गुरुवार, 8 नवंबर 2012

ईमान (कहानी)


"गलती हमारा या हमारे आदमियों का नहीं है रमाकांत बाबू"| बाहुबली ठेकेदार तिवारी जी, डीएसपी रमाकांत प्रसाद को लगभग डाँटते हुए बोले| "हम उसको पहिलहीं चेता दिए थे कि ई रेलवे का ठेका जाएगा तो ठेकेदार दीनदयाल राय के पास जाएगा नहीं तो नहीं जाएगा, लेकिन उ साला अपनेआप को बहुत बड़का बाहुबली समझ रहा था| अब खैर छोडिये, जो हो गया सो हो गया| जो ले दे के मामला सलटता है, सलटाइए|"

"आप समझ नहीं रहे हैं सर| बात खाली हमारे तक नहीं है कि आपका कहा तुरंत भर में कर दें| हमारे ऊपर भी कोई है, उप्पर से ई मीडिया आउर पब्लिक का टेंशन है सो अलग|" रमाकांत जी ने थोड़ी विवशता दिखाते हुए कहा|

"देखिये, उ सब हमको मत सुनाइये|" तिवारी जी फिर भड़के| "लाश रेलवे ट्रैक पर मिला है, आ उ भी क्षत-विक्षत हालत में| मृतक बहुत शराब पिये हुए था पोस्टमार्टम में साबित भी हो चुका है| अरे दुर्घटना का केस बना के बात खतम कीजिये| सब बात हमहीं को समझाना पड़ेगा, न?

"ठीक है सर, जैसा आप कहिये|" रमाकांत जी बोले| "लेकिन थोडा...."

"हाँ, हाँ ठीक है" तिवारी जी ने उनकी बात को काटते हुए कहा| "गिफ्ट आपके और आपके बड़े साहब, दोनों के घर पहुँच जाएगा| निश्चिन्त रहिये उसके लिये|"

"अरे नहीं नहीं सर, वो बात नहीं है, हमको अपना नहीं....मतलब थोडा और सबको मैनेज करना पड़ता है न! " रमाकांत जी ने उठते हुए कहा| "जो कह रहे हैं हो जाएगा, अब चलते हैं|" कह के वो बाहर निकले और जीप स्टार्ट कर के कोतवाली की तरफ चल दिये|

कोतवाली पहुँचे तो देखा एक युवक को गिरफ्तार कर के लाया गया था| "कौन है ये?" उन्होंने वहाँ तैनात एक दरोगा से पूछा| दरोगा जी कुछ कहते इससे पहले एक महाशय बोले - "अरे हम बताते हैं सर| चोर है चोर| हमारी ही दुकान में काम करता है और हमारी ही दुकान में चोरी कर रहा था|"

रमाकांत जी को गुस्सा आ गया| कड़कते हुए बोले - "क्यों रे, कब से चल रहा है ये सब?"

युवक रोते हुए बोला - "हम चोर नहीं हैं सर| परीक्षा का फार्म भरना था| कल तक लास्ट डेट है| डेढ़ सौ रुपया चाहिए था| कहीं से उपाय नहीं हुआ एही से खाली डेढ़ सौ रुपया निकाले थे|"

रमाकांत जी का पारा अब सातवें आसमान पर था| "साला, एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी| अपने काम के लिये अपना ईमान बेच देगा तू?" कहते हुए एक जोरदार थप्पड़ उन्होंने युवक को लगाया और सिपाही को बोले - "बंद करो साले को|"

दुकान का मालिक गदगद होके बोला - "साहब, आप जैसे ईमानदार पुलिसवालों के कारण ही आज हमारे देश में क़ानून जिन्दा है|"

रमाकांत जी बोले - "पता नहीं भाई, मुझे ऐसे-ऐसे बेईमान लोगों को देख के क्या हो जाता है? आपा खो बैठता हूँ| खैर तुम जाओ| ये साला तो गया दो साल के लिये|" कहते हुए उन्होंने अपनी सिगरेट जलाई और अन्दर की ओर बढ़ गये|

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