शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

दोहे : गुरुकृपा


१. गुरुकृपा से जग चलता, मिलता है वरदान |
करुँ नमन गुरु चरनन को, शत-शत कोटि प्रणाम ||

२. बड़भागी को गुरु मिलें, सच्चे, देव समान |
रखें नेह की छाँव में, मुख से बरसे ज्ञान ||

३. छवि सजाऊँ नयनन में, पियूँ चरण पखार |
झूम-झूम करुँ आरती, भूल जगत संसार ||

४. भक्ति की है निर्झरनी, श्रद्धा का है ज्वार |
मन डूब जाये रस में, ऐसी बहे बयार ||

५. गुरुकृपा ही दूर करे, कलियुग का संताप |
पुण्यकर्म अंतर बसें, मन नहिं आये पाप ||

६. खुलें चक्षु दो ज्ञान के, टूटे मायाजाल |
सत्य सनातन ज्ञात हो, मिटें दोष विकराल ||

७. काम, क्रोध, मद, लोभ रिपु, मत्सर घातक मोह |
शनैः-शनैः सब दूर हों, हो तो सत का मोह ||

८. दुर्जन भी सज्जन बने, एक दिन साधू होय |
काँटे तोड़े द्वेष के, बीज दया के बोय ||

९. ऊँच-नीच का भेद नहिं, कभी पसारे पाँव |
प्रेम करे तो जीव से, दे के ठंढी छाँव ||

१०. ईशभक्ति में लीन हो, सुबह-शाम, दिन-रात |
कडवी वाणी छोड़ के, बोले मीठी बात ||

११. केवल गुरु से आसरा, नाव लगे उसपार |
बस यही एक प्रार्थना, करे मन बार-बार ||

१२. गुरु सुनाये सत्य वचन, क्या है अपना धर्म |
कैसे मुक्ति है मिलती, कैसा होए कर्म ||

१३. मार-मार के खा रहा, मनुज, मनुज को आज |
कृपा करो है प्रार्थना, पूज्य गुरु महाराज ||

१४. बंद नरक के द्वार हों, मिले स्वर्ग में सेज |
गुरुकृपा बरसे जिसपर, मुखपर चमके तेज ||

१५. मन में आये वासना, कलुषित अंतर रोय |
जा धर ले गुरुचरण, मंगल-मंगल होय ||

१६. सोना-चाँदी देख के, मन में लालच आय |
बसें गुरु जो अंतर में, सब निर्मल हो जाय ||

१७. छूट चले मांस-मदिरा, जुआ कभी न भाय |
धूम्रपान सब छोड़ के, गोरस मन ललचाय ||

१८. सुबह-शाम नित नेम से, कर ले गुरु का ध्यान |
निर्मल कोमल चित बने, सबका हो कल्याण ||

१९. विनय सुनो करुँ वंदना, हाथ जोड़ हे देव |
भवसागर से तार दो, जय जय जय गुरुदेव ||

२०. सही-गलत नहिं जानता, बालक एक अबोध |
मार्ग दिखाओ आप ही, करता हूँ अनुरोध ||

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