गुरुवार, 8 नवंबर 2012

हरिगीतिका

बलवंत, भय-संकटहरण प्रभु, पवनसुत हनुमान हैं।
श्रीराम को उर में धरे तप, वीरता के प्राण हैं॥
शिवरूप, दाता ज्ञान के कपि, आप ही गुणवान हैं।
सेवा करें हम आपकी हम, आपकी संतान हैं॥



2 टिप्‍पणियां:







  1. वाह वाह !
    बहुत सुंदर हरिगीतिका लिखी है कुमार गौरव अजीतेंदु जी !
    बहुत बहुत बधाई !


    साथ ही नव संवत्सर की बहुत बहुत बधाई !
    हार्दिक शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं...

    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  2. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय राजेंद्र सर.......

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