गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

गो चालीसा


दोहा

जय गोमाता, पावनी, धर्मरूप, सुखधाम।
जनजीवन के मूल को, बारंबार प्रणाम॥

चौपाई
जय जय गोमाता सुखसागर। जय देवी अमृत की गागर॥
जीवनरस सरिता तुम दाता। पल-छिन महिमा गाएँ विधाता॥
वेद-पुराणों ने गुण गाया। धर्म सनातन ने अपनाया॥
जग की रक्षक, पालनहारी। गोपालक हैं कृष्णमुरारी॥
कृपा गऊ की बड़ी निराली। धर्म, अर्थ को देनेवाली॥
वास सभी तीर्थों का तुझमें। फल सारे यज्ञों का तुझमें॥
पृष्ठदेश में ब्रह्मा सोहें। गले में स्वयं विष्णु मन मोहें॥
मुख में भोलेशंकर प्यारे। मध्यभाग में देवा सारे॥
रोम-रोम ऋषियों का नगर है। पूँछ अनंत नाग का घर है॥
बसे खुरों में पर्वत सारे। सूर्य-चंद्र नयनों में पधारे॥
होना गो का ज्ञान बड़ा है। दानों में गोदान बड़ा है॥
मनोकामना पूरण करती। कामधेनु बन झोली भरती॥
चरणों की रज अति उपकारी। महापापनाशक, सुखकारी॥
दर्शन होता मंगलकारी। सद्गुण पा जाते नर-नारी॥
प्रातःकाल दरस हितदाता। शुभ हो दिवस, जनम तर जाता॥
गोदर्शन यात्री यदि पा ले। निश्चय यात्रा सफल बना ले॥
विधिपूर्वक नर कर ले अर्चन। नौ रोटियाँ व गुड़ कर अर्पण॥
पाता जितने स्वप्न सँजोता। नहीं विवाह विलंबित होता॥
गर्भवती नारी जब आवे। परिक्रमा गउ की कर जावे॥
प्रसव सुखद होगा सच मानें। मनवांछित होंगी संतानें॥
जन जो काली गौ को ध्याते। नवग्रह उनको नहीं सताते॥
बुरी नजर जिसको लग जाए। गो की पूँछ से झाड़ लगाए॥
गो कूबड़ पर हाथ फिराना। समझो अपने कष्ट भगाना॥
जगजननी यह, बात सही है। पृथ्वी का भी रूप यही है॥
प्राणवायु भी इससे आती। भूमिदोष को सदा मिटाती॥
काम अगर कोई शुभ अटका। बार-बार लग जाता खटका॥
गोमाता के कान में कहिए। पूरे होते इष्ट को लखिए॥
माँ बनती जब-जब गोमाता। तब का प्रथम दूध फल दाता॥
बिन संतान दुखी जो नारी। करते पान, बने महतारी॥
गोरस होता सुधा समाना। सत्य सनातन सबने माना॥
दधि, घी, दुग्ध, गोमूत्र पावन। गौमय रस होता मनभावन॥
पंचगव्य मिश्रण है इनका। रोग मिटें जिनसे बन तिनका॥
जिस घर में हो वास तुम्हारा। घर वो है मंदिर सा प्यारा॥
रहती सुख-समृद्धि हमेशा। भागे निशि-दिन दूर कलेसा॥
जन जो गुड़ का भोग लगावे। बने प्रतापी, पुण्य कमावे॥
जिसकी सच्ची श्रद्धा होती। जन वो जनमानस का मोती॥
भाग्यवान पाता है मौका। मिलती गौसेवा की नौका॥
तरनी ये वर देनेवाली। भवबाधा को हरनेवाली॥
करता है जो गउ की सेवा। पाता मुँहमाँगा फल, मेवा॥
माता "गौरव" शरण तुम्हारी। हरदम रक्षा करो हमारी॥

दोहा
गोमाता संतान से, नेह माँगती मात्र।
होता है गो भक्त ही, ईशकृपा का पात्र॥

सोमवार, 14 सितंबर 2015

हिन्दी दिवसपर विशेष

हिन्दी मात्र भाषा नहीं, भारती का वंदन है, वाणी में सजा के निज रसना निखारिए।
सनातनी ध्वज लिए जग में पसर रही, अंतस में धार नित आरती उतारिए।
इसके बिना अपूर्ण भरत के वंशज हैं, सत्य ये अकाट्य, नहीं इसको बिसारिए।
तन, मन, धन और जीवन का क्षण-क्षण, हिन्दी के प्रसार में दे हिन्द को सँवारिए॥

हिन्दी-देवनागरी की जोड़ी को नमन करें, पूर्ण समभाव से जो सबको है पालती।
देखें जरा गौर से ये जहाँ न पहुँच पायी, धरती वहाँ की बस बैर ही निकालती।
भारतीयता की यही रक्षक बनी सदैव, सारथी जो भारती के रथ को सँभालती।
जगमग जग में है भारत का "गौरव" तो, कारण ये जोड़ी नित्य आहुतियाँ डालती॥

ममतामयी उदार हिन्दी जैसी भाषा कोई, जगत में दूजी कौन, हमको बताइए।
टोपीवाला मोह बस दिलाएगा पछतावा, तिलक के अनुयायी तिलक लगाइए।
हिन्द की अखंड ज्योति हिन्दी से ही प्रज्वलित, हिन्दी को सदैव बंधु केन्द्र में सजाइए।
दासता को त्याग निज संस्कृति को आदर दें, एक नहीं नित्य हिन्दी दिवस मनाइए॥

रूसी बोली रूसी बोले, चीनी भाषा चाइनीज, हिन्दी ही क्यों दासता से मुक्त नहीं हो रहा।
मेड़-फेंट, घालमेल को भी सही बोलकर, अपने ही "गौरव" को धीमे-धीमे धो रहा।
बार-बार देखा गया क्षेत्रवाद के ज्वाल में, राष्ट्रवाद का समस्त तेज मानों खो रहा।
आज माँग समय की, एक क्रांति हो विराट, अरसे से देश भाषाहीनता को ढो रहा॥