रविवार, 23 दिसंबर 2012

तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल


हिम्मत से घर में घुस कर के, रिपुओं ने घोंपे शर-शूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

जितना चाहा लूट गये वो, धन-दौलत संगे सम्मान।
पुरखों को भी न छोड़ा जो, पाते थे जग से गुणगान॥
दुस्साहस तो देखो तिसपे, नर्तन में सब थे मशगूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

बल के मद में चूर सभी थे, चाहे था उनका अभिमान।
वीरों की पहचान वही है, लड़ जाते जो ले के आन॥
देखो तो अपने दर्पण को, जमा गये हैं मोटी धूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

जंग लगा दी भालों में भी, याद नहीं बरछी-करवाल।
रणवीरों के पूत बताना, हुआ भला क्यों ऐसा हाल॥
जो कल तक थे डरते अब वो, कहते भय सारा निर्मूल।
तरुणाई का जोर दिखाना, तनय गये कैसे तुम भूल॥

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ


जन्म लिया है मानव का तो, मानवता भी दिखलाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥

भोलेपन से विचरण करते, जीवों को खा जाते हो।
बिन माँगे ही चंडालों की, पदवी भी पा जाते हो॥
थोड़ा सा तो सोचो पहले, बिन सोचे न तन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥

क्या कोई अनुताप नहीं है, दर्दभरी चित्कारों का।
या जीवन अधिकार नहीं है, उन बेबस लाचारों का॥
होते हो तुम कौन बड़े जो, रक्त से उनके सन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥

अंतर के नैनों से देखो, प्यार बड़ा ही आयेगा।
निश्छल उन प्राणों का मुखड़ा, अंदर तक छू जायेगा॥
पाप छाँटनेवाली छलनी से दिन रहते छन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥

फिरते बुद्धिमान बने भई, ये कैसी नादानी है।
फर्क नहीं आता है करना, कौन खून या पानी है॥
जाना है दुनिया से लेकर सत्कर्मों के धन जाओ।
जीवमाँस का भक्षण छोड़ो, शाकाहारी बन जाओ॥

सात हाइकु


१.

राजा की मौज
रंकों के लिये श्राप
जाड़े के दिन

२.

रैनबसेरा
ठिठुरते गरीब
पूस की रात

३.

बीड़ी का कश
अलाव का सहारा
दीनों का जाड़ा

४.

मजदूर है
हाड़ कँपकँपाता
मजबूर है

५.

ओस की बूँदें
बेघरों को बींधती
तीर समान

६.

नेता जी आये
कंबल बँटवाये
हुआ घोटाला

७.

फटे चिथड़े
टूटे-फूटे झोंपड़े
पाले की मार

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

घनाक्षरी

















भारती का शेर चला, फिर से दहाड़ने को,
गीदड़ों के दल बड़ी, मची हलचल है।

मोदी की ये जीत नहीं, जीत राष्ट्रवाद की है,
द्रोहियों के दिल होती, भारी खलबल है।

ट्रेलर दिखाया अभी, बाकी सारा सिनेमा है,
जोश लिए नवसेना, चली आजकल है।

मोदी जी बधाई ले लो, जय की मिठाई ले लो,
बाहर पटाखोंवाला, शोर पल-पल है॥

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

एक विचार


पंचमहाभूतों से निर्मित
मानव शरीर,
जिसके अंदर वास करती है
परमात्मा का अंश "आत्मा",
जो संचालित करती है
ब्रह्मांड में मानवजीवन को,
उसके आचार-विचार, व्यक्तित्व को,
रोकती है कुमार्ग पर जाने से,
ले जाती है सन्मार्ग की ओर,
उधर, जिधर मार्ग है मोक्ष का;
किन्तु मनुष्य पराभूत हुआ
अनित्य, क्षणभंगुर, सांसारिक
मोह के द्वारा, कर देता है उपेक्षा
ईश्वर के उस सनातन अंश की,
और निकल जाता है
अंधकार से भरे ऐसे मार्ग पर
जो समाप्त होता है
एक कभी न खत्म होनेवाले
भयानक जलावर्त पर जिसकी आवृति
चक्की के समान पीस देती है
मनुष्य को जीवनपर्यन्त,
और धकेल देती है
कष्टों से सराबोर आवागमन के
कई नये चक्रों के पाश में।

रविवार, 16 दिसंबर 2012

माधव की जय हो - घनाक्षरी





















श्याम छवि मन मोहे, संग-संग राधा सोहें,
मीठी बाँसुरी बजाते, माधव की जय हो।

कटि करधनी, शीश मुकुट, मयूर पंख,

दिव्य पीत वस्त्र धारे, माधव की जय हो।

नदिया किनारे वन, सुंदर कुसुम खिले,
धन्य-धन्य सभी हुए, माधव की जय हो।

मेरे प्यासे नैनों के भी, खुल गये भाग्य प्रभु,
आपका दरस मिला, माधव की जय हो॥  

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

कुण्डलिया - भारतरत्न लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि (१५ दिसंबर) पर विशेष
















मोती-मोती जोड़ के, गूँथ नौलखा हार।
विश्वपटल पे रख दिया, भारत का आधार॥
भारत का आधार, भरा था जिसमें लोहा,
जय सरदार पटेल, सभी के मन को मोहा।
वापस लाये खींच, देश की गरिमा खोती,
सौ सालों में एक, मिलेगा ऐसा मोती॥

मयूर मन का


नील गगन में अम्बुद धवल,
स्नेहरूपी मोतियों समान बूँदों से सींचते
बलवान, योग्य आत्मजों सदृश
फलों से लदे छायादार विटपों से भरी,
उत्साही, सुगन्धित, रंग-बिरंगी पल्लवित
पुष्पों से सजी,
स्वर्ण सरीखी लताओं से जड़ित,
चटख हरे रंग की कामदार कालीन बिछी
धरती को;
मंगलगान गाती कोयलें बैठ डालियों पर,
प्रणय-निवेदनरत मृग युगल,
अमृतकलश सम दिखते सरोवर,
किलकारियों से वातावरण को गुंजायमान
करते खगवृन्द,
परियों जैसी उड़ती तितलियाँ;
ऐसे सुन्दर, मनमोहक, रम्य दृश्य को
निहारते हुये
मुदित मन से नृत्य करते-करते
अपने पैरों पर दृष्टी पड़ते ही
नैराश्य के विशिखों से विदीर्ण ह्रदय हुआ
अकस्मात ही ठिठक जाता है
मयूर मन का।

रविवार, 2 दिसंबर 2012

दो सवैये


मदिरा सवैया

मोषक राज किये यतियों पर ये कहना अतिरंजन है।
कौन बचा दुनिया भर में कह दे उसका चित कंचन है।
शोषक भी सब शोषित भी सब मौसम का परिवर्तन है।
कारण है निजता चढ़ के सिर नाच रही कर गर्जन है॥

दुर्मिल सवैया

अवलंबन हो निज का तब जीवन ये सुख की रसधार लगे।
प्रभुवंदन से मन पावन हो तरणी भव के उसपार लगे।
धरती सम हो उर तो नित "मैं कुछ दूँ सबको" यह भाव जगे।
अनुशीलन है बसता जिसमें उसमें नव के प्रति चाव जगे॥

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

दो कुण्डलिया

(1)
सीमा लाँघो बैरियों, होना है जो ढेर।
ले भगवा तैयार है, भारत माँ का शेर॥
भारत माँ का शेर, बड़ा है ताकतवाला,
तीखे इसके दाँत, नैन सम धधके ज्वाला।
कह गौरव कविराय, बना देगा ये कीमा,
भागो ले के प्राण, भूल नहिं जाना सीमा॥

(2)
प्यारे भारत देश को, करो नमन हे वीर।
जयकारे का घोष कर, चलो थाम शमशीर॥
चलो थाम शमशीर, भूमि रण की है आगे,
पौरुष तेरा देख, सदा ही हैं रिपु भागे।
कह गौरव कविराय, वचन जो सच्चे सारे,
ठाड़ी तेरी जीत, पुष्प ले यश के प्यारे॥

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

छन्न पकैया छन्न पकैया


छन्न पकैया छन्न पकैया, सॉरी भैया धोनी।
स्पिन ट्रैक से क्या होता है, टलती थोड़े होनी॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, भाग देख लो फूटे।
अपने सौवें ही दंगल में, वीरू दादा टूटे॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, थोड़ा चले पुजारा।
लदफद होती सेना को जो, देते रहे सहारा॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, क्या करते हो सच्चू।
अपने ही घर में अपनी क्या, पिटवाओगे बच्चू॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, अन्ना दीखे भज्जी।
कुक पूरे सरकारी बन के, उड़ा रहे थे धज्जी॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, दिखी नहीं तैयारी।
थोड़ा सा गंभीर दिखा जो, खेला दूजी पारी॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, पड़े मैच में कोड़े।
कोई भी युवराज नहीं था, रोक सके जो थोड़े॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, लगा बड़ा वो बोझा।
भूतों की टोली से हारा, जो बनता था ओझा॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, गोली बन गई खोखा।
अश्विन की तो बात न करना, दिया सभी ने धोखा॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, समय बुरा था बीता।
तीर खान के सब नहीं चले, मैच फिरंगी जीता॥

छन्न पकैया छन्न पकैया, मुक्त कंठ से गाओ।
नहीं समझ में आये कुछ तो, भाई छन्न पकाओ॥

सोमवार, 26 नवंबर 2012

मदिरा सवैया
















भारत के हम शेर किये नख के बल रक्षित कानन को।
चीर दिया हर बार सदा बढ़ते हुए संकटकारण को।
भाग चले रिपु पीठ दिखा ढकते निजप्राण व आनन को।
हाल सुना अब हैं फिरते सब कालिख माथ लगा वन को॥

रविवार, 25 नवंबर 2012

मदिरा सवैया

















भारत के हम शेर किये नख के बल रक्षित कानन को।
छोड़त हैं कभि नाहिं उसे चढ़ आवहिं आँख दिखावन को।
भागत हैं रिपु पीठ दिखा पहिले निजप्राण बचावन को।
घूमत हैं फिर माँगन खातिर कालिख माथ लगावन को॥

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

मत्तगयन्द सवैया


वो नर नाहिं रहे डरते डरते सबसे नित आप हि हारे।
पामर भाँति चले चरता पशु भी अपमान सदा कर डारे।
मानव जो जिए गौरव से अपनी करनी करते हुए सारे।
जीवन हैं कहते जिसको बसता हिय में निजमान किनारे॥

वीरेंद्र सहवाग को 100 टेस्ट क्लब में शामिल होने पर बधाई - विधाता (शुद्धगा) छंद पर आधारित

















महाराजा, जहाँ चाहे, वहाँ आज्ञा, चलाता है।
खिलाड़ी है, बड़ा वीरू, सदा बल्ला, बताता है।
कभी चौका, कभी छक्का, लगा सौ ये, बनाता है।
मिला मौका, कि गेंदों से, करामातें, दिखाता है॥

किसी के भी, इलाके में, सिंहों जैसा, सही वीरू।
सभी ताले, किले सारे, गिरा देता, यही वीरू।
बिना देरी, विरोधी को, पछाड़े जो, वही वीरू।
डरे-भागे, कभी कोई, लड़ाई से, नहीं वीरू॥

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

श्रीराम भजन






















हे श्रीराम करुणा के सागर, वर दो मुझे रहूँ तुझे पाकर।
दो नयन मेरे प्यासे हैं कब से, अब तो दे दो दर्शन इन्हें आकर॥

जो भी दिल से तुझे पुकारे, पल में उनके तू काज सँवारे।
मेरे मन में भी आशा यही है, ओ मेरे स्वामी प्राणों से प्यारे॥
धन-वैभव का द्वार है तू, सम्पूर्ण जगत का सार है तू।
ज्ञान, भक्ति, यश देनेवाले, मेरे जीवन का आधार है तू॥
तेरे चरणों में रख डाला, मैंने अपना जीवन लाकर।
दो नयन मेरे प्यासे हैं कब से, अब तो दे दो दर्शन इन्हें आकर॥

पाप तले दबती जब सृष्टि, मुक्ति दिलाती तेरी कृपादृष्टि।
बड़े-बड़े राजे-महाराजे, तेरे आगे नतमस्तक नाचे॥
भक्त तेरे बजरंग बली, जिनके आगे न रावण की चली।
तेरे नाम का चमत्कार हुआ, पत्थरों के पुल से सागर पार हुआ॥
हे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु, मैं "गौरव" तेरा चाकर।
दो नयन मेरे प्यासे हैं कब से, अब तो दे दो दर्शन इन्हें आकर॥

श्री हनुमान भजन





















रामभक्त हनुमान करेंगे मेरा कल्याण,
लेकर ऐसा विश्वास, प्रभु दर पे आया हूँ।
आपका ही सहारा है, आपको ही पुकारा है,
ठुकराना मत मुझे, फूल श्रद्धा के लाया हूँ॥

संसार दुखालय है, व्याप्त केवल अँधेरा,
कब बीतेगी ये रात्रि, कब आएगा सवेरा 
फैलाते जा रहे फण कलियुग के दानव,
मद में चूर घूमता उन्मत्त हो के मानव॥
आस मुझे भगवन आपसे ही दिखती है,
अन्य सभी जगहों से मैं बड़ा घबराया हूँ 
आपका ही सहारा है, आपको ही पुकारा है,
ठुकराना मत मुझे, फूल श्रद्धा के लाया हूँ॥

भरी झोली कितनों की आपने एक बार में,
आ गई खुशहालियाँ सबके घरबार में।
आपकी भक्ति से कृपा श्रीराम की मिलती है,
आशायें पूरी होकर पुष्प बन खिलती हैं॥
कर रहा हूँ विनती, पूरी हो पवनपुत्र,
भाग्य हैं मेरे दर्शन आपके कर पाया हूँ।
आपका ही सहारा है, आपको ही पुकारा है,
ठुकराना मत मुझे, फूल श्रद्धा के लाया हूँ॥

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कुण्डलिया तथा घनाक्षरी

















कुण्डलिया

पानी है तो प्राण है, थे पुरखों के बोल।
नवपीढ़ी नहिं जानती, क्या पानी का मोल॥
क्या पानी का मोल, तभी तो दोहन जारी,
जाते जल के पाँव, कुपित हो लेने बारी।
नाचे नंगा पाप, नहीं है दूजा सानी,
नैनों से है लुप्त, भरा है मुख में पानी॥

घनाक्षरी

बगिया बसानेवाले, हरियाली लानेवाले,
फूलों को खिलानेवाले, यही तो चरण हैं।

मरु को मिटानेवाले, प्यास को बुझानेवाले,
जिंदगी बचानेवाले, यही तो चरण हैं।

बड़े शील गुणवाले, परमार्थ धनवाले,
जैसे हों मधु के प्याले, यही तो चरण हैं।

नैनों को सजानेवाले, चित्त को लुभानेवाले,
वचनों के रखवाले, यही तो चरण हैं॥

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

बजरंग बली मेरे बजरंग बली





















कौन है जग में तुमसा बली। कौन है जग में तुमसा बली॥
बजरंग बली मेरे बजरंग बली॥

रामसिया के हनुमत प्यारे। संतन के सब कष्ट निवारे॥
कानन कुंडल हाथ गदा है। रामनाम ह्रदय में सदा है॥
जिनका एक गर्जन मचा दे खलों के दलबल में खलबली॥
बजरंग बली मेरे बजरंग बली॥

धरणी को जब पाप दबाये। कोई रावण शीश उठाये॥
तब हनुमत ही त्राण दिलाएँ। रघुवर की जयकार सुनाएँ॥
पुण्यों का परचम लहरा दें आँगन-आँगन औ गली-गली॥
बजरंग बली मेरे बजरंग बली॥

राम-राम रट भैया





















रामनाम की महिमा भारी, राम ही कृष्ण-कन्हैया।
राम-राम रट भैया, तू राम-राम रट भैया॥

एक जगत का सार वही हैं। नौका वो, पतवार वही हैं॥
जीवन का आधार वही हैं। दाता वो, सरकार वही हैं॥
राम बसें जिस देश वहाँ सुख करता ता-ता-थैया।
राम-राम रट भैया, तू राम-राम रट भैया॥

नीर बिना है मछली जैसे। राम बिना है आत्मा वैसे॥
ज्यों सूरज से अम्बर चमके। त्यौं रघुवर से आत्मा दमके॥
रामनाम रस पी के झूमें पर्वत, तरु, ताल-तलैया।
राम-राम रट भैया, तू राम-राम रट भैया॥

जो राघव में चित्त रमाए। बजरंगी के मन को भाए॥
लगता है सारा जग अच्छा। खुद हनुमत करते हैं रक्षा॥
रामभजन गाओ सब मिल के, बन जाओ एक गवैया।
राम-राम रट भैया, तू राम-राम रट भैया॥

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

भारतमाता की जय-जय हो


विजय मिली है, सदा विजय हो।
भारतमाता की जय-जय हो॥

बेटों के उर लगन लगी है।
विश्वविजय की चाह जगी है॥
उनके बल का कभी न क्षय हो।
भारतमाता की जय-जय हो॥

ले के दलबल निकल पड़े हैं।
कर अस्त्रों से भरे पड़े हैं॥
लगते ऐसे हुई प्रलय हो।
भारतमाता की जय-जय हो॥

क्रोधानल से नैन लाल हैं।
नाहर सम नख-मुख विशाल हैं॥
देख जिसे भय को भी भय हो।
भारतमाता की जय-जय हो॥

अरिसेना सब भाँप रही है।
थर-थर करती काँप रही है॥
अतिशीघ्र नवयुग का उदय हो।
भारतमाता की जय-जय हो॥

सोमवार, 12 नवंबर 2012

समझ लेना दीपावली है




















जब-जब धर्म की विजय हो,
शुभ-लाभ से भंडार भर जाये,
सुन्दर-सुन्दर रंगोलियाँ सजी हों,
अमावस की रात उजाला हो,
समझ लेना दीपावली है।
दुकानों में उत्सवी रौनक हो,
सबके यहाँ पकवान बने,
ह्रदय-ह्रदय आलोकित हो जाये,
मन-मस्तिष्क व्यथाओं से मुक्त हो,
समझ लेना दीपावली है।
गगन, हर्षध्वनि से गुंजायमान हो,
रोम-रोम आनंद से पुलकित हो,
जात-पात तज दिया जाये,
सब के लिए कुछ न कुछ हो,
समझ लेना दीपावली है।
सर्द वातावरण, गर्माहट से भर जाये,
कीड़े-मकोड़े जल के भस्म हो जाएँ,
घर-घर के किवाड़ खुले हों,
सात्विक उल्लास, पटाखे चला रहा हो,
समझ लेना दीपावली है।
खुशियाँ किसी से भेदभाव न करें,
समाज अपने अस्तित्व को सार्थक करे,
सामूहिकता से नौनिहालों का परिचय हो,
गरीबों के घर भी दिया जगमगाए,
समझ लेना दीपावली है।

हरिगीतिका






















दीपावली लो आ गई है, शोभते सुन्दर दिये।
श्रीराम का जयपर्व ये है, भाग्य पाने के लिये॥
सोहें निलय जगमग बड़े ही, दिव्य सारे चित हुए।
लक्ष्मी-गजानन को सभी ही, पूजके हर्षित हुए॥

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

श्री हनुमान वंदना


















बसे हैं चारों धाम जी
कर लो तुम गुणगान जी,
महिमा उनकी महान जी,
करते हैं सबपे कृपा
मेरे प्रभु हनुमान जी।

रामचंद्र के प्यारे तुम ही
दुनिया के रखवाले,
सुखमय जीवन जीते तेरी
भक्ति करनेवाले।
शंकर के अवतार जी
कर दें भव से पार जी,
वीर, बड़े बलवान जी,
करते हैं सबपे कृपा
मेरे प्रभु हनुमान जी।

भर जाती उनकी झोली जो
तेरे दर पे आते,
नाम तेरा लेते ही भूत-पिशाच
सभी डर जाते।
देते बुद्धि, ज्ञान जी
अर्पित उनको जान जी,
हैं वो बड़े गुणवान जी,
करते हैं सबपे कृपा
मेरे प्रभु हनुमान जी।

(मेरे प्रभु हनुमान की स्तुति)

माँ दुर्गा आराधना





















जय दुर्गा, दुःख हरने वाली
सबका मंगल करने वाली,
क्यों डरे मन कलियुग से
जब तू निर्भय करने वाली।

आदिशक्ति, चंडिका, भवानी
विंध्यवासिनी, जग कल्याणी,
निर्धन को धनवान बनाती
अज्ञानी हो जाते ज्ञानी।
सज्जनों की तू जीवन दाता
दुर्जनों के लिए काली माता,
भाग्यवान हैं भक्त तेरे
अभागा कहाँ तुझे भज पाता।
महिषासुर वध करने वाली
सबकी झोली भरने वाली,
क्यों डरे मन कलियुग से
जब तू निर्भय करने वाली।

माँ तू करती शेर सवारी
हाथों में चक्र, गदा, कटारी,
सिर पर मुकुट, गले में माला
चरणों में ये सृष्टि सारी।
माँ तुझसे ही वर पा के
बड़े-बड़े महाराज हुए,
तेरी महिमा से पूरे
भक्तों के सब काज हुए।
शांति, सदगुण देने वाली
भक्तों के दिलों में रहने वाली,
क्यों डरे मन कलियुग से
जब तू निर्भय करने वाली।

प्रेम से बोलो
जय माता दी

श्रीराम वंदना





















जगत के रक्षक, पालनहार
कर दो भवसागर से पार,
हे मेरे स्वामी, तारनहार
करूँ प्रणाम मैं बारंबार।

तुम हो दानी, तुम हो दाता
पूजे जो तुमको, वो तर जाता
भय, भ्रम से मिलती मुक्ति
करता है जो तेरी भक्ति।
जो नहीं मिलता जन्मों में
मिल जाता तेरे चरणों में,
पाप नष्ट हो जायें सारे
मिल जायें जो दर्शन तुम्हारे।
हे मेरे मालिक, खेवनहार,
करूँ प्रणाम मैं बारंबार।

भाग्यविधाता, भाग्य जगा दे
निर्भय कर, डर दूर भगा दे,
बना मेरे हृदय को बसेरा
तुझको अर्पित जीवन मेरा।
करूँ किस विधि पूजा तेरी
क्षमा करो गलतियाँ मेरी,
तू परमात्मा, तू ही दर्पण
मेरा जीवन, तुझको अर्पण।
दे वर करूँ तेरी जय-जयकार,
करूँ प्रणाम मैं बारंबार।

(मेरे प्रभु श्रीराम की स्तुति)

दोहे : गुरुकृपा


१. गुरुकृपा से जग चलता, मिलता है वरदान |
करुँ नमन गुरु चरनन को, शत-शत कोटि प्रणाम ||

२. बड़भागी को गुरु मिलें, सच्चे, देव समान |
रखें नेह की छाँव में, मुख से बरसे ज्ञान ||

३. छवि सजाऊँ नयनन में, पियूँ चरण पखार |
झूम-झूम करुँ आरती, भूल जगत संसार ||

४. भक्ति की है निर्झरनी, श्रद्धा का है ज्वार |
मन डूब जाये रस में, ऐसी बहे बयार ||

५. गुरुकृपा ही दूर करे, कलियुग का संताप |
पुण्यकर्म अंतर बसें, मन नहिं आये पाप ||

६. खुलें चक्षु दो ज्ञान के, टूटे मायाजाल |
सत्य सनातन ज्ञात हो, मिटें दोष विकराल ||

७. काम, क्रोध, मद, लोभ रिपु, मत्सर घातक मोह |
शनैः-शनैः सब दूर हों, हो तो सत का मोह ||

८. दुर्जन भी सज्जन बने, एक दिन साधू होय |
काँटे तोड़े द्वेष के, बीज दया के बोय ||

९. ऊँच-नीच का भेद नहिं, कभी पसारे पाँव |
प्रेम करे तो जीव से, दे के ठंढी छाँव ||

१०. ईशभक्ति में लीन हो, सुबह-शाम, दिन-रात |
कडवी वाणी छोड़ के, बोले मीठी बात ||

११. केवल गुरु से आसरा, नाव लगे उसपार |
बस यही एक प्रार्थना, करे मन बार-बार ||

१२. गुरु सुनाये सत्य वचन, क्या है अपना धर्म |
कैसे मुक्ति है मिलती, कैसा होए कर्म ||

१३. मार-मार के खा रहा, मनुज, मनुज को आज |
कृपा करो है प्रार्थना, पूज्य गुरु महाराज ||

१४. बंद नरक के द्वार हों, मिले स्वर्ग में सेज |
गुरुकृपा बरसे जिसपर, मुखपर चमके तेज ||

१५. मन में आये वासना, कलुषित अंतर रोय |
जा धर ले गुरुचरण, मंगल-मंगल होय ||

१६. सोना-चाँदी देख के, मन में लालच आय |
बसें गुरु जो अंतर में, सब निर्मल हो जाय ||

१७. छूट चले मांस-मदिरा, जुआ कभी न भाय |
धूम्रपान सब छोड़ के, गोरस मन ललचाय ||

१८. सुबह-शाम नित नेम से, कर ले गुरु का ध्यान |
निर्मल कोमल चित बने, सबका हो कल्याण ||

१९. विनय सुनो करुँ वंदना, हाथ जोड़ हे देव |
भवसागर से तार दो, जय जय जय गुरुदेव ||

२०. सही-गलत नहिं जानता, बालक एक अबोध |
मार्ग दिखाओ आप ही, करता हूँ अनुरोध ||

दोहे

















(१) हाथों में झाड़ू लिए, बचपन का ये वेश |
मनवा कैसे मान ले, विकसित होता देश ||

(२) अपनी भागमभाग में, आदम है मशगूल |
बचपन के माथे धँसा, नहिं दिखता ये शूल ||

(३) सपने हैं दम तोड़ते, हाथ बुहारें धूल |
औ भिखमंगे वोट के, बैठे हैं सब भूल ||

(४) लाख गुना अच्छे-भले, बच्चे ये मजबूर |
इनको अपने बाप का, चढ़ता नहीं सुरूर ||

(५) तनया है ये देश की, इसका ऐसा हाल |
आकर के घुसपैठिये, होते मालामाल ||

(६) झाड़ू से दुख को घिसे, बच्ची ये अनजान |
इसमें भी तो प्राण हैं, ये भी है इंसान ||

(७) दुहिता करती चाकरी, हीरा जो नायाब |
घर में बैठे बाप की, बस इक तलब शराब ||

घनाक्षरी


भव के भरम तले, मन का मिरग चले,
सोचे थकूँ थोडा भले, तर जाऊँ जल से |

इतना सरल कहाँ, पग-पग जल कहाँ,
फैला है अनल यहाँ, ठगा जाए छल से |

सत को रे नर जानो, साधुओं की बात मानो,
मन को एकाग्र करो, भक्ति, आत्मबल से |

सुखद ये लोक होगा, नहीं कोई शोक होगा,
रम्य परलोक होगा, खिलोगे कमल से ||

दोहे


थोड़ी सी जलराशि के, आगे रेत विशाल |
मर्त्यलोक में जिंदगी, का ऐसा ही हाल || (१)

जलते रेगिस्तान में, आशा का नहिं अंत |
असुरों के भी देश में, मिल जाते हैं संत || (२)

कंकड़ियों का गाँव ये, बढ़ा रहा है रेत |
बहता शीतल जल कहे, अब तो जाओ चेत || (३)

जल पनघट से सूखता, तरुओं, प्राण समेत |
वारिद भी लाचार है, नहीं बुलाए रेत || (४)

जो मिथ्या अभिमान में, ले जल से मुँह मोड़ |
उसको दुनिया छोड़ दे, सारे नाते तोड़ || (५)

जल के तीरे रेत ही, है दुनिया की रीत |
कर संगत संगे बजे, सुख-दुख का संगीत || (६)

जन दे डर के रेत से, त्राहिमाम सन्देश |
ढाढस देता जल कहे, अभी बचा मैं शेष || (७)

कुदरत ने फिर से किया, जीवों पर उपकार |
देखो तो मरुभूमि से, फूट पड़ी जलधार || (८)

दुनिया में भी दीखते, कैसे-कैसे दृश्य |
पानी स्वागतयोग्य तो, बालू है अस्पृश्य || (९)

देखत मन के नैन से, मुख से निकले बोल |
बिन दहकत मरुभूमि के, नहिं पानी का मोल || (१०)

उर्वरता को काटते, बंजरता के नाग |
पानी को रक्षित किये, नवतरुओं के भाग || (११)

मनहरण घनाक्षरी
















इन्कलाब गाने वाली, गोरों को भगाने वाली,

शूल को हटाने वाली, आग ये पवित्र है |


भोर नयी लाने वाली, चेतना जगाने वाली,

मार्ग को दिखाने वाली, आग ये पवित्र है |


कर्म को कराने वाली, धर्म को निभाने वाली,

शीश को उठाने वाली, आग ये पवित्र है |


सत्य को जिताने वाली, झूठ को हराने वाली,

भ्रष्ट को मिटाने वाली, आग ये पवित्र है ||

हनुमान आराधना (रोला छंद पर आधारित)


















जय जय श्री हनुमान, शरण हम तेरी आये |
हे अंजनि के लाल, कुसुम श्रद्धा के लाये ||
जग में सारे दीन, एक तुम ही हो दाता |
तेरा सच्चा भक्त, सदा सुख को ही पाता || (१)

हे रघुवर के दूत, जगत है तेरी माया |
कण-कण में हे नाथ, रूप है तेरा पाया ||
शंकर के अवतार, देव तुम हो बजरंगी |
दुष्टों के हो काल, दीन-हीनों के संगी || (२)

किसका ऐसा तेज, फूँक दे क्षण में लंका |
कर दानव संहार, बजाये जग में डंका ||
हे हनुमत, श्रीराम, सदा हैं उर में तेरे |
तेरा मुख बस राम, नाम की माला फेरे || (३)

हे मेरे बजरंग, जपा जब नाम तिहारा |
कलि का भारी ताप, लगा है शीतल धारा ||
मैं बालक मतिमूढ़, न जानूँ पूजा तेरी |
इतनी विनती नाथ, क्षमा हों भूलें मेरी || (४)

माता दुर्गा ये वरदान दे





















तुझसे शक्ति मिले, तेरी भक्ति मिले,
माता दुर्गा ये वरदान दे |

माता हम तेरे बेटे अज्ञानी
तेरी पूजा का ढंग नहीं जानें,
तूने ममता से पाला है हमको
सच्चे दिल से हम इतना ही मानें |
प्यार पाते रहें, सिर झुकाते रहें,
माता दुर्गा ये वरदान दे |

मन में एक तेरा मंदिर बना के
करते हैं निशिदिन तेरी ही पूजा,
माँ तुझे अपने बच्चों के सिवा तो
जग में भाता ही ना कोई दूजा |
पुण्यपथ पे कदम हम बढ़ाते रहें,
माता दुर्गा ये वरदान दे |

तेरे आँचल की छाया है हम पे
महिमा तेरी गाते नहीं अघाते,
तूने इतना दिया हमको भवानी
हाथ आगे ना किसी के फैलाते |
लिखें तेरे भजन, रहें तुझमें मगन,
माता दुर्गा ये वरदान दे |

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

मुक्तछंद कविता सम जीवन...


मुक्तछंद कविता सम जीवन,
तुकबंदी की बात कहाँ है ||

लय, रस, भाव, शिल्प संग प्रीति |
वैचारिक सुप्रवाह की रीति ||
अलंकार से कथ्य चमकता |
उपमानों से शब्द दमकता ||
यगण-तगण जैसे पाशों से,
होता कोई साथ कहाँ है |
मुक्तछंद कविता सम जीवन,
तुकबंदी की बात कहाँ है ||

अनियमित औ स्वच्छंद गति है |
भावानुसार प्रयुक्त यति है ||
अभिव्यक्ति ही प्रधान विषय है |
तनिक नहीं इसमें संशय है ||
हृदयचेतना से सिंचित ये,
ऐसा यातायात कहाँ है |
मुक्तछंद कविता सम जीवन,
तुकबंदी की बात कहाँ है ||

ईमान (कहानी)


"गलती हमारा या हमारे आदमियों का नहीं है रमाकांत बाबू"| बाहुबली ठेकेदार तिवारी जी, डीएसपी रमाकांत प्रसाद को लगभग डाँटते हुए बोले| "हम उसको पहिलहीं चेता दिए थे कि ई रेलवे का ठेका जाएगा तो ठेकेदार दीनदयाल राय के पास जाएगा नहीं तो नहीं जाएगा, लेकिन उ साला अपनेआप को बहुत बड़का बाहुबली समझ रहा था| अब खैर छोडिये, जो हो गया सो हो गया| जो ले दे के मामला सलटता है, सलटाइए|"

"आप समझ नहीं रहे हैं सर| बात खाली हमारे तक नहीं है कि आपका कहा तुरंत भर में कर दें| हमारे ऊपर भी कोई है, उप्पर से ई मीडिया आउर पब्लिक का टेंशन है सो अलग|" रमाकांत जी ने थोड़ी विवशता दिखाते हुए कहा|

"देखिये, उ सब हमको मत सुनाइये|" तिवारी जी फिर भड़के| "लाश रेलवे ट्रैक पर मिला है, आ उ भी क्षत-विक्षत हालत में| मृतक बहुत शराब पिये हुए था पोस्टमार्टम में साबित भी हो चुका है| अरे दुर्घटना का केस बना के बात खतम कीजिये| सब बात हमहीं को समझाना पड़ेगा, न?

"ठीक है सर, जैसा आप कहिये|" रमाकांत जी बोले| "लेकिन थोडा...."

"हाँ, हाँ ठीक है" तिवारी जी ने उनकी बात को काटते हुए कहा| "गिफ्ट आपके और आपके बड़े साहब, दोनों के घर पहुँच जाएगा| निश्चिन्त रहिये उसके लिये|"

"अरे नहीं नहीं सर, वो बात नहीं है, हमको अपना नहीं....मतलब थोडा और सबको मैनेज करना पड़ता है न! " रमाकांत जी ने उठते हुए कहा| "जो कह रहे हैं हो जाएगा, अब चलते हैं|" कह के वो बाहर निकले और जीप स्टार्ट कर के कोतवाली की तरफ चल दिये|

कोतवाली पहुँचे तो देखा एक युवक को गिरफ्तार कर के लाया गया था| "कौन है ये?" उन्होंने वहाँ तैनात एक दरोगा से पूछा| दरोगा जी कुछ कहते इससे पहले एक महाशय बोले - "अरे हम बताते हैं सर| चोर है चोर| हमारी ही दुकान में काम करता है और हमारी ही दुकान में चोरी कर रहा था|"

रमाकांत जी को गुस्सा आ गया| कड़कते हुए बोले - "क्यों रे, कब से चल रहा है ये सब?"

युवक रोते हुए बोला - "हम चोर नहीं हैं सर| परीक्षा का फार्म भरना था| कल तक लास्ट डेट है| डेढ़ सौ रुपया चाहिए था| कहीं से उपाय नहीं हुआ एही से खाली डेढ़ सौ रुपया निकाले थे|"

रमाकांत जी का पारा अब सातवें आसमान पर था| "साला, एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी| अपने काम के लिये अपना ईमान बेच देगा तू?" कहते हुए एक जोरदार थप्पड़ उन्होंने युवक को लगाया और सिपाही को बोले - "बंद करो साले को|"

दुकान का मालिक गदगद होके बोला - "साहब, आप जैसे ईमानदार पुलिसवालों के कारण ही आज हमारे देश में क़ानून जिन्दा है|"

रमाकांत जी बोले - "पता नहीं भाई, मुझे ऐसे-ऐसे बेईमान लोगों को देख के क्या हो जाता है? आपा खो बैठता हूँ| खैर तुम जाओ| ये साला तो गया दो साल के लिये|" कहते हुए उन्होंने अपनी सिगरेट जलाई और अन्दर की ओर बढ़ गये|

दोहे : छोड़ धुँए का पान


१. फूँक रहा क्यों जिन्दगी, ऐ मूरख इंसान |
मर जाएगा सोच ले, छोड़ धुँए का पान ||

२. बीड़ी को दुश्मन समझ, दानव है सिगरेट |
इंसानों की जान से, भरते ये सब पेट ||

३. शुरू-शुरू में दें मजा, कर दें फिर मजबूर |
चले काम या ना चले, ये चाहिए जरूर ||

४. जला-जला के फेफड़ा, भरते जाते टार |
कर अंदर से खोखला, कर देते बेकार ||

५. रोगी बनता मुँह-गला, दिल होता बीमार |
कभी साँस अटके कभी, सिर को लगती मार ||

६. जो ले आये मौत को, मत लो वो उपहार |
तौबा कर सिगरेट से, जानो जीवन सार ||

७. घिसट-घिसट के है मिला, ये जीवन अनमोल |
नहीं उड़ाने के लिए, आग-धुँए के मोल ||

हाइकु बक्सा : रक्षाबंधन


१. भाई-बहिन
बाँटें प्यार ही प्यार
राखी के दिन

२. खुशी की घड़ी
न्यारी थाली सजाये
बहना खड़ी

३. अक्षत-रोली
आरती-मिठाईयाँ
हंसी-ठिठोली

४. रंग-बिरंगी
चटख सतरंगी
चमके राखी

५. नहा-धोकर
नए वस्त्र पहने
भईया बैठा

६. हुई आरती
लगा माथे पे टीका
बंधेगी राखी

७. ये बंधी राखी
मुंह में गया लड्डू
अब नेग दो

८. भैया का पर्स
छीन भागी छुटकी
देखो शैतानी

९. भैया भी हंसा
लुटाया खूब प्यार
वाह क्या पर्व

१०. दीदी कहती
आज देना पड़ेगा
वर्ना मारुँगी

११. यही माहौल
ऐसे-ऐसे उत्सव
काश रोज हों

हाइकु बक्सा : बहन बोली भाई से.......


१. बाँधी है राखी
भैया लाज रखना
रक्षा करना

२. धागा नहीं ये
बंधन है प्यार का
मान रखना

३. मैं कहीं रहूँ
भूलना मत मुझे
याद रखना

४. आये वो दिन
जब पडूँ अकेली
साथ निभाना

५. भटकूँ कभी
चमकना दिये सा
राह दिखाना

६. पवित्र रिश्ता
भाई का बहन से
आन रखना

७. न घबराना
कभी झंझावातों से
मैं साथ तेरे

८. नहीं जाऊँगी
कभी तुझे छोड़ के
तू जान मेरी

९. खुशियाँ मेरी
सजती हैं तुझसे
मेरे भईया

१०. आँखें हैं नम
याद आया हमारा
वो बचपन

११. नभ के जैसा
अनंत बना रहे
प्यार हमारा

देशगीत (स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)


जो कह गए शहीद, चलो उसको दुहराएँ |
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

है दिन जिसको वीर, जीत कर के लाए थे,
चट्टानों को चीर, मौत से टकराए थे |
कर लें उनको याद, जिन्होंने शीश कटाए,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

नहीं सुगम था मार्ग, बिछे मिलते थे काँटे,
कैसे-कैसे दुःख, आर्यपुत्रों ने बाँटे |
अपना वो इतिहास, कभी भी हम न भुलाएँ,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

सावरकर, आजाद, भगत सिंह जैसे बेटे,
भारत माँ के नाम, बर्फ पर नंगे लेटे |
न मानी हार मगर, दुश्मन को हरा आए,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

गुँजित है आज गगन, भारत की हुँकारों से,
हुई थी शुरुआत, क्रांतिकारी नारों से |
अपना है अब काम, और आगे ले जाएँ,
आजादी का पर्व, आओ मिलकर मनाएँ ||

हे वनराज ! तुम निंदनीय हो !


हे वनराज ! तुम निंदनीय हो !
अक्षम हो प्रजारक्षा में,
असमर्थ हो हमारी प्राचीन
गौरवपूर्ण विरासत सँभालने में ;
आक्रांता लाँघ रहे हैं सीमायें,
नित्य कर रहे हैं अतिक्रमण
हमारी भावनाओं का,
रौंद रहे हैं किसलयों को,
धधका रहे हैं दावानल,
नोच-नोच तोड़ रहे हैं घोंसले
सदियों से बसे खगों के,
आतुर हैं इस कानन को
नर्क बनाने के लिए ;
और तुम ! शांतचित्त मूक हो !
मात्र निर्विवाद होने की अभिलाषा से !
केवल तुष्टिकरण के लिए !
हे मृगेंद्र ! धिक्कार है तुमपर !
राजधर्म का पालन नहीं कर सकते
तो त्याग दो सिंहासन,
उतार दो ये मुकुट,
फेंक दो वो तलवार जो जंग खा चुकी है
बरसों से म्यान में पड़े-पड़े ;
हमें किंचित मात्र आवश्यकता नहीं
ऐसे शासक की,
हम पशु कर लेंगे अपनी सुरक्षा,
रह लेंगे अधिक सुख से
अपनी मातृभूमि पर,
अपने वन में, अपनी मांद में |

दुनिया - मनहरण घनाक्षरी


भाई-भाई बैरी बना, रोटियों में खून सना,
छा गया अँधेरा घना, देख आँख रो पड़ी |

भूल गए सब नाते, दूर से ही फरियाते,
काम देख बतियाते, कैसी आ गई घड़ी |

जहाँ कोई मिल जाए, नोंच-नोंच कर खाए,
देख गिद्ध शरमाए, बात नहीं ये बड़ी |

होश नहीं इश्क जगे, चाहे भले जाए ठगे,
गैर लगे सारे सगे, सोच कैसी है सड़ी ||

भारतीय सेना को समर्पित एक घनाक्षरी.........


भारती के झंडे तले, आए दिवा रात ढले,
देश के जवान चले, माँ की रखवाली में |

बाजुओं में शस्त्र धरें, मौत से कभी न डरें,
साथ-साथ ले के चलें, शीश मानो थाली में |

नाहरों की टोली बने, खून से ही होली मने,
शादियों में तोप चले, गोलियाँ दिवाली में |

भाग जाना दूर बैरी, वर्ना नहीं खैर तेरी,
काट-काट फेंक देंगे, एक-आध ताली में ||

वीकेंड (कहानी)


"क्या यार?.........हमलोग एक घंटे से इस कैफे में बैठे हैं और वीकेंड का एक बढ़िया प्लान नहीं बना पा रहे........व्हाट इज दिस?" रितिका ने झल्लाते हुए कहा| साथ बैठा उसका क्लासमेट मोहित उसे उखड़ता देख के उसकी हँसी उड़ाते बोला - "मैडम जी.....मैं तो कब से प्लानों की लाइन लगा रहा हूँ, आपको जँचे तब तो"| रितिका थोड़ा और गुस्से में आ के बोली - "मोहित, जस्ट कीप योर माउथ शटअप.......तुम्हारे आइडियाज हमेशा बोरिंग होते हैं....तुम अपनी तो रहने दो बस"| मोहित को बात बुरी लग गई - "क्यों? तुम्हारे उस विभोर के आइडियाज तो बड़े मजेदार होते है न?"

"मोहित, डोंट क्रॉस योर लिमिट........अपनी हद में रहो" रितिका पूरा भड़क गई|

"ओफ्फो....ये क्या शुरू कर दिया तुमलोगों ने?" उनकी दोस्त नेहा उन्हें समझाते हुए बोली - हम यहाँ वीकेंड प्लान करने आये हैं, झगड़ने नहीं"| अभी तक चुप बैठा राज बात को फिर से मुद्दे पर लाते हुए बोला - "मेरे ख्याल से तो आउट ऑफ स्टेशन ही ठीक रहेगा"|

"क्या चल रहा है दोस्तों?" तभी एक आवाज ने उनका ध्यान अपनी ओर खींचा| उधर देखते ही सबके चेहरे खिल उठे - "अरे अर्णव, आओ यार...आओ......बैठो.....तुम्हारी ही जरूरत थी....चल बता वीकेंड पर कहाँ जाया जाये? शर्त ये है कि इसबार कुछ नया होना चाहिए"| अर्णव इनसब मामलों में बड़ा दिमाग लगाता था| थोड़ी देर सोचते हुए बोला - "जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे का अनशन चल रहा है| इसबार का वीकेंड वहीं पर|"

अनशन और अन्ना कि बात सुनते ही सब चौंके - "अबे अर्णव, तू पागल हो गया है? वो कोई जगह है छुट्टी मनाने की?"

अर्णव ने कहा - "अरे अब नये में तो वही जगह बची है.....जस्ट ट्राई टू टेस्ट अ न्यू फ्लेवर...और वहाँ जाकर हमें कौन सा अनशन या देशभक्ति करनी है.......खाने-पीने का पूरा इंतजाम है........थोड़ा चिल-थोड़ी मस्ती.....और फिर घर....फुल्टू वीकेंड.....बोलो क्या बोलते हो?"

सबने थोड़ी देर सोचा और एक स्वर में बोले - "डन......हा.....हा.......हा......"|

"तो फिर ठीक है" अर्णव उठते हुए बोला - "वीकेंड का प्रोग्राम पक्का....सब टाइम पर तैयार रहना.....और हाँ, थोड़े झंडे वगैरह भी ले लेना और वो मैं अन्ना हूँ और क्या-क्या हूँ लिखी हुई टोपियाँ भी.......ओके.......नारे-वारे लगाना तो सबको आता है न?"

"यस बॉस......." सब कहते हुए हँस पड़े और अर्णव मुस्कुराता हुआ बाहर निकल गया|

नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती


देख-देख दुनिया हँसी, मन ही मन में कोसती |
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

कैसा गड़बड़झाल ये, जाने कैसा खेल है,
लोटे औ जलधाम का, होता कोई मेल है |
आ जाएगा घूम के, सबकी खोपड़ सोचती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

पौधा है नवजात ये, कोमल इसकी डाल है,
हट्टा-कट्टा पेड़ तो, मानो गगन विशाल है |
बुढ़िया काकी देख के, उँगली मुँह में खोंसती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

पौधा सच्चा शेर था, चलता अपनी चाल से,
ना की उनकी जात में, जो डरते कंकाल से |
बंदरियों की खीस भी, उतरी खुद को नोंचती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

पौधे ने जैसा कहा, ठीक वैसा काम किया,
वीर जान के पेड़ ने, भी सादर प्रणाम किया |
अंड-बंड बकता रहा, बगल में बैठा पोस्ती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

फूल शहरों के


गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के
कटिंगदार झरोखों से लटक कर
धुंआयुक्त वातावरण में बीमार, खाँसते
अपने चेहरे की धूल को
कृत्रिम फुहारों से धोने की कोशिश में
बड़े दयनीय लगते हैं
छोटे से पात्र में कैद जड़ों के सहारे
संपूर्णता का भ्रम पाले और
मिट्टी की न्यूनता से कुपोषित
ठिगने से पौधों की
रसायनों से भरी डालियों पे
चुभती नुकीली पत्तियों के संग
भड़कीले चटख रंगों में सराबोर
तथाकथित खिले हुए
फूल शहरों के |

भाई - लघुकथा


निकिता की शादी हो रही थी| सभी बेहद खुश थे| सारा इंतजाम राजसी था| होता भी क्यों न? निकिता और उसका होनेवाला पति, दोनों ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ऊँचे ओहदों पर थे और अच्छे घरों से आते थे| वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान भाई के द्वारा की जानेवाली रस्मों की बारी आई| अब भाई की रस्में करे कौन? निकिता का इकलौता भाई, जो इंजीनियरिंग का छात्र था, परीक्षाएँ पड़ जाने के कारण अपनी दीदी की शादी में आ ही नहीं पाया था| लेकिन इससे कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि राज्य के नामी उद्योगपति आर.के सिंहानिया का बेटा और निकिता का मुंहबोला भाई विक्रम सिंहानिया वहां मौजूद था अतः निकिता के माता-पिता ने झट से उसे आगे कर दिया और सबकुछ पुनः सुचारू रूप से चलने लगा|

लावा छिंटाई की रस्म चल रही थी और लोग बातें कर रहे थे - "देखो तो, बिल्कुल अपने भाई की तरह मानती है इसे"| कोई कह रहा था - "अरे पिछले साल राखी बंधाई में इसने निकिता को हीरे की घडी गिफ्ट की थी"| रस्में होती रहीं, लोग आज के युग में मुंहबोले भाई-बहन के इस प्रेम की मिसाल देते रहे| इस सबके बीच गाँव से आया हुआ निकिता का अपना बेरोजगार ममेरा भाई, जिसके घर में निकिता का बचपन बीता था, भीड़ में उपेक्षित बैठा चुपचाप एकटक से शादी में भाई द्वारा हो रही रस्मों को देख रहा था|

शिक्षक दिवस पर विशेष.......


गुरुओं से संसार है, गुरुवर शब्द विराट |
गुरु को पा के बन गया, चन्द्रगुप्त सम्राट ||

विद्या दो हे विद्यादाता | करूँ नमन नित शीश झुकाता ||
आन पड़ा हूँ शरण तिहारे | घने हुए मन के अँधियारे ||
दुखित ह्रदय नहीं दिखे उजाला | रोके रथ अज्ञान विशाला ||
कुछ न सूझे भरम है भारी | लागे मोहि मत गई मारी ||
दीन-हीन आया हूँ द्वारे | उर में आस की ज्योति धारे ||
ज्ञान मिलेगा यहाँ अपारा | निर्झरणी सम शीतल धारा ||
धार कलम की तेज बनाओ | कृपा करो सन्मार्ग दिखाओ ||
गुरुवर तुम ही हो उपकारी | लिये प्रेम का सागर भारी ||
भरो हमारे अन्दर ज्वाला | तेज लपट ऐसी विकराला ||
रूढ़िवादिता खाक करें हम | दुष्कर्मों का नाश करें हम ||
सिंह सम गरजें भरें हुंकारें | बनें शिवाजी छल को मारें ||
देश पुराने यश को पाए | दुनिया सादर शीश झुकाए ||
ऐसा वज्र बना दो हमको | ये संकल्प करा दो हमको ||
नवाचार की आँधी लाएँ | गुणी आपके शिष्य कहाएँ ||
मिले न कोई मुझ सम दूजा | मेरे कर्मों की हो पूजा ||
झूठ सदा नैनों में खटके | सत्य से कभी नहिं मन भटके ||
लावा ऐसा अन्दर फूटे | अन्यायी के सिर पर टूटे ||
किरपा इतनी चाहूँ तोसे | ज्ञानसागरों, विद्वजनों से ||
सिद्ध करो ये कारज मेरा | आ जाए इक नया सवेरा ||
किया भरोसा तुमपर जानो | विनती मोरी गुरुवर मानो ||

हिंदी को बचाइए : घनाक्षरी


एक राष्ट्र एक टोली, एक भाव एक बोली,
हिंदी से ही हो सकेगी, आप जान जाइए |

भाषा ये सनातनी है, शीलवाली, पावनी है,
शोला है सुहावनी है, विश्व को बताइए |

पूर्वजों ने भी कहा है, हिंदी ने बड़ा सहा है,
हिंदी को बढ़ावा दे के, विद्वता दिखाइए |

भारती की कामना है, शत्रु को जो थामना है,
भाई मेरे बंधु मेरे, हिंदी को बचाइए ||

चार कह मुकरियाँ


(१) फूटे बम चल जाए गोली,
नहीं निकलती मुँह से बोली |
बाहर आता खाने राशन,
क्या भई चूहा? नहिं रे "शासन" ||

(२) ताने घूँघट औ शरमाए,
तड़पा के मुखड़ा दिखलाए |
रोज दिखाए जलवा ताजा,
क्या मेरी भाभी? नहिं तेरा "राजा" ||

(३) चलते पूरी सरगर्मी से,
सुनते ताने बेशर्मी से |
बातों से पूरे बैरिस्टर,
क्या कोई लुक्खा? नहिं रे "मिनिस्टर" ||

(४) भले नाम खुद न लिख पाते,
पढ़े-लिखोंपर हुक्म चलाते।
भाव आज कोई न देता,
जमींदार क्या? नहिं रे "नेता"||

बंद - लघुकथा


महेश कोचिंग जाने के लिये तैयार हो रहा था कि तभी उसके पिता श्यामल बाबू ने उसे आवाज दी| "जी पिताजी" महेश ने उनके पास जा के पूछा| "हाँ महेश, सुनो मेरा तुम्हारी माँ के साथ झगडा हो गया है, वो कल उसने पकौड़े थोड़े फीके बनाये थे न, इसी बात पर| इसलिए आज सारा दिन तुम घर में बंद रहोगे और बाहर नहीं निकलोगे और यदि तुमने बाहर निकलने की कोशिश की, तो मैं तुम्हारे कमरे को पूरा तोड़-फोड़ दूंगा|" श्यामल बाबू इतना कह के चुप हो गये|

महेश ने हैरानी से अपने पिता को देखते हुए कहा - "पिताजी, यदि आपका झगडा माँ से हुआ है तो आप माँ से बात कीजिये| इसकी सजा आप मुझे क्यों दे रहे हैं? इसमें मेरी क्या गलती है?

श्यामल बाबू उसे अर्थपूर्ण दृष्टि से देखते हुए बोले - "महेश, कल तुमने अपने छात्रसंघ के अध्यक्ष की गिरफ्तारी के विरोध में अपने दोस्तों के साथ मिलकर पूरे शहर को बंद करा दिया था| तुम्हारा विरोध तो सरकार से था| तुमने सरकार से बात क्यों नहीं की? तुमने इसकी सजा आम जनता को क्यों दी? इसमें उनकी क्या गलती थी?"

मन एक सागर


मन एक सागर
जहाँ ;
भावनाओं की जलपरियाँ
करती हैं अठखेलियाँ
विचारों के राजकुमारों के साथ ;
घात लगाये छुपे रहते
क्रोध के मगरमच्छ ;
लालच की व्हेल भयंकर मुँह फाड़े आतुर
निगल जाने को सबकुछ ;
घूमते रहते ऑक्टोपस दिवास्वप्नों के ;
आते हैं तूफान दुविधाओं के ;
विशालता ही वरदान है
और अभिशाप भी ;
अद्भुत विचित्रता को स्वयं में समेटे
एक अनोखा सम्पूर्ण संसार है
जो सीमाओं में रहकर भी
सीमाओं से मुक्त है ;

मन एक सागर
जहाँ ;
अतीत डूब के अपने अनुभवों से
प्रशस्त करता है मार्ग
भविष्य का ;
ऊपरी सतह को देख के
असंभव है अनुमान लगाना
तलहटी की वास्तविकताओं के बारे में ;
अथाह जल के मध्य स्थित द्वीप
पर्याप्त हैं बताने के लिए
ठहराव अल्पकालिक होता है
बहाव ही प्रकृति का मूल है ;
पग-पग पर दृष्टिगोचर होते है उदाहरण
धैर्य एवं संयम के लाभ के ;
गहराइयों में जाकर ही
मिलते हैं धर्म के सीप
मर्यादित आचरण के मोती लिये |

हरिगीतिका

बलवंत, भय-संकटहरण प्रभु, पवनसुत हनुमान हैं।
श्रीराम को उर में धरे तप, वीरता के प्राण हैं॥
शिवरूप, दाता ज्ञान के कपि, आप ही गुणवान हैं।
सेवा करें हम आपकी हम, आपकी संतान हैं॥



बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

कुछ कुण्डलिया छंद .........

 (१) नारी घर का मान है, नारी पूज्य महान |
नारी का अपमान तू, मत करना इंसान ||
मत करना इंसान, नहीं ये शाप कटेगा,
खुश होगा शैतान, सदा ही नाम रटेगा |
धर माता का रूप, लुटाती ममता भारी,
बढ़े पाप तो खड्ग, उठा लेती है नारी ||
**********************************
(२) नारी जो बेटी बने, देवे कितना स्नेह |
बने बहिन तो बाँट ले, कष्टों की भी देह ||
कष्टों की भी देह, बाँध हाथों पे राखी,
नहीं कहा कुछ गलत, देश-दुनिया है साखी |
करे कोख पर वार, गई मत उसकी मारी,
फूट गये जो भाग, कहाँ घर आए नारी ||

**********************************
(3) धोती मुनिया फर्श को, मुन्ना माँजे प्लेट |
कल का भारत देख लो, ऐसे भरता पेट ||
ऐसे भरता पेट, और ये नेता सारे,
चलते सीना तान, लगा के जमकर नारे |
नहीं तनिक है शर्म, कहाँ है जनता सोती,
इनको अपनी फिक्र, साफ हो कुर्ता-धोती ||

श्री गणेश आराधना


















प्रथम पूज्य भगवान मेरी
स्वीकार करो आराधना,
बहुत हुए पाप मुझसे
अब हो कोई अपराध ना|

तुम ही जग को पालनेवाले
पार्वती शंकर के दुलारे,
जो आया शरण में तुम्हारी
तुमने उसके काज सँवारे|
दर्शन भाग्यवान को होते
जो तुझे भजते, कभी न रोते,
बड़े अभागे जीव हैं वो
भूल तुझे जो रहते सोते|

जीवन के किसी मोड़ पर
छोड़ना मेरा साथ ना,
बहुत हुए पाप मुझसे
अब हो कोई अपराध ना|

सुखद सुहाना रूप तुम्हारा
मेरे नयनों को भाता है,
वर्णन विराट रूप का तेरे
कौन यहाँ कर पाता है|
कई रूप, कई नाम हैं तेरे
मूषक तेरी सवारी,
गणपति, गजानन है तू
तेरी कृपादृष्टि न्यारी|

अपने चरणों में रखना मुझे
स्वीकार करो ये प्रार्थना,
बहुत हुए पाप मुझसे
अब हो कोई अपराध ना|

हाइकु : हमारे गाँव


१. निष्कपटता
भाईचारे की छाँव
हमारे गाँव

२. प्यार के रिश्ते
सुख दुःख के साथी
गाँव के वासी

३. आम के बाग
पंछी चहचहाते
मन को भाते

४. खेतों की मिट्टी
किसानों का पसीना
देश के लिए

५. बड़ी शर्मीली
शोख रंग रंगीली
गाँव की गोरी

६. फाग की मस्ती
बैसाखी का धमाल
चैता का गान

७. कुएँ का पानी
लिट्टी चोखा का स्वाद
क्या एहसास

८. मक्के की रोटी
हो सरसों का साग
फिर क्या बात

९. बदली हवा
खो रही मानवता
बचे हैं गाँव

१०. थोडा सा गुस्सा
मीठी सी नोकझोंक
बैर नहीं है

११. सत्य वचन
भारत गांवों में है
सच्चा भारत

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

हाइकु बक्सा : विविध


(१) झुकी नजरें
खामोशी इजहार
पहला प्यार

(२) सब अपना
हरेक का सपना
कलियुग है

(३) भारी टोकरा
रोकड़ा ही रोकड़ा
उपरी आय

(४) संतों का बैरी
लुटेरों का चहेता
हमारा नेता

(५) अँगूठा छाप
पढ़े-लिखों का बाप
जनतंत्र है

(६) संकीर्ण सोच
इंसानी खुराफात
ये जात-पात

(७) तिल का ताड़
मजहब की आड़
आतंकवाद

(८) बेमेल दल
लाचार सरकार
गठबंधन

(९) सब ने ठगा
हाशिये पर रखा
हिन्दू जनता

(१०) हमारा वोट
हमारी सरकार
तो क्यों बवाल

(११) फटे में बीवी
भूखे मरते बच्चे
हाय गरीबी

भूख : दोहे


(१) रंक जले राजा जले, कौन सका है भाग |
सबके अंदर खौलती, एक क्षुधा की आग ||

(२) ज्वाल क्षुधा में वो भरी, कहीं न ऐसा ताप |
जल के जिसमें आदमी, कर जाता है पाप ||

(३) भूख बड़ी बलवान है, लेने दे नहिं चैन |
दौड़ें सब इसके लिए, दिन हो चाहे रैन ||

(४) जो नहिं होती भूख तो, सच कहता हूँ मीत |
निर्भय नर जीता यहाँ, नहिं होता भयभीत ||

(५) भूखा मन कमजोर है, बेबस औ लाचार |
भूल चले कर्तव्य को, याद नहीं अधिकार ||

(६) भूख दिखाए वो घड़ी, देती वो संताप |
माता बेचे पूत को, गरदन काटे भ्रात ||

(७) भूख लगाए वो अनल, फूँके सब की लाज |
चौराहों पर बेटियाँ, बेच रहीं तन आज ||

(८) भूख दबाए साँच को, बुलवाती है झूठ |
इसका मारा आदमी, खुद से जाता रूठ ||

(९) छीन मिटाए भूख जो, कहलाता है चोर |
नैना ताके सामने, मन देखे चहुँओर ||

(१०) भूख कहे याचक बने, लेवे खुद को मार |
राह निहारे आस में, कौन करे उपकार ||

(११) भूख कराए चाकरी, खाए कोड़े चाम |
सिर पर मैला बोझ के, दिलवाए कम दाम ||

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

मिठास रिश्तों की


अरे ! कहाँ गई !
अभी तो यहीं थी !
लगता है कहीं गिर ही गई
इस आपाधापी में,
हो सकता है कुचल दी गई होगी
किन्हीं कदमों के तले,
या फिर उड़ा ले गया उसे
झोंका कोई हवा का ;
चाहे चुरा ले गया होगा चोर कोई,
लेकिन चुराएगा कौन !
चीज तो काफी पुरानी थी
फटी-चिटी, धूल-धूसरित,
बहुत संभव है फेंक दिया होगा
किसी ने बेकार समझ के
और ले गया होगा कोई
आउटडेटेड आदमी अपने
स्वभाव के झोपड़े में लगाने के लिए ;
कहीं कहानी लिखनेवाले
तो उठा नहीं ले गये !
कवियों का भी काम हो सकता है,
अन्यथा कोई वृद्ध ले गया होगा
अपने जमाने की शान को
लगा के कलेजे से,
बैठ के अकेले में साथ रोने के लिये
अपनी और उसकी दुर्दशा पर ;
खैर.......जो कुछ भी हो,
अब तो मिलने से ही रही
वो खोई हुई चीज
"मिठास रिश्तों की" |

दो रंग - लघुकथा


आज मॉर्निंग वॉक से लौटते समय सोचा कि जरा सीताराम बाबू से भेंट करता चलूँ| उनके घर पहुँचा तो देखा वो बैठे चाय पी रहे थे| मुझे देखते ही चहक उठे - "अरे राधिका बाबू, आइये आइये...बैठिये.....सच कहूँ तो मुझे अकेले चाय पीने में बिलकुल मजा नहीं आता, मैं किसी को ढूंढ ही रहा था......हा....हा...हा.....|" कहते हुए उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई - "अजी सुनती हो, राधिका बाबू आए हैं........एक चाय उनके लिये भी ले आना|"

फिर हमदोनों चाय पीते हुए इधर-उधर की बातें करने लगे| तभी उन्होंने टेबल पर रखा अखबार दिखाते हुए कहा - "अरे आपने आज का पेपर देखा? इस भ्रष्टाचार के दीमक ने हमारी युवा पीढ़ी को भी पूरा चाट लिया है| ये देखिये आज की हेडलाइंस 'नवपदस्थापित प्रखंड विकास पदाधिकारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों धराये'| अजी ये लड़का एकदम नया-नया ही बहाल हुआ था, और हालत देखिये| आते-आते भूख लग गई| राधिका बाबू, अगर देखा जाए तो इसमें माँ-बाप का भी कम दोष नहीं है| जाने कैसे माँ-बाप होते हैं जो अपने स्वार्थ के लिये ये पाप की कमाई खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं और अपने बच्चों को सही संस्कार नहीं देते|" उनकी ये बात मुझे भी ठीक लगी सो मैंने भी सहमति में सिर हिलाया| फिर कुछ हल्की-फुल्की बातें होने लगीं| आगे बातों ही बातों में मुझे उनकी बेटी सुधा का ख्याल आया जो विवाह के लायक हो गई थी और वो उसके लिये किसी अच्छे रिश्ते की तलाश में थे| मैंने उनसे पूछा - "सीताराम जी, इधर सुधा के लिये कोई लड़का देखा है या नहीं?" वो झट से बोले - "अरे हाँ हाँ राधिका बाबू, मैं तो आपको बताना ही भूल गया| देखा तो है एक लड़का| मेरे एक पुराने परिचित का बेटा है| कार्मिक विभाग में नौकरी करता है| वैसे तो लिपिकीय संवर्ग में है किन्तु ऊपरी आमदनी बड़ी अच्छी हो जाती है| मैं तो अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि बात पक्की हो जाए| बिटिया सुख से रहेगी तो मुझे भी चैन रहेगा|" मैं अवाक था|

श्रीकृष्ण आराधना















जय श्रीकृष्ण देवकीनंदन | हूँ कर जोड़े, करता वंदन ||
दुख-विपदा से आप निवारो | मेरे बिगड़े काज सँवारो||
भगवन जग है तेरी माया | कण-कण तेरा रूप समाया ||
जगत नियंता, हे करुणाकर | तेरी ज्योति चंदा-दिवाकर ||
देवराज आरती उतारें | नारद जय-जयकार उचारें ||
तीनों लोकों में हो पूजा | नाथ तुम सम कौन है दूजा ||
दिवस अष्टमी भादो मासे | चमका कारागार कृपा से ||
हुए अवतरित जगत-कृपाला | पीले वसन, गले में माला ||
रूप चतुर्भुज, तेज दिखाया | माता के मन को अति भाया ||
माता ने विनती दुहराई | बन शिशु माँ की गोद सजाई ||
धर्महित एक काज बताया | पिता ने नन्द घर पहुँचाया ||
पले वहीं गिरधर गोपाला | बन के नन्द-यशोदा लाला ||
मटकी फोड़ी, माखन खाये | गोप-गोपियों को हर्षाये ||
तृणावर्त, शकटासुर मारे | केशी, बकासुर को संहारे ||
कालिय को भी मार भगाया | लोगों को भयमुक्त बनाया ||
सुरपति को अहं से उबारा | गोवर्धन उँगली पर धारा ||
बंसीवाला रास रचैया | चक्रधारी कृष्ण कन्हैया ||
दीन-हीन पर दया दिखाई | पापी कंस से मुक्ति दिलाई ||
मित्र सुदामा जो घर आये | प्रभु ने उनके भाग्य जगाये ||
शरणागत पर दया दिखाई | द्रुपदसुता की लाज बचाई ||
गीता ज्ञान अर्जुन को दिया | सदा ही धर्म का काम किया ||
राधे-राधे जो दुहराये | कभी भी भय न उसे सताये ||
जपे नाम राधेकृष्णा का | हो न दुख किसी मृगतृष्णा का ||



|| जय श्री राधेकृष्ण || जय श्री राधेकृष्ण || जय श्री राधेकृष्ण ||

मन मेरे...


मन मेरे
हिम्मत न हार
जय तेरी होगी|
निरंतर अग्रसर हो
कर्म के पथ पर,
प्रत्याशा के रथ पर
मिटा के अंतर्द्वंदों को
त्याग आलस्य को,
घातक नैराश्य को
तुझमें नैर्गुण्य नहीं,
तू बिलकुल शून्य नहीं
तुझमें भी क्षमता है
अपनी महत्ता है|
स्वयं की पहचान कर
खुद पर अभिमान कर,
शंखनाद कर दे
अस्तित्व के संग्राम का,
भय क्या परिणाम का
निर्भीकता शस्त्र है
मार्ग प्रशस्त है,
कल्पना के चित्र को
यथार्थ पर उकेर,
समय तेरे साथ है
निरर्थक है देर|

किसान


किसान,
प्रतीक अथक श्रम के
अतुल्य लगन के ;
प्रमुख स्तंभ
भारतीय अर्थव्यवस्था के,
मिट्टी से सोना उगानेवाले
आज उपेक्षित हैं
परित्यक्त हैं
अपने ही "कर्जदारों" द्वारा
चुनी सरकारों द्वारा ;
फंसे हैं मकड़जाल में
महाजनों, सूदखोरों,
बिचौलियों के,
जा चुके हैं हाशिये पर
एक कृषिप्रधान देश में
बदलते परिवेश में ;
क्षुधा-संग्राम हेतु
शस्त्र बनाने वाले,
स्वयं निःशस्त्र हैं
अवसाद से त्रस्त हैं ;
विवश हैं
आत्महत्या के लिए,
कृषि छोड़ने के लिए,
आवश्यकता है
स्थिति सुधारने की,
उन्हें उबारने की ;
अन्यथा
देर हो जाएगी
बहुत देर...|

दुःख


तृष्णा की कोख से जन्मा
वासनाओं के साये में पला
एक मनोभाव है दुःख ;
सांसारिक माया से भ्रमित
षटरिपुओं से पराजित
अंतस की करुण पुकार है दुःख ;
स्वार्थ का प्रियतम
घृणा का सहचर
भोगलिप्सा की परछाई है दुःख ;
वैमनस्य का मूल्य
भेदभाव का परिणाम
आलस्य का पारितोषिक है दुःख ;
अधर्म से सिंचित
अमानवीय कृत्यों की
एक निशानी है दुःख ;
कलुषित मन की
कुटिल चालों का
सम्मानित अतिथि है दुःख ;
निरर्थक संशय से उपजी
मानसिक स्थिति का
एक नाम है दुःख |

हे मनुज! तुम दिया बनो


हे मनुज! तुम दिया बनो
वो दिया...जो जलता है
प्रकाश के लिए,
नवनिर्माण के लिए,
भटके को राह दिखाने के लिए,
प्रभु की आराधना के लिए,
हे आर्य! आत्मसात कर लो
इसके गुणों को,
अपना लो इसका स्वभाव,
प्रतीक बनो क्रांति के आगमन का,
सूचक हो परिवर्तन का,
मिटा दो अकेले
अंधकार के साम्राज्य को,
फैलाओ सन्देश
तमसो मा ज्योतिर्गमय,
बन चलो
एक किरण आशा की,
जलाओ एक लौ
विश्वास और सजगता की,
पी जाओ विष भय का,
सोख लो सब कालिमा,
अग्रदूत बनो उजाले के,
निभाओ अपना धर्म,
अपने बुझने तक |

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

वो बच्चा…


वो बच्चा
बीनता कचरा
कूड़े के ढेर से
लादे पीठ पर बोरी;
फटी निकर में
बदन उघारे,
सूखे-भूरे बाल
बेतरतीब,
रुखी त्वचा
सनी धूल-मिटटी से,
पतली उँगलियाँ
निकला पेट;
भिनभिनाती मक्खियाँ
घूमते आवारा कुत्ते
सबके बीच
मशगूल अपने काम में,
कोई घृणा नहीं
कोई उद्वेग नहीं
चित्त शांत
निर्विचार, स्थिर;
कदाचित
मान लिया खुद को भी
उसी का एक हिस्सा
रोज का किस्सा,
चीजें अपने मतलब की
डाल बोरी में
चल पड़ता है
आगे,
अपने नित्य के
अनजाने या फिर
अंतहीन सफ़र पर,
शायद
कल फिर आना हो
चुनने
कुछ छूटे टुकड़े
जिंदगी के|

समाज सुधारक


भ्रष्टता के इस युग में
हर कोई समाज सुधारक है,
देखता है, विचारता है
समाज में व्याप्त घृणित बुराइयों को,
करता है प्रतिकार पुरजोर तरीके से
हर एक बुराई का,
लड़ता है सच के लिए,
बावजूद, क्यों अंत नहीं होता
किसी भी बुराई का,
बल्कि बढ़ती जा रही
बुराइयाँ, दिन-प्रतिदिन,
वजह मात्र एक,
हरेक मनुष्य सुधारता औरों को,
नहीं दिखती किसी को भी
कमियाँ अपनी,
करते नजरअंदाज
अपने अवगुणों को,
कैसे सुधरेगा समाज
जब सुधारनेवाले ही बिगड़े रहेंगे,
बढ़ानेवाले खुद पिछड़े रहेंगे,
धूल से धूल साफ नहीं होती,
कीचड़ से कीचड़ धोया नहीं जाता,
गन्दगी को हटाने के लिए
स्वच्छता की जरूरत होती है,
क्या वो स्वच्छता उपलब्ध है !

सड़क बुलाती है



सड़क बुलाती है,
आओ…मेरा अनुसरण करो,
छोड़ो न कभी मुझे,
भटक जाओगे रास्ता,
मुश्किल हो जाएगा
मंजिल तक पहुँचना,
शायद असंभव भी ;
मैं मार्गदर्शिका हूँ, सुपथगामिनी हूँ,
मैं निरंतर हूँ, मैं अनंत हूँ,
मैं तुमसे पूर्व भी थी,
मैं तुम्हारे पश्चात भी हूँ,
तुम्हारा कार्य पूर्ण हो सकता है,
मेरा कभी नहीं होता,
मेरे लिए बस मेरे कर्म हैं,
मात्र मेरे कर्म,
चाहे दिन हो या रात,
सुबह या शाम ;
मेरी आत्मसंतुष्टि है
सबको मार्ग दिखाना,
उनके लक्ष्य तक पहुँचाना ;
मैं रत हूँ अपने कर्म में,
सदा रहूँगी,
जबतक ये सृष्टि है, ये ब्रह्माण्ड है,
मैं रुक नहीं सकती….कभी नहीं |

मेघ…संग ले चल मुझे भी


मेघ…संग ले चल मुझे भी
स्वच्छंदता के रथ पर बिठा के
उड़ा के दूर
उन्मुक्त, अनंत गगन में
अपनी प्रज्ञात ऊँचाइयों पर
सभी बंधनों से परे
निराकार, निर्विकार रूप में
व्यापक बना के अपने
नयनाभिराम नीलिमा से सुसज्जित
नीरवता की विपुल राशि
हिमावृत सदृश भवनों वाले
अप्रतिम बहुरंगी छटाओं से युक्त
मंत्रमुग्ध करते दृश्यों से शोभित
अथाह सौन्दर्य के मध्य विराजमान
अलभ्य संपदा से संपन्न
किसी स्वप्नलोक का भान कराते
आनंदातिरेक का भाव उत्पन्न करनेवाले
अनन्य, अनुपम लोक में |

चन्द्रमा


चन्द्रमा लुभाता है
नयनों को,
देता है शीतलता
मन-अंतर-आत्मा को,
करता है दूर
थकान दिन भर की,
मिलती है शांति
इसकी छत्रछाया में,
मिलता है सुअवसर
कुछ विचारने का,
मनन करने का,
अगले दिन के लिए ;
चन्द्रमा साक्षी है
सम्पूर्ण घटनाओं का,
करता है सचेत
गलतियों का दोहराव न हो,
सत्कार्यों का विराम न हो,
इसका निर्मल प्रकाश
कहता है हमसे,
शिक्षा लो अपनी भूलों से,
प्रेरित हो पुण्यकर्मों से,
संकल्प ले लो
एक नए युग के आरम्भ का |