडर होकर अपने-अपने घरों में रहते थे।

अचानक एक रात, जब विराटवन में सभी पशु-पक्षी सो रहे थे, डाकुओं के एक दल ने हमला किया और कई घरों में जबरदस्त तरीके से लूटपाट मचाई और रातोंरात भाग निकले। विराटवन में हड़कंप मच गया। डाकुओं के उस दल का सरदार नाटा गीदड़ था और उसने कई लोमड़, गीदड़ और भेड़ियों को मिला कर अपना गिरोह बनाया हुआ था महाराज दहाड़सिंह ने तुरंत कार्यवाई करते हुए कोतवाल बहादुर कुत्ते को जल्द से जल्द डकैतों की खोजकर उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया। बहादुर कुत्ते ने पूरे वन में अच्छी तरह से खोजबीन की। अपने गुप्तचरों को दौड़ाया, छापे मारे किन्तु नतीजा कुछ नहीं निकला। डकैती की घटनाएं रुकने के बजाए बढ़ती चली गईं। डाकू कहाँ से आते और कहाँ चले जाते थे किसी को कुछ पता नहीं चलता। हारकर राजा दहाड़सिंह ने इस समस्या पर सेनापति वीरु से चर्चा की और उसे ही इसका हल निकालने की जिम्मेदारी सौंप दी।


वीरु ने अगले ही दिन अपने सेनानायकों को बुलाया और इस समस्या के समाधान के लिए योजना बनानी शुरु कर दी। योजना तैयार हुई और उसे नाम दिया गया "मिशन क्लीन"। मिशन के लिए वीरु की अध्यक्षता में एक गुप्त टीम का गठन हुआ और उस टीम ने उसी समय से अपना काम शुरु कर दिया। मिशन की सारी बातें भी गुप्त रखी गईं। अगले कुछ दिनों में विराटवन में डाकुओं के कारण लगाई गई विशेष सुरक्षा धीरे-धीरे कर के हटा दी गई। वन के सभी वासी राजा के इस कदम से आश्चर्यचकित थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि राजा ने डाकुओं के न पकड़े जाने के बावजूद सुरक्षा क्यों हटा दी। दरअसल ऐसा सेनापति वीरु की योजना के तहत हो रहा था। इस तरह कुछ दिन शांतिपूर्वक दिन बीत गये।

एक रात, जब सब अपने-अपने घरों में सो रहे थे तभी वन के सबसे धनवान व्यापारी सेठ गैंडादास के घर से चिल्लाने की आवाज आई। उनके घर डाकुओं का हमला हो गया था। डाकुओं ने पहले घर के बाहर खर्राटे मार रहे सेठ जी के प्राइवेट सिक्योरटी गार्ड ढेंचू गधे को कुर्सी से बाँधा और फिर बड़े आराम से घर में घुस गये। सेठजी और उनके परिवार को कब्जे में लेकर डाकुओं ने पहले तो जीभर के लूटपाट मचाई और फिर हमेशा की तरह आराम से भाग निकले। कोतवाल बहादुर कुत्ते ने अपने सिपाहियों के साथ उनका पीछा करने की भरपूर कोशिश की किन्तु डाकू अपने चिरपरिचित अंदाज में उनकी आँखों से ओझल हो गये। काफी दूर निकलने के बाद सरदार नाटा गीदड़ ने अपने साथियों को रुकने का इशारा किया और चारों तरफ देखने लगा। चारों ओर देखने के बाद जब वो निश्चिंत हो गया कि आसपास कोई नहीं है तो वो सबको लेकर वन के एक कोने में स्थित सुनसान सूखे कुएँ की ओर बढ़ गया।

लेकिन नाटा गीदड़ इस बात से अनजान था कि सेनापति वीरु अपनी गुप्त टीम के कई हथियारबंद सदस्यों के साथ छुपा लगातार उसपर अपनी आँखें गड़ाए हुए है। कुँए के पास पहुँचकर नाटा ने अपने साथियों को इशारे में कुछ कहा और सारे डाकू एक-एक करके उस कुँए में कूदने लगे। सबके कूदने के बाद नाटा ने भी आसपास देखकर कुएँ में छलाँग लगा दी। इतना देखते ही वीरु भी बिना समय गँवाए अपने साथियों के साथ उसी कुएँ में सावधानीपूर्वक उतरा। अंदर उतरते ही वो हैरान रह गया। कुएँ में एक पक्का रास्ता बना हुआ था जो बिल्कुल सीधा आगे जाता था और डाकू उसी रास्ते से आगे बढ़ते जा रहे थे। रौशनी के लिए रास्ते में जगह-जगह बिजली के बल्ब जल रहे थे। वीरु ने उनका पीछा करना शुरु किया और अपने पास उपलब्ध दिशासूचक यंत्रों और नक्शों की मदद से तुरंत ही पता लगा लिया कि वो रास्ता विराटवन के दुश्मन पड़ोसी देश "चिरकुटवन" की ओर जा रहा था।

चिरकुटवन दरअसल विराटवन से भगाए गये गीदड़ों के द्वारा ही बसाया गया था। वो गीदड़, विराटवन में रहते हुए, विराटवन के विरुद्ध ही षड़यंत्र करते रहते थे। उन्होंने कभी भी विराटवन को अपनी मातृभूमि नहीं समझा। इसलिए विराटवन के वर्तमान राजा दहाड़सिंह के दादा महाराज पंजासिंह ने उन्हें सामूहिक रूप से देशनिकाले की सजा दे दी थी। तब से वो गीदड़, विराटवन को अपना शत्रु मानने लगे थे और बदला लेने की फिराक में रहते थे। वहाँ का वर्तमान राजा छक्का गीदड़ भी इसी परंपरा को बढ़ा रहा था। उसने विराटवन के विरोधी बहुत से लोमड़ों और भेड़ियों को भी अपने वन में शरण दे रखी थी।

सेनापति वीरु को समझते देर न लगी कि चिरकुटवन की हिम्मत जब सीधे तरीके से आक्रमण करने की न हुई तो उसने इस कायरतापूर्ण तरीके से विराटवन में अशांति फैलाने के लिए डाकुओं को भेजना शुरु कर दिया है। उसने तुरंत ही अपने साथियों के साथ डाकुओं पर हमला बोल दिया। वीरु की वीरता के आगे डाकू ज्यादा देर टिक नहीं सके। कुछ ढेर हो गये और कुछ पकड़े गये। पकड़े गये डाकुओं में सरदार नाटा गीदड़ भी शामिल था। उनके पास से चिरकुटवन के "नागरिक पहचान पत्र" भी बरामद हुए। वीरु ने सबको घसीटते हुए महाराज दहाड़सिंह के सामने पेश किया। नाटा ने महाराज के सामने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया। सारी बात जानते ही महाराज क्रोध में भर उठे। उन्होंनें भरे दरबार में डाकू नाटा और उसके बचे हुए साथियों के सिर काट डाले और उसी समय चिरकुटवन पर चढ़ाई कर दी। विराटवन की विराट सेना के आगे चिरकुटवन के पाँव उखड़ गये और राजा छक्का अपनी सेना सहित मारा गया। बचे जानवर पीठ दिखाकर भाग गये। महाराज दहाड़सिंह ने चिरकुटवन को भी विराटवन में मिला लिया। विराटवन एकबार फिर से खुशहाल हो गया और सभी पशु-पक्षी हँसी-खुशी से रहने लगे।

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

कुछ छंद


मत्तगयन्द सवैया

भारत देश जहाँ बन दानव भूख-कुपोषण आन खड़ा है।
देख चलो सब हाल वहाँ कितना टन रोज अनाज सड़ा है।
लानत है सरकार नहीं करती कुछ, न्याय कहीं जकड़ा है।
बीच पिसा जन प्राण तजे, चलता रहता नित ये रगड़ा है॥

घनाक्षरी

पड़ी क्या नजर नहीं, देवों का भी डर नहीं,
कैसी सरकार है ये, अन्न जो सड़ा रही।

भुखमरी नाच करे, साहूकारी राज करे,
सारी टोली चोरों की ये, खिचड़ी पका रही।

अन्न को जो भी रुलाए, अन्न को तरस जाये,
दुनिया की रीत यही, सदा चली आ रही।

अन्न ऐसे न लुटाओ, गरीबों में बँटवाओ,
सभ्यता हमारी हमें, यही तो सिखा रही॥

दोहे

1. जानें जो नहिं भूख को, भोग रहे हों राज।
उनको क्या परवाह जब, सड़-गल जाय अनाज॥

2. भारत की तस्वीर ये, चुभती शूल समान।
धरती के आशीष का, हाय! हुआ अपमान॥

3. धरती की पूजा करे, निशिदिन एक किसान।
रोता वो भी देख के, सड़ता गेंहूँ, धान॥

4. भारी सेना भूख की, रोज रही ललकार।
कैसा अपना देश है, सड़े पड़े हथियार॥

5. हँसों को भाने लगा, बगुलोंवाला वेश।
सड़ा नहीं है अन्न ये, सड़ता अपना देश॥

6. ऐसी दुर्गति अन्न की, इतना भारी पाप।
आनेवाली पीढियों, तक जायेगा श्राप॥

7. भंडारण का दोष या, वितरण में हो खोट।
सड़ जाने से अन्न के, लगी देश को चोट॥

8. पंचायत में शोर है, मंडी में सब चोर।
रोता सड़ता अन्न ये, देखे तो किस ओर॥

9. जनता के माथे पड़ी, मँहगाई की मार।
सड़ते छोड़ें अन्न को, नेताजी हरबार॥