रविवार, 23 दिसंबर 2012

तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल


हिम्मत से घर में घुस कर के, रिपुओं ने घोंपे शर-शूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

जितना चाहा लूट गये वो, धन-दौलत संगे सम्मान।
पुरखों को भी न छोड़ा जो, पाते थे जग से गुणगान॥
दुस्साहस तो देखो तिसपे, नर्तन में सब थे मशगूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

बल के मद में चूर सभी थे, चाहे था उनका अभिमान।
वीरों की पहचान वही है, लड़ जाते जो ले के आन॥
देखो तो अपने दर्पण को, जमा गये हैं मोटी धूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

जंग लगा दी भालों में भी, याद नहीं बरछी-करवाल।
रणवीरों के पूत बताना, हुआ भला क्यों ऐसा हाल॥
जो कल तक थे डरते अब वो, कहते भय सारा निर्मूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

9 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. स्वागत है आदरणीय सुनील सर.....हार्दिक आभार....

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (24-12-2012) के चर्चा मंच-११०३ (अगले बलात्कार की प्रतीक्षा) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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    1. स्वागत है आदरणीय रूपचन्द शास्त्री सर। हार्दिक आभार.........

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  3. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने..
    बेहतरीन...

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  4. वाह! एक अच्छी प्रेरक कविता पढ़ने को मिली.
    आभार.

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  5. आपका हार्दिक आभार रीना मौर्य जी......

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