गुरुवार, 8 नवंबर 2012

चार कह मुकरियाँ


(१) फूटे बम चल जाए गोली,
नहीं निकलती मुँह से बोली |
बाहर आता खाने राशन,
क्या भई चूहा? नहिं रे "शासन" ||

(२) ताने घूँघट औ शरमाए,
तड़पा के मुखड़ा दिखलाए |
रोज दिखाए जलवा ताजा,
क्या मेरी भाभी? नहिं तेरा "राजा" ||

(३) चलते पूरी सरगर्मी से,
सुनते ताने बेशर्मी से |
बातों से पूरे बैरिस्टर,
क्या कोई लुक्खा? नहिं रे "मिनिस्टर" ||

(४) भले नाम खुद न लिख पाते,
पढ़े-लिखोंपर हुक्म चलाते।
भाव आज कोई न देता,
जमींदार क्या? नहिं रे "नेता"||

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