बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

कुछ कुण्डलिया छंद .........

 (१) नारी घर का मान है, नारी पूज्य महान |
नारी का अपमान तू, मत करना इंसान ||
मत करना इंसान, नहीं ये शाप कटेगा,
खुश होगा शैतान, सदा ही नाम रटेगा |
धर माता का रूप, लुटाती ममता भारी,
बढ़े पाप तो खड्ग, उठा लेती है नारी ||
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(२) नारी जो बेटी बने, देवे कितना स्नेह |
बने बहिन तो बाँट ले, कष्टों की भी देह ||
कष्टों की भी देह, बाँध हाथों पे राखी,
नहीं कहा कुछ गलत, देश-दुनिया है साखी |
करे कोख पर वार, गई मत उसकी मारी,
फूट गये जो भाग, कहाँ घर आए नारी ||

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(3) धोती मुनिया फर्श को, मुन्ना माँजे प्लेट |
कल का भारत देख लो, ऐसे भरता पेट ||
ऐसे भरता पेट, और ये नेता सारे,
चलते सीना तान, लगा के जमकर नारे |
नहीं तनिक है शर्म, कहाँ है जनता सोती,
इनको अपनी फिक्र, साफ हो कुर्ता-धोती ||

श्री गणेश आराधना


















प्रथम पूज्य भगवान मेरी
स्वीकार करो आराधना,
बहुत हुए पाप मुझसे
अब हो कोई अपराध ना|

तुम ही जग को पालनेवाले
पार्वती शंकर के दुलारे,
जो आया शरण में तुम्हारी
तुमने उसके काज सँवारे|
दर्शन भाग्यवान को होते
जो तुझे भजते, कभी न रोते,
बड़े अभागे जीव हैं वो
भूल तुझे जो रहते सोते|

जीवन के किसी मोड़ पर
छोड़ना मेरा साथ ना,
बहुत हुए पाप मुझसे
अब हो कोई अपराध ना|

सुखद सुहाना रूप तुम्हारा
मेरे नयनों को भाता है,
वर्णन विराट रूप का तेरे
कौन यहाँ कर पाता है|
कई रूप, कई नाम हैं तेरे
मूषक तेरी सवारी,
गणपति, गजानन है तू
तेरी कृपादृष्टि न्यारी|

अपने चरणों में रखना मुझे
स्वीकार करो ये प्रार्थना,
बहुत हुए पाप मुझसे
अब हो कोई अपराध ना|

हाइकु : हमारे गाँव


१. निष्कपटता
भाईचारे की छाँव
हमारे गाँव

२. प्यार के रिश्ते
सुख दुःख के साथी
गाँव के वासी

३. आम के बाग
पंछी चहचहाते
मन को भाते

४. खेतों की मिट्टी
किसानों का पसीना
देश के लिए

५. बड़ी शर्मीली
शोख रंग रंगीली
गाँव की गोरी

६. फाग की मस्ती
बैसाखी का धमाल
चैता का गान

७. कुएँ का पानी
लिट्टी चोखा का स्वाद
क्या एहसास

८. मक्के की रोटी
हो सरसों का साग
फिर क्या बात

९. बदली हवा
खो रही मानवता
बचे हैं गाँव

१०. थोडा सा गुस्सा
मीठी सी नोकझोंक
बैर नहीं है

११. सत्य वचन
भारत गांवों में है
सच्चा भारत

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

हाइकु बक्सा : विविध


(१) झुकी नजरें
खामोशी इजहार
पहला प्यार

(२) सब अपना
हरेक का सपना
कलियुग है

(३) भारी टोकरा
रोकड़ा ही रोकड़ा
उपरी आय

(४) संतों का बैरी
लुटेरों का चहेता
हमारा नेता

(५) अँगूठा छाप
पढ़े-लिखों का बाप
जनतंत्र है

(६) संकीर्ण सोच
इंसानी खुराफात
ये जात-पात

(७) तिल का ताड़
मजहब की आड़
आतंकवाद

(८) बेमेल दल
लाचार सरकार
गठबंधन

(९) सब ने ठगा
हाशिये पर रखा
हिन्दू जनता

(१०) हमारा वोट
हमारी सरकार
तो क्यों बवाल

(११) फटे में बीवी
भूखे मरते बच्चे
हाय गरीबी

भूख : दोहे


(१) रंक जले राजा जले, कौन सका है भाग |
सबके अंदर खौलती, एक क्षुधा की आग ||

(२) ज्वाल क्षुधा में वो भरी, कहीं न ऐसा ताप |
जल के जिसमें आदमी, कर जाता है पाप ||

(३) भूख बड़ी बलवान है, लेने दे नहिं चैन |
दौड़ें सब इसके लिए, दिन हो चाहे रैन ||

(४) जो नहिं होती भूख तो, सच कहता हूँ मीत |
निर्भय नर जीता यहाँ, नहिं होता भयभीत ||

(५) भूखा मन कमजोर है, बेबस औ लाचार |
भूल चले कर्तव्य को, याद नहीं अधिकार ||

(६) भूख दिखाए वो घड़ी, देती वो संताप |
माता बेचे पूत को, गरदन काटे भ्रात ||

(७) भूख लगाए वो अनल, फूँके सब की लाज |
चौराहों पर बेटियाँ, बेच रहीं तन आज ||

(८) भूख दबाए साँच को, बुलवाती है झूठ |
इसका मारा आदमी, खुद से जाता रूठ ||

(९) छीन मिटाए भूख जो, कहलाता है चोर |
नैना ताके सामने, मन देखे चहुँओर ||

(१०) भूख कहे याचक बने, लेवे खुद को मार |
राह निहारे आस में, कौन करे उपकार ||

(११) भूख कराए चाकरी, खाए कोड़े चाम |
सिर पर मैला बोझ के, दिलवाए कम दाम ||